सुप्रीम कोर्ट ने समीर वानखेड़े के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द करने से इनकार किया, चार्जशीट का जवाब देने का नया मौका दिया

Update: 2026-04-05 13:02 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2021 के कॉर्डेलिया क्रूज ड्रग्स मामले के सिलसिले में IRS अधिकारी समीर वानखेड़े के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द करने से इनकार किया। हालांकि, निर्देश दिया कि जांच में कोई भी अगला कदम उठाने से पहले उन्हें चार्जशीट का जवाब देने का मौका दिया जाए।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि वह कार्रवाई रद्द करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन यह माना कि 7 मार्च, 2026 को जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति वानखेड़े को चार्जशीट का जवाब दाखिल करने का पर्याप्त मौका दिए बिना की गई।

कोर्ट ने वानखेड़े को दो हफ़्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसके बाद के दो हफ़्तों के भीतर यह तय करने के लिए नया फैसला लें कि जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया जाए या नहीं।

कोर्ट ने कहा,

"हालांकि, हम हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश में दखल देने के पक्ष में नहीं हैं, हमारी राय है कि 07.03.2026 को जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी की नियुक्ति याचिकाकर्ता को चार्जशीट का जवाब दाखिल करने का पर्याप्त मौका दिए बिना की गई। इस कारण से हम याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने और आज से दो हफ़्तों के भीतर चार्जशीट का जवाब दाखिल करने की अनुमति देते हैं। प्रतिवादी, याचिकाकर्ता के जवाब पर विचार करने के बाद उसके बाद के दो हफ़्तों के भीतर यह फैसला लेंगे कि जांच अधिकारी और प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्त किया जाए या नहीं।"

यह मामला वानखेड़े के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ा है, जिस पर आरोप है कि कॉर्डेलिया क्रूज मामले की नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) जांच से हटाए जाने के बाद उन्होंने एक पूर्व उप कानूनी सलाहकार के साथ फोन पर बातचीत के ज़रिए जांच को प्रभावित करने की कोशिश की। यह आरोप 18 अगस्त, 2025 की चार्ज मेमोरेंडम का आधार है, जो उस बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट पर आधारित है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के उस आदेश को रद्द किया था, जिसने वानखेड़े के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द किया था। इसलिए उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुनवाई के दौरान, वानखेड़े की ओर से पेश सीनियर वकील पी.एस. पटवालिया ने दलील दी कि चार्जशीट में कोई आरोप नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने पहले वानखेड़े के दावे को मान लिया था और उनके प्रमोशन का निर्देश दिया, लेकिन उस आदेश को न तो चुनौती दी गई और न ही उसका पालन किया गया, जिसके चलते अवमानना ​​याचिका दायर करनी पड़ी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अवमानना ​​की कार्यवाही में चेयरमैन की मौजूदगी की मांग किए जाने के बाद ही अधिकारियों ने CAT के आदेश को चुनौती दी।

पटवालिया ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने बार-बार यह सवाल उठाया कि चार्जशीट के अभाव में प्रमोशन से कैसे इनकार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चार्जशीट 2025 में जारी की गई, यानी घटनाओं के लगभग तीन साल बाद, जबकि चार्जशीट में जिस कॉल ट्रांसक्रिप्ट पर भरोसा किया गया, वह ढाई साल से उपलब्ध थी और हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते समय उस पर विचार भी किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि चार्जशीट केवल वानखेड़े को प्रमोशन से वंचित करने के लिए जारी की गई।

जस्टिस नरसिम्हा ने टिप्पणी की कि यह ऐसा मामला नहीं था, जिसमें वानखेड़े के खिलाफ बिल्कुल कुछ भी न हो, और कहा कि कोर्ट ज़रूरत पड़ने पर दखल देगा, लेकिन उन्हें पूरी कार्यवाही को रद्द करना उचित नहीं लगा।

उन्होंने कहा,

"ऐसा नहीं है कि यह बिल्कुल कोरा कागज़ है, जहां कुछ भी नहीं है। जब हमारी अंतरात्मा को ज़रूरत महसूस होती है तो दखल देने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। ऐसा लगता है कि यह ऐसी स्थिति नहीं है, जहां हमें दखल देकर पूरी चीज़ को रद्द करने की ज़रूरत हो।"

उन्होंने संकेत दिया कि इसके बजाय कोर्ट अनुशासनात्मक कार्यवाही के शीघ्र निपटारे का निर्देश देगा।

पटवालिया ने इसका विरोध करते हुए दलील दी कि ऐसे निर्देश से तत्काल सेवा से बर्खास्तगी हो सकती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वानखेड़े के जवाब का इंतज़ार किए बिना ही एक जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया गया, जिससे उन्हें निष्पक्ष अवसर से वंचित कर दिया गया। पटवालिया ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी भी आरोप को साबित करने के लिए कोई सहायक दस्तावेज़ या गवाह मौजूद नहीं थे और उन्होंने चार्जशीट को रद्द करने की मांग की।

अंततः कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी की पिछली नियुक्ति मान्य नहीं होगी और वानखेड़े को जवाब देने का अवसर देने के बाद ही एक नया निर्णय लिया जाना चाहिए।

Case Title – Sameer Dnyandev Wankhede v. Union of India & Anr.

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