फर्जी वकीलों की पहचान और सोशल मीडिया आचार संहिता की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, बार काउंसिल से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में फर्जी वकीलों की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर वकील सत्यापन व्यवस्था और वकीलों के लिए सोशल मीडिया आचार संहिता बनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया, राज्य बार काउंसिलों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को नोटिस जारी किया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने दायर की।
याचिका में भारत के विधिक पेशे के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्टर बनाने की मांग की गई, जिसमें देशभर के सभी पंजीकृत वकीलों और उनकी शैक्षणिक योग्यताओं का सत्यापन किया जा सके। इसके साथ ही वकीलों के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल व्यवहार संबंधी आचार संहिता बनाने की भी मांग की गई।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानूनी पेशे में उत्पन्न होने वाली कई समस्याओं का समाधान युवा वकीलों को मजबूत बनाकर किया जा सकता है।
उन्होंने कहा,
“सबसे अच्छा तरीका है कि बार के युवा सदस्यों को मजबूत किया जाए। जब तक उन्हें पेशे में सुरक्षित स्थान नहीं मिलेगा, नियमित प्रशिक्षण नहीं मिलेगा और भीड़भाड़ वाली अदालतों में अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक ऐसी समस्याएं बनी रहेंगी। हमारी पूरी उम्मीद युवा वकीलों और आने वाली पीढ़ी पर टिकी है।”
सोशल मीडिया पर कानूनी पेशे से जुड़े लोगों की गतिविधियों पर चर्चा करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालत ने ऐसे कई आपत्तिजनक और असंगत बयान देखे हैं, जिनका कानून से कोई संबंध नहीं दिखता।
उन्होंने टिप्पणी की,
“हम आपको ऐसे कई उदाहरण दिखा सकते हैं, जिनमें बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं। हमें पूरा विश्वास है कि उनका कानून से कोई लेना-देना नहीं है। यह पीछे के दरवाजे से प्रवेश करने वालों जैसा मामला है।”
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि वकीलों का सत्यापन और डिजिटल आचरण, दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई वकील सोशल मीडिया पर कोई टिप्पणी करता है तो आम जनता उसे अधिक विश्वसनीय मानती है, क्योंकि वह एक पेशेवर व्यक्ति होता है।
हालांकि, चीफ जस्टिस ने कहा कि अधिकांश वकील जिम्मेदार पेशेवर होते हैं और अपने नैतिक दायित्वों को समझते हैं। उनके अनुसार सोशल मीडिया पर अनुचित व्यवहार करने वाले कई लोग संभव है कि वास्तव में पंजीकृत अधिवक्ता ही न हों।
उन्होंने कहा,
“वकील सामान्यतः बहुत जिम्मेदार होते हैं। वे कानून जानते हैं और पेशेवर नैतिकता का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। जो लोग इस प्रकार का आचरण कर रहे हैं, वे संभव है कि वास्तव में पंजीकृत अधिवक्ता भी न हों।”
सुनवाई के दौरान अदालत ने देशभर के वकीलों का एक केंद्रीकृत डिजिटल डाटाबेस बनाने के प्रस्ताव पर भी विचार किया।
चीफ जस्टिस ने इसे एक अभिनव विचार बताते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक की मदद से इसे लागू किया जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए देश के विधि विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों का सहयोग आवश्यक होगा, क्योंकि उन्हें अपने विधि स्नातकों का विवरण उपलब्ध कराना पड़ेगा।
अदालत ने याचिकाकर्ता को प्रस्तावित व्यवस्था का विस्तृत खाका प्रस्तुत करने के लिए एक पूरक नीति-पत्र दाखिल करने की अनुमति भी दी।
याचिका में राष्ट्रीय डिजिटल वकील रजिस्टर की स्थापना की मांग की गई, जिसमें प्रत्येक वकील को एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान संख्या दी जाए, उसके पंजीकरण की स्थिति का तत्काल सत्यापन हो सके अनुशासनात्मक कार्रवाई का रिकॉर्ड उपलब्ध हो और क्यूआर कोड आधारित सार्वजनिक प्रोफाइल बनाई जा सके।
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने याचिका में यह भी कहा कि वर्तमान में वकीलों का रिकॉर्ड विभिन्न राज्य बार काउंसिलों के पास बिखरा हुआ है और देश स्तर पर कोई सार्वजनिक सत्यापन योग्य डाटाबेस उपलब्ध नहीं है।
इसके अलावा याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश देने की मांग की गई कि वह वकीलों के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल आचार संहिता तैयार करे, जिसमें भ्रामक प्रचार, खरीदे गए पुरस्कारों के जरिए स्वयं का प्रचार-प्रसार और अन्य अनुचित गतिविधियों पर नियंत्रण के प्रावधान हों। साथ ही पेशेवर आचरण से जुड़ा एक अनिवार्य ऑनलाइन ट्रेनिंग कोर्स भी वकीलों के नामांकन की शर्त बनाया जाए।
मामले की अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार, बार काउंसिलों और अन्य संबंधित संस्थाओं का पक्ष सुनेगा।