POP मूर्ति विसर्जन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को बॉम्बे हाइकोर्ट जाने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से बनी मूर्तियों के निर्माण और उनके विसर्जन की अनुमति देने वाले आदेशों को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिकाओं का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को बॉम्बे हाइकोर्ट का रुख करने को कहा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी दिशानिर्देशों को पहले से ही हाइकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है और मामला वहां विचाराधीन है। ऐसे में फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
याचिका में बॉम्बे हाइकोर्ट के दो अंतरिम आदेशों और राज्य सरकार की मूर्ति विसर्जन नीति को चुनौती दी गई। इस नीति के तहत पांच फुट (अब छह फुट) से अधिक ऊंचाई की POP मूर्तियों को कुछ शर्तों के साथ प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जित करने की अनुमति दी गई, बशर्ते कि बाद में नगर निकाय उन्हें बाहर निकालें। याचिका वकील सृष्टि अग्निहोत्री के माध्यम से दायर की गई और इसकी पैरवी सीनियर वकील अनीता शेनॉय ने की।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 12 मई 2020 को मूर्ति विसर्जन के लिए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए, जिनके तहत पीओपी मूर्तियों के निर्माण और प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन पर प्रतिबंध है। उनके अनुसार हाइकोर्ट ने इन दिशानिर्देशों को बाध्यकारी मानने के बजाय केवल सलाहात्मक मान लिया जो कानून के अनुरूप नहीं है।
इससे पहले बॉम्बे हाइकोर्ट ने 9 जून, 2025 के अंतरिम आदेश में 30 जनवरी, 2025 के अपने पूर्व निर्देशों में संशोधन करते हुए POP से मूर्ति बनाने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी मूर्तियों का प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन बिना हाइकोर्ट की अनुमति के नहीं किया जा सकेगा।
बाद में 24 जुलाई, 2025 को हाइकोर्ट ने राज्य सरकार की मूर्ति विसर्जन नीति को मार्च, 2026 तक लागू रखने की अनुमति दी और मूर्तियों की अधिकतम ऊंचाई पांच फुट से बढ़ाकर छह फुट कर दी। साथ ही यह निर्देश दिया गया कि छह फुट तक की मूर्तियों का विसर्जन अनिवार्य रूप से कृत्रिम तालाबों और पानी के टैंकों में किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
“हमें बताया गया कि वर्ष 2020 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी दिशानिर्देशों और उनकी प्रकृति को हाइकोर्ट में चुनौती दी गई और मामला विचाराधीन है। इसलिए इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को हाइकोर्ट में लंबित कार्यवाही में सहायता करने की स्वतंत्रता दी जाती है।”
अदालत ने यह भी कहा कि हाइकोर्ट द्वारा जारी अन्य निर्देश समयबद्ध थे और अब वे प्रभावहीन हो चुके हैं। इसलिए उन पर दायर विशेष अनुमति याचिकाएं भी निरर्थक हो गईं।