पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के खिलाफ TMC सांसदों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा

Update: 2026-01-12 10:10 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने आज पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ी चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं को चुनौती देने वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों की याचिकाओं पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से जवाब मांगा।

इस मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ कर रही है। यह आवेदन टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन द्वारा दाखिल किए गए हैं।

डेरेक ओ'ब्रायन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित निर्देश व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए जारी किए जा रहे हैं, जिससे बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) बिना किसी औपचारिक लिखित आदेश के कार्रवाई कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं की एक नई श्रेणी — “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” (तार्किक विसंगति) — बनाई है, जिसके तहत लगभग 1.32 करोड़ मतदाताओं को उनके विवरण में कथित गड़बड़ियों के आधार पर अर्ध-न्यायिक सुनवाई के लिए नोटिस भेजे जा सकते हैं। सिब्बल ने कहा कि ये प्रक्रियाएं बेहद अजीब हैं और इनके लिए कोई विधिवत लिखित आदेश मौजूद नहीं है।

चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा, जिस पर कोर्ट ने एक सप्ताह का समय दिया और निर्देश दिया कि आयोग दोनों सांसदों — ओ'ब्रायन और डोला सेन — की याचिकाओं पर एक साझा जवाब दाखिल करे। मामले को अगले सोमवार के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

अपनी याचिका में सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग SIR प्रक्रिया के दौरान व्हाट्सऐप जैसे अनौपचारिक माध्यमों से निर्देश जारी कर रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया का कोई ऑडिट ट्रेल नहीं बन पाता और यह नागरिकों के मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित करता है। उन्होंने “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी को भी चुनौती दी है, जिसके तहत नामों की वर्तनी, माता-पिता के नाम, उम्र या अन्य विवरणों में अंतर के आधार पर कंप्यूटर एल्गोरिद्म से चिन्हित 1.36 करोड़ मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा सकते हैं, जबकि इसके लिए कोई स्पष्ट लिखित दिशानिर्देश मौजूद नहीं हैं।

टीएमसी सांसद डोला सेन की अलग याचिका में कहा गया है कि SIR से जुड़े आदेश मनमाने और असंवैधानिक हैं और इससे वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने का खतरा है।

डोला सेन की याचिका पर दाखिल अपने जवाब में निर्वाचन आयोग ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा है कि याचिका में लगाए गए आरोप पूरी तरह गलत हैं, सिवाय उन बातों के जिन्हें विशेष रूप से स्वीकार किया गया है।

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