सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने का आदेश दिया। यह टीम बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के परिसर में कुछ वकीलों पर हुए हमले के आरोपों की जांच करेगी। ये वकील BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ विरोध कर रहे थे।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ताओं (पीड़ित वकीलों) की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देते हुए यह याचिका दायर की, जिसमें CBI जांच की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज की थी कि उनके पास संबंधित मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराने का दूसरा विकल्प मौजूद है।

22 अगस्त को याचिकाकर्ताओं द्वारा पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में कही गई बातों पर गौर करने के बाद, और उन प्रतिवादियों (Respondents) के हितों पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े जिन्हें अभी तक नोटिस नहीं भेजा गया, बेंच ने घटना की उचित जांच सुनिश्चित करने और जांच को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने के लिए कुछ निर्देश जारी किए।

जारी किए गए निर्देश इस प्रकार है:

(i) दिल्ली पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करें कि IP एस्टेट SHO के पास याचिकाकर्ताओं द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की उचित जांच हो और इसके लिए एक SIT का गठन किया जाए, जिसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (DCP रैंक के) करें।

(ii) इस बीच याचिकाकर्ता संबंधित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष अपने कानूनी उपाय का लाभ उठा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान, भूषण ने तर्क दिया कि CBI या किसी स्वतंत्र SIT से जांच की मांग इसलिए की गई, क्योंकि दिल्ली पुलिस सरकार के कार्यकारी नियंत्रण में है और BCI प्रमुख मनन कुमार मिश्रा सत्ताधारी पार्टी के सांसद हैं।

जब जस्टिस बागची ने कहा कि CBI के मामले में भी ऐसी ही बात उठाई जा सकती है तो वकील ने एक अंतर बताया। उन्होंने कहा कि CBI प्रमुख का चयन केवल सरकार द्वारा नहीं किया जाता है। वास्तव में, 3-सदस्यीय हाई-पावर्ड सिलेक्शन कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल होते हैं।

भूषण ने आगे कहा कि बार काउंसिल का काम उन वकीलों के खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की कार्रवाई करना था, जिन्होंने विरोध कर रहे वकीलों की पिटाई की थी, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया।

उन्होंने कहा,

"मिस्टर मनन मिश्रा के बयान से पता चलता है कि वे उन वकीलों को जानते थे। उनका कहना है कि ये 'कॉकरोच' (प्रदर्शनकारी वकील) विरोध कर रहे थे, तभी कुछ वकील आए और उन्हें भगा दिया। इसलिए दूसरे वकीलों के साथ मारपीट करने के लिए BCI द्वारा प्रोफेशनल मिसकंडक्ट (पेशेवर कदाचार) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, वे इसके उलट काम कर रहे हैं।"

भूषण ने यह भी बताया कि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से दिल्ली पुलिस के पास जाने को कहा और वे गए भी। लेकिन 2 महीने बीत जाने के बाद भी उनकी शिकायत पर कोई FIR दर्ज नहीं की गई।

जब जस्टिस बागची ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के लिए मजिस्ट्रेट के सामने प्राइवेट शिकायत करना बेहतर हो सकता है, क्योंकि मजिस्ट्रेट के पास भी जांच की शक्ति होती है, तो भूषण ने दावा किया कि उनके पास CCTV फुटेज नहीं है।

जस्टिस बागची ने जवाब दिया,

"कोर्ट आपको एक्सेस (फुटेज देखने की अनुमति) देगा, आपके क्लाइंट्स को निष्पक्ष [जांच] का अधिकार है और हम यह सुनिश्चित करने के लिए यहां हैं। सवाल सिर्फ़ तरीके का है।"

जहां तक ​​भूषण की इस बात का सवाल है कि याचिकाकर्ताओं को यह नहीं पता था कि उन पर हमला करने वाले कौन थे, CJI ने कहा कि मजिस्ट्रेट मामले का संज्ञान लेने से पहले इसका पता लगा सकते हैं।

जस्टिस बागची ने कहा कि बेंच सीनियर पुलिस अधिकारी से इस "अपराध" की जांच करने और रिपोर्ट सौंपने के लिए कहेगी, बिना इस बात से प्रभावित हुए कि अपराध संज्ञेय (Cognizable) है या नहीं। इस बीच, CJI ने कहा कि याचिकाकर्ता मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज करा सकते हैं, क्योंकि आखिरकार संज्ञान वहीं लिया जाएगा।

एक मौके पर जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि पुलिस को दी जाने वाली शिकायत "अज्ञात" लोगों के खिलाफ होनी चाहिए। इस पर भूषण ने कहा कि कम से कम एक व्यक्ति का नाम तो पता है - BCI चीफ मनन मिश्रा का। जज ने बताया कि कथित हमले के समय BCI चीफ वहां मौजूद नहीं थे। हालांकि, भूषण ने आरोप लगाया कि आरोपी वकील मनन मिश्रा के कहने पर ही विरोध कर रहे वकीलों को पीटने आए थे।

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की,

"ऐसा लगता है कि आप हमलावरों के बजाय चेयरमैन पर मुकदमा चलाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं।"

भूषण ने फिर कहा कि BCI चीफ ने ही आरोपी वकीलों को उकसाया था, जिन्होंने बाद में विरोध कर रहे वकीलों के साथ मारपीट की। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास शायद कुछ नाम हैं, भले ही सभी न हों।

जस्टिस बागची ने जवाब दिया,

"जांच चलने दें।"

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