पक्षकार द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों के संग्रह में मिले AI से बने फर्जी फैसले, सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने एक "अवांछित घटना" की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें अपीलकर्ताओं की ओर से जमा किए गए मामलों के संग्रह में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) द्वारा बनाए गए ऐसे फैसलों का इस्तेमाल किया गया, जिनका असल में कोई अस्तित्व ही नहीं है। कोर्ट ने इस मामले में शामिल वकीलों के आचरण पर चिंता जताई।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने GSTAAD होटल्स प्राइवेट लिमिटेड और नियो कैप्रिकॉर्न प्लाजा प्राइवेट लिमिटेड की उन अपीलों को खारिज किया, जिनमें उन्होंने अपने खिलाफ शुरू की गई दिवालियापन (Insolvency) की कार्यवाही को चुनौती दी थी। कोर्ट ने दर्ज किया कि प्रतिवादियों ने तुरंत इस संग्रह पर आपत्ति जताई, और आरोप लगाया था कि इसमें ऐसे फैसले शामिल हैं जो कभी हुए ही नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"जब कोर्ट ने सवाल पूछा तो अपीलकर्ताओं के वकील (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड) ने सारा दोष अपीलकर्ताओं पर मढ़ने की कोशिश की। साथ ही यह जताने की कोशिश की कि उन्हें पता ही नहीं था कि उस संग्रह में क्या है।"
फैसले में आगे दर्ज किया गया कि बाद में अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर वकील ने इस घटना की जिम्मेदारी ली और अपीलकर्ताओं की तरफ से माफी मांगी। कोर्ट ने पहले भारी जुर्माना (Costs) लगाने पर विचार किया, लेकिन पहले अपीलकर्ता की मौत की जानकारी मिलने के बाद कोर्ट ने जुर्माना लगाने का विचार छोड़ दिया और आदेश दिया कि कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।
कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब वह उन कंपनियों की अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016' (IBC) की धारा 7 के तहत दिवालियापन याचिकाओं को स्वीकार करने का फैसला बरकरार रखा गया।
कर्ज की रकम को लेकर विवाद होने पर भी दिवालियापन याचिका स्वीकार की जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिवालियापन याचिका स्वीकार करने के चरण में वित्तीय लेनदार (Financial Creditor) को केवल दस्तावेजों के संक्षिप्त मूल्यांकन के जरिए यह साबित करना होता है कि डिफॉल्ट (भुगतान में चूक) हुआ है। उसे कॉर्पोरेट देनदार के खातों का पूरा मिलान करके बकाया रकम की सटीक राशि साबित करने की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"दिवालियापन कार्यवाही (CIRP) शुरू होने का आधार 'डिफॉल्ट' का होना है, न कि लेनदार के पूरे दावे का अंतिम फैसला होना।" बेंच ने स्पष्ट किया कि बकाया कर्ज की सटीक राशि को लेकर होने वाले विवाद - जिसमें ब्याज की गणना, दंड शुल्क या अन्य अकाउंटिंग प्रविष्टियां शामिल हैं - किसी स्थापित डिफॉल्ट को खत्म नहीं करते और न ही धारा 7 के तहत आवेदन को स्वीकार किए जाने से रोकते हैं, बशर्ते IBC की धारा 4 के तहत निर्धारित कानूनी सीमा (थ्रेशोल्ड) पूरी होती हो।
कोर्ट ने कहा,
"आवेदन स्वीकार करने के चरण में यह देखा जाता है कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के आधार पर डिफॉल्ट होने की संभावना कितनी अधिक है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि यह सीमा जानबूझकर कम रखी गई है, ताकि विवादित तथ्यों की पूरी सुनवाई (ट्रायल) करने के बजाय, केवल शुरुआती तौर पर (प्राइमा फेसी) यह तय किया जा सके कि वित्तीय कर्ज और डिफॉल्ट मौजूद है या नहीं।
कोर्ट ने समझाया कि IBC में दो चरणों वाली प्रक्रिया है: पहले चरण में डिफॉल्ट का एक संक्षिप्त निर्धारण होता है। उसके बाद 'कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस' (CIRP) के दौरान दावों की विस्तृत जांच और उनकी सटीक राशि तय की जाती है।
कोर्ट ने कहा कि अगर आवेदन स्वीकार करने के चरण में ही अथॉरिटी को बकाया कर्ज की सटीक राशि तय करने के लिए कहा जाए तो IBC की धारा 18 और IBBI (CIRP) नियमों के तहत 'रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल' को सौंपे गए कार्यों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
इसके अलावा, कोर्ट ने धारा 7 के तहत डिफॉल्ट साबित करने के लिए दस्तावेजी सबूतों की एक प्राथमिकता सूची (पदानुक्रम) भी तय की। 'इंफॉर्मेशन यूटिलिटी' द्वारा जारी किया गया डिफॉल्ट का प्रमाणित रिकॉर्ड एक बहुत मजबूत सबूत माना जाता है। यह अपने आप में, शुरुआती तौर पर (प्राइमा फेसी) डिफॉल्ट को साबित करने के लिए काफी है, जब तक कि इसके खिलाफ कोई स्पष्ट, ठोस, विश्वसनीय और पुख्ता सबूत न पेश किया जाए। अन्य दस्तावेजों - जैसे लोन एग्रीमेंट, अकाउंट स्टेटमेंट और कर्ज की स्वीकृति (एक्नॉलेजमेंट ऑफ लायबिलिटी) - का मूल्यांकन एक साथ मिलकर किया जाना चाहिए।
Case Title : Deepak Raheja and Another v. Omkara Assets Reconstruction Private Ltd. and Another