वकील ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में हाईकोर्ट जज पर लगाए थे आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने दी अवमानना ट्रायल को मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल) को वकील के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना की कार्यवाही में दखल देने से इनकार किया। इस वकील पर आरोप था कि उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बॉम्बे हाईकोर्ट के मौजूदा जज पर बिना किसी आधार के आरोप लगाए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी जज पर लगाए गए निजी किस्म के आरोप पुख्ता सबूतों पर आधारित होने चाहिए। उन्हें सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय कानूनी उपायों के ज़रिए ही उठाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने वकील नीलेश ओझा के खिलाफ हाईकोर्ट द्वारा शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही में दखल देने से इनकार करते हुए कहा,
"हालांकि जवाबदेही और निगरानी संवैधानिक लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं, लेकिन किसी जज पर लगाए गए निजी किस्म के आरोप पुख्ता सामग्री पर आधारित होने चाहिए और कानून के अनुसार ही उठाए जाने चाहिए। ऐसा न करने पर वे न्यायिक स्वतंत्रता की पूरी बुनियाद को ही कमज़ोर करने का जोखिम पैदा करते हैं।"
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने टिप्पणी की,
"रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर पहली नज़र में विचार करने पर, जिस तरह से आरोप अभी लगाए गए, वे उस सुस्थापित सीमा का उल्लंघन करते प्रतीत होते हैं। वे केवल कानून या तथ्य की किसी त्रुटि को पहचानने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बिना किसी स्पष्ट आधार के गलत इरादों का आरोप लगाने तक फैले हुए हैं। इस तरह के दावे, विशेष रूप से जब वे हाई कोर्ट के किसी मौजूदा जज के खिलाफ निर्देशित हों तो उनके गंभीर स्वरूप के अनुरूप एक निश्चित स्तर की ज़िम्मेदारी और प्रमाण की मांग करते हैं। इसलिए आरोपों का लहजा और दायरा ऐसी चिंताएं पैदा करता है, जो पक्षकारों के बीच चल रहे तात्कालिक विवाद से कहीं आगे तक जाती हैं।"
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब अपीलकर्ता नीलेश ओझा बॉम्बे हाईकोर्ट में एक आपराधिक रिट याचिका में पेश हो रहे थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से एक मौजूदा जज ("जस्टिस X") पर पक्षपात का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि इस मामले में आरोपी के साथ पारिवारिक संबंधों के कारण जज का 'हितों का टकराव' (conflict of interest) है।
इस मुद्दे को न्यायिक प्रक्रियाओं, जैसे कि सुनवाई से हटने (Recusal) की याचिका दायर करके उठाने के बजाय वकील ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसमें उन्होंने जज की निष्पक्षता पर आरोप लगाए और उन्हें पद से हटाने (Disqualification) का सुझाव दिया। इस घटना के बाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 'अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971' के तहत वकील को 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने वकील की उस याचिका को खारिज किया, जिसमें उसने जज को मामले में एक पक्ष (Party) बनाने की मांग की थी। साथ ही कोर्ट ने उन अतिरिक्त अवमानना आरोपों के संबंध में भी कार्यवाही शुरू की, जो वकील ने जज को पक्ष बनाने की मांग वाली अदालती याचिकाओं में लगाए। इसके अलावा, कोर्ट ने उन अन्य वकीलों को भी एक चेतावनी जारी की, जो इन याचिकाओं से जुड़े हुए। विवादित कार्यवाही में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में अपीलकर्ता के अनुचित आचरण की आलोचना की गई। अपीलकर्ता ने एक मौजूदा जज के खिलाफ अपनी शिकायतों को दर्ज कराने के लिए उचित कानूनी रास्ता अपनाने के बजाय प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जज पर बिना किसी आधार के आरोप लगाए।
अदालत ने टिप्पणी की,
“अपीलकर्ता-अवमाननाकर्ता ने जिस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस करके और सार्वजनिक रूप से एक मौजूदा जज के खिलाफ आरोप लगाए, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। किसी लंबित कानूनी विवाद को इस तरह से सार्वजनिक करना कि उससे कार्यवाही सनसनीखेज बन जाए, या संस्था—या उसके संवैधानिक अंग, यानी जजों—की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचे, एक वकील से अपेक्षित अनुशासन के पूरी तरह विपरीत है। पेशेवर नैतिकता की मांग है कि न्यायिक आदेशों के खिलाफ शिकायतों को उचित न्यायिक मंचों के माध्यम से स्थापित कानूनी उपायों द्वारा उठाया जाना चाहिए, न कि ऐसी सार्वजनिक टिप्पणियों के माध्यम से, जो न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता या ईमानदारी के बारे में लोगों की राय को प्रभावित कर सकती हों। जिस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई और आरोप लगाए गए, वह पहली नज़र में कानून के पेशे से जुड़े किसी सदस्य के लिए अनुचित है। यह उस मर्यादा, संयम, पेशेवर और नैतिक ज़िम्मेदारी के मानकों से कमतर है, जिसकी मांग कानूनी पेशा करता है।”
जज पर निजी हमले करना गलत
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक फ़ैसलों की तर्कसंगत और नेकनीयत आलोचना करना तो ठीक है, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके किसी जज की ईमानदारी पर निजी हमले करना या आरोप लगाना, संस्था को "सनसनीखेज़" बनाने या "बदनाम" करने के अलावा कुछ नहीं है; और यह एक वकील के नैतिक कर्तव्यों के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा,
"हालांकि जवाबदेही और जाँच-पड़ताल संवैधानिक लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं, लेकिन किसी जज पर निजी किस्म के आरोप लगाने के लिए पक्के सबूत होने चाहिए और उन्हें पूरी तरह से कानून के मुताबिक ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता की पूरी बुनियाद ही कमज़ोर पड़ने का खतरा रहता है।"
कोर्ट ने कहा,
"बार के सदस्यों को न्याय व्यवस्था में एक खास और ज़िम्मेदारी वाली जगह मिली हुई है। इसलिए कोर्ट के अंदर हो या बाहर, उनका बर्ताव संयम, गंभीरता और अपने पेशे के नैतिक उसूलों के प्रति वफ़ादारी दिखाने वाला होना चाहिए।"
कोर्ट ने यह भी बताया कि बार के सदस्य, जो कोर्ट के अधिकारी भी होते हैं, उन पर संस्था की गरिमा बनाए रखने की ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। उन्हें अपनी शिकायतें सिर्फ़ कानूनी तरीकों से ही उठानी चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों पर।
कोर्ट ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा,
"इसलिए हम इस मोड़ पर इन कार्यवाहियों को रोकने के पक्ष में नहीं हैं। हम हाईकोर्ट से गुज़ारिश करते हैं कि वह इस मामले को तेज़ी से आगे बढ़ाए और इसमें उठने वाले सभी मुद्दों पर पूरी आज़ादी से और उनकी अपनी खूबियों के आधार पर फ़ैसला सुनाए।"
Cause Title: NILESH C. OJHA VERSUS HIGH COURT OF JUDICATURE AT BOMBAY THROUGH SECRETARY & ORS.