नेताजी सुभाषचंद्र बोस की अस्थियां भारत लाने की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने किया सुनवाई से इनकार

Update: 2026-03-12 08:05 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेताजी सुभाषचंद्र बोस की अस्थियां भारत लाने की मांग से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से इनकार किया। यह याचिका नेताजी के ग्रैंड नेफ्यू आशीष राय की ओर से दायर की गई थी। अदालत के रुख के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई की शुरुआत में ही पीठ ने कहा कि इस विषय पर पहले भी कई याचिकाएं दायर हो चुकी हैं और उन्हें खारिज किया जा चुका है।

चीफ जस्टिस ने कहा,

“यह मामला बार-बार कोर्ट के सामने क्यों लाया जा रहा है?”

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2024 में भी इसी तरह की एक याचिका खारिज की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि पहले की याचिकाएं नेताजी के जीवित होने की घोषणा और उनके ठिकाने की जांच की मांग से जुड़ी थीं, जबकि वर्तमान याचिका का उद्देश्य जापान के टोक्यो स्थित रेंकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों को भारत लाना है।

इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया,

“सबसे पहले यह बताइए कि अस्थियां हैं कहां?”

इस पर सिंघवी ने कहा कि भारत के लगभग सभी राष्ट्राध्यक्ष जापान के रेंकोजी मंदिर जाकर उन अस्थियों को श्रद्धांजलि दे चुके है जिन्हें नेताजी की अस्थियां माना जाता है।

पीठ ने यह भी पूछा कि इस मांग के समर्थन में नेताजी के परिवार के कितने सदस्य हैं। सिंघवी ने कहा कि नेताजी की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी बेटी हैं और वह इस याचिका का समर्थन करती हैं। उन्होंने बताया कि वह सुनवाई के दौरान ऑनलाइन भी मौजूद हैं।

हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि जब नेताजी की बेटी ही उनकी उत्तराधिकारी हैं तो याचिका भी उन्हें ही दायर करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराधिकारी को स्वयं कोर्ट के सामने आना चाहिए और पर्दे के पीछे से लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए।

सिंघवी ने अदालत से अनुरोध किया कि नेताजी की बेटी को बोलने की अनुमति दी जाए लेकिन पीठ ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वह इस याचिका में पक्षकार नहीं हैं। इसके बाद सिंघवी ने कहा कि नेताजी की बेटी इस मुद्दे पर नई याचिका दायर करेंगी और वर्तमान याचिका को वापस लेने की अनुमति मांगी।

अदालत ने याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले को समाप्त कर दिया।

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