पश्चिम बंगाल SIR मामला: सीएम के भड़काऊ भाषण, चुनाव अधिकारियों को धमकियां: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जताई गंभीर चिंता

Update: 2026-02-06 10:32 GMT

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान कथित हिंसा, धमकी और चुनाव अधिकारियों के काम में बाधा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल किया।

हलफनामे में आयोग ने कहा कि राज्य में चुनाव ड्यूटी कर रहे अधिकारियों को डराया जा रहा है और कई मामलों में उनकी शिकायतों पर FIR तक दर्ज नहीं की जा रही है।

चुनाव आयोग का आरोप है कि राज्य प्रशासन की ओर से बूथ लेवल अधिकारियों और अन्य चुनावकर्मियों को मिल रही धमकियों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

आयोग ने यह भी कहा कि पूरे देश में पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव अधिकारी इस तरह की रुकावटों और दबाव का सामना कर रहे हैं, जबकि अन्य राज्यों में यह प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही है।

हलफनामे में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। आयोग का कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए डर फैलाने वाले और भड़काऊ भाषणों के कारण चुनाव अधिकारियों के बीच भय का माहौल बन गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कुछ अधिकारियों ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर SIR ड्यूटी से हटाए जाने की मांग की।

चुनाव आयोग ने यह जवाबी हलफनामा सनातनी संसद की उस याचिका के जवाब में दाखिल किया, जिसमें अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन तक राज्य पुलिस बल को चुनाव आयोग के अधीन तैनात करने की मांग की गई।

हलफनामे में 24 नवंबर, 2025 की एक गंभीर घटना का भी उल्लेख किया गया, जिसमें एक भीड़ ने कथित तौर पर पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय का घेराव किया, जबरन घुसने की कोशिश की, तोड़फोड़ की, कार्यालय को बाहर से बंद कर दिया और अधिकारियों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन से रोका।

चुनाव आयोग का कहना है कि इस घटना में न तो FIR दर्ज की गई और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई। हालांकि इसके बाद राज्य के शीर्ष निर्वाचन अधिकारियों को एक-एक निजी सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध कराया गया।

चुनाव आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी देश के एकमात्र ऐसे चुनाव अधिकारी हैं, जिन्हें भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा खतरे के आकलन के बाद 'वाई प्लस' श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई।

हलफनामे के अनुसार प्रारूप मतदाता सूची में राज्य में करीब 58 लाख मतदाताओं को अनुपस्थित, मृत या स्थानांतरित पाया गया। मतदाताओं की स्थिति की पुष्टि के लिए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों द्वारा लगभग 1.51 करोड़ नोटिस जारी किए जा रहे हैं। ऐसे में इस संवेदनशील चरण पर राज्य सरकार का सहयोग अत्यंत आवश्यक है।

चुनाव आयोग ने राज्य के कुछ नेताओं के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि एक वर्तमान मंत्री ने चुनाव आयोग की टांगें तोड़ देने की धमकी दी, जबकि एक विधायक ने कहा कि SIR के दौरान नाम हटाना आग से खेलने जैसा होगा। आयोग ने मुख्यमंत्री द्वारा जनता से कानून अपने हाथ में लेने की कथित अपील का भी उल्लेख किया।

हलफनामे में कहा गया,

“राज्य की माननीय मुख्यमंत्री ने लगातार ऐसे सार्वजनिक भाषण दिए , जो स्वभाव से भड़काऊ हैं और जिनके कारण मतदाता सूची के निर्माण और पुनरीक्षण में लगे चुनाव अधिकारियों के बीच भय और दबाव का माहौल पैदा हुआ।”

14 जनवरी, 2026 की एक प्रेस वार्ता का हवाला देते हुए आयोग ने कहा,

“उन्होंने SIR प्रक्रिया को लेकर डर फैलाया, भ्रामक और गलत जानकारी दी, चुनाव अधिकारियों को खुले तौर पर धमकाया और मतदाताओं के बीच भय उत्पन्न करने की कोशिश की।”

चुनाव आयोग ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने अपने एक भाषण में माइक्रो-ऑब्जर्वर का नाम सार्वजनिक रूप से लिया, जिससे एक कर्तव्यनिष्ठ चुनाव अधिकारी को अलग-थलग कर उस पर अनावश्यक दबाव और डर बनाया गया।

आयोग का कहना है कि इन घटनाओं और बयानों का असर इतना गंभीर रहा कि नौ माइक्रो-ऑब्जर्वरों ने सामूहिक रूप से मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर SIR ड्यूटी से खुद को अलग कर लिया।

हलफनामे में 15 जनवरी, 2026 की एक और घटना का जिक्र है, जब SIR का काम चल रहे एक प्रखंड विकास अधिकारी के कार्यालय पर कथित तौर पर करीब 700 लोगों की भीड़ ने हमला कर तोड़फोड़ की।

इस मामले की सुनवाई सोमवार को प्रधान जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ करेगी।

बता दें, पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर उस याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा था, जिसमें 2025 की मतदाता सूची के आधार पर आगामी चुनाव कराने की मांग की गई।

चुनाव आयोग की ओर से यह हलफनामा एडवोकेट प्रतीक कुमार और कुमार इत्सव द्वारा तैयार किया गया, जबकि सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू ने इसे अंतिम रूप दिया।

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