सुप्रीम कोर्ट ने क्रिश्चियन मिशेल जेम्स की प्रत्यर्पण संधि की धारा के खिलाफ याचिका पर नोटिस जारी किया
सुप्रीम कोर्ट ने अगस्तावेस्टलैंड VVIP चॉपर घोटाले के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल जेम्स द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उनकी उस अपील को खारिज किए जाने के खिलाफ है, जिसमें उन्होंने 1999 की भारत-UAE प्रत्यर्पण संधि के अनुच्छेद 17 को चुनौती दी थी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने वकील अल्जो के. जोसेफ की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। इस मामले को अब जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया गया।
संक्षेप में मामला
मिशेल को दिसंबर 2018 में भारत-UAE संधि के तहत दुबई से भारत प्रत्यर्पित किया गया। उन्होंने हाईकोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया कि सामान्य तौर पर अनुरोध करने वाला देश (इस मामले में भारत) किसी प्रत्यर्पित व्यक्ति पर केवल उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चला सकता है, जिनके लिए प्रत्यर्पण का अनुरोध किया गया। हालांकि, अनुच्छेद 17 भारत सरकार को उन अपराधों के लिए भी मुकदमा चलाने का अधिकार देता है जो "उनसे जुड़े हुए" हैं।
विवादित आदेश के माध्यम से हाईकोर्ट ने संधि को दी गई उनकी चुनौती खारिज की और ट्रायल कोर्ट का आदेश भी बरकरार रखा, जिसमें जेल से रिहाई की मांग करने वाली उनकी अर्जी को इस आधार पर खारिज किया गया था कि उन्होंने 7 साल की अधिकतम सज़ा पूरी कर ली है।
कोर्ट ने प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 21 और विचाराधीन संधि के अनुच्छेद 17 के बीच कोई विरोधाभास नहीं पाया। कोर्ट ने आगे कहा कि मिशेल पर मुकदमा चलाने के दायरे को प्रत्यर्पण आदेश और प्रत्यर्पण करने वाले कोर्ट द्वारा विचार किए गए अंतर्निहित तथ्यात्मक आधार के आलोक में समझा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"दुबई कोर्ट द्वारा पारित प्रत्यर्पण आदेश से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को उन अपराधों के लिए ट्रायल का सामना करने हेतु प्रत्यर्पित किया गया, जो वर्तमान मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि से सीधे तौर पर उत्पन्न होते हैं; जिससे यह संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता पर मुकदमा चलाना संधि के अनुच्छेद 17 के दायरे में आता है।"
इससे व्यथित होकर मिशेल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट के आदेश को दी गई अपनी चुनौती में मिशेल ने ये तर्क दिए हैं:
- उनके मामले में 'विशिष्टता के सिद्धांत' (Doctrine of Specialty) का उल्लंघन किया गया। हाईकोर्ट के निष्कर्षों ने संसद द्वारा बनाए गए कानून के ऊपर संधि को प्राथमिकता दी।
- हाईकोर्ट यह समझने में विफल रहा कि दया सिंह लाहौरिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्याख्या (किसी भगोड़े पर केवल प्रत्यर्पण आदेश में उल्लिखित अपराधों के लिए ही मुकदमा चलाने के संबंध में) कानून-केंद्रित थी, न कि संधि-विशिष्ट; - अनुच्छेद 21 व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें विदेशी भी शामिल हैं, लेकिन अधिकतम सज़ा पूरी होने के बावजूद हिरासत में रखे जाने के कारण उनकी स्वतंत्रता सीमित हो गई।
- उनका प्रत्यर्पण केवल उन अपराधों के लिए किया गया, जिनका ज़िक्र प्रत्यर्पण आदेश में था। उस संबंध में उन्होंने अपनी अधिकतम सज़ा पूरी कर ली है। इसके अलावा, अभियोजन एजेंसियों ने उन्हें किसी अन्य अपराध के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति प्राप्त नहीं की।
माइकल को घोटाले से जुड़े CBI मामले में 18 फरवरी, 2025 को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली थी। बाद में 4 मार्च, 2025 को ED मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से ज़मानत मिली। हालांकि, ज़मानत की शर्तें पूरी न होने के कारण वह जेल में ही रहे।
VVIP चॉपर घोटाले में हुए कथित अवैध लेन-देन के लिए उन्हें 'बिचौलिया' कहा गया। CBI ने आरोप लगाया कि 8 फरवरी, 2010 को 556.262 मिलियन यूरो के VVIP चॉपर की आपूर्ति के लिए हुए सौदे में सरकारी खजाने को अनुमानित 398.21 मिलियन यूरो (लगभग 2666 करोड़ रुपये) का नुकसान हुआ था। ED ने जून, 2016 में माइकल के खिलाफ एक अभियोजन शिकायत दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्हें अगस्तावेस्टलैंड से 30 मिलियन यूरो (लगभग 225 करोड़ रुपये) मिले थे।
Case Title: CHRISTIAN MICHEL JAMES v. UNION OF INDIA, SLP(Crl) No. 7103/2026