सेल्स टैक्स पर सरचार्ज/एडिशनल टैक्स लगाने की राज्यों की शक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने उस लंबे समय से लंबित मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें राज्य विधानसभाओं की उस विधायी क्षमता पर सवाल उठाया गया था, जिसके तहत वे सही तरीके से लगाए गए सेल्स या परचेज टैक्स के आधार पर सरचार्ज, एडिशनल टैक्स, लेवी या सेस लगा सकती हैं।
संविधान पीठ - जिसमें चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी. भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं - 1999 में 'अर्जुन फ्लोर मिल्स बनाम ओडिशा राज्य' मामले में उठाए गए सवाल की जांच कर रही है। यह मामला ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसे 1997 में जोड़ा गया। इस धारा में 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर वाले डीलरों के लिए 10% और 1 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले डीलरों के लिए 15% एडिशनल टैक्स का प्रावधान था।
यह मामला 'अर्जुन फ्लोर मिल्स' से जुड़ा है, जिसमें धारा 5A की वैधता को चुनौती दी गई। 'होएक्स्ट फार्मास्यूटिकल्स' मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फाइनेंस एक्ट के तहत लगाए गए सरचार्ज को राज्य सूची की एंट्री 54 के दायरे में आने वाला सेल्स टैक्स मानते हुए सही ठहराया। 'अर्जुन फ्लोर मिल्स' मामले में याचिकाकर्ता का तर्क था कि 'होएक्स्ट फार्मास्यूटिकल्स' का फैसला इस बात पर आधारित है कि लेवी एंट्री 54 से संबंधित है।
उन्होंने 'इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु राज्य' मामले में सात जजों की बेंच के फैसले का हवाला दिया, जिसमें माइनिंग रॉयल्टी से जुड़े सेस और सरचार्ज को इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि राज्य सातवीं अनुसूची के तहत उसे सौंपे गए अधिकार क्षेत्र से बाहर कानून नहीं बना सकता। बाद में 'एस. कोडार बनाम केरल राज्य' मामले में पांच जजों की बेंच ने तमिलनाडु एडिशनल सेल्स टैक्स एक्ट, 1970 के तहत एडिशनल सेल्स टैक्स को सही ठहराया था और इस तर्क को खारिज किया कि यह लेवी इनकम पर टैक्स है।
इन फैसलों में अंतर को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में 'अर्जुन फ्लोर मिल्स' मामले को रेफर किया था। इसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या डीलर के सालाना टर्नओवर के आधार पर लगाई गई ऐसी लेवी राज्य सूची की एंट्री 54 के तहत राज्य की विधायी क्षमता से बाहर हो सकती है और संघ सूची की एंट्री 82 के अधिकार क्षेत्र में दखल दे सकती है।
बेंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि रेफरेंस के दायरे पर सभी पक्षों के बीच आम सहमति थी और कोर्ट बिना किसी लंबी सुनवाई के, रेफरेंस ऑर्डर के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है।
12 अगस्त, 2026 के आदेश का ज़िक्र करते हुए मेहता ने आगे कहा कि यह रेफरेंस 'एस कोडार बनाम केरल राज्य' मामले में पांच जजों की बेंच और 'होएक्स्ट फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम बिहार राज्य' मामले में तीन जजों की बेंच के अलग-अलग विचारों के कारण ज़रूरी हुआ था। इसके अलावा, 'इंडिया सीमेंट लिमिटेड बनाम तमिलनाडु राज्य' मामले में सात जजों की बेंच की टिप्पणियों से भी मतभेद और बढ़ गया।
मेहता ने कहा कि जिस कानूनी सवाल पर फ़ैसला होना है, वह यह है कि "क्या बिक्री या खरीद पर सरचार्ज, अतिरिक्त टैक्स, लेवी या सेस लगाना - जिसकी गणना सही तरीके से लगाए गए बिक्री या खरीद टैक्स के आधार पर की जाती है - राज्य विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर है? और सुनवाई के दौरान कोई अन्य मुद्दे भी उठ सकते हैं।"
2017 में गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) लागू होने के बाद उठाए गए सवालों की व्यावहारिक अहमियत न होने की ओर इशारा करते हुए मेहता ने कहा,
"मेरा कहना है कि 2017 के बाद जब टैक्स व्यवस्था में बदलाव हुआ और GST लागू हुआ तो ये सवाल शायद सिर्फ़ सैद्धांतिक (अकादमिक) रह गए हैं। हो सकता है कि कुछ इक्का-दुक्का मामले लंबित हों, लेकिन शायद उनकी संख्या तीन अंकों में भी न हो। हमारी यही समझ है।"
उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार को 'इंडिया सीमेंट' मामले के फ़ैसले की सही होने पर संदेह था। उन्होंने कहा कि यह नौ जजों की बेंच के फ़ैसले का विषय था और उसे रद्द कर दिया गया। इस संबंध में एक क्यूरेटिव याचिका भी दायर की गई। हालाँकि, उन्होंने यह भी साफ़ किया कि केंद्र मौजूदा कार्यवाही में इस मुद्दे पर ज़ोर नहीं देना चाहता। इन दलीलों का जवाब देते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि 'इंडिया सीमेंट' अब मान्य कानून नहीं रहा और बाद के फ़ैसलों में 'कोडार' मामले को मंज़ूरी मिली है।
CJI ने कहा,
“इंडिया सीमेंट केस का फैसला अब सही कानून नहीं माना जाता। कोडार केस का हवाला मंज़ूरी के साथ दिया गया, और टैक्स की देनदारी कितनी है, यह टैक्स की प्रकृति तय करने का एकमात्र मुख्य कारण नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा कि बेंच खुले मन से कोडार केस की समीक्षा करेगी। साथ ही यह भी बताया कि इसे नौ जजों की बेंच की मंज़ूरी भी मिली थी। हालांकि अलग संदर्भ में। मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MADA) बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया का भी यह तर्क देने के लिए ज़िक्र किया गया कि रॉयल्टी में टैक्स शामिल नहीं होता, क्योंकि रॉयल्टी का मतलब ज़मीन पर लगाया जाने वाला शुल्क है, जो लीज़ की तरह एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत ज़रूरी होता है।
इसके विपरीत, दूसरी तरफ़ के वकील ने कहा कि कोडार केस पर शक़ सिर्फ़ इंडिया सीमेंट केस के साथ संभावित टकराव के संदर्भ में किया गया, और कोडार केस खुद रेफरेंस के लिए नहीं है, बल्कि सामान्य पैमानों पर इसकी समीक्षा की जानी है।
इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि MADA केस में कोडार का हवाला मंज़ूरी के साथ दिया गया। कोडार का हवाला देते हुए वकील ने तर्क दिया कि एक बार जब अथॉरिटी के पास टैक्स लगाने की शक्ति होती है तो उसके पास अतिरिक्त टैक्स लगाने की शक्ति भी होती है।
इस पर जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि विधायी क्षमता (लेजिस्लेटिव कॉम्पिटेंस) का फ़ैसला टैक्स की प्रकृति के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि अतिरिक्त टैक्स के आधार पर। हालांकि, दोनों वकीलों ने जस्टिस बागची के नज़रिए पर आपत्ति जताई।
पंजाब से जुड़े मामले के संबंध में CJI ने कहा:
“जहां तक पंजाब के मामले की बात है, उसे अलग करना होगा, क्योंकि इससे राज्य की विधायी क्षमता का सवाल उठता है। पंजाब सोशल सिक्योरिटी एक्ट, 2000 को हाईकोर्ट ने सही ठहराया। हालांकि हम इस बात की समीक्षा करेंगे कि यह सही कारणों से था या गलत कारणों से। अगर विधायिका बाद में कोई ऐसा कानून बनाती है, जो पहले की कार्यकारी कार्रवाई की जगह ले लेता है तो क्या उस कानून को पहले की कार्यकारी कार्रवाई के आधार पर रद्द किया जा सकता है? कानून के खिलाफ़ एस्टॉपेल (कानूनी रोक) नहीं हो सकता।”
CJI सूर्यकांत ने संकेत दिया कि बेंच खुले मन से कोडार केस की समीक्षा करने को तैयार है।
उन्होंने आगे कहा,
“हमारे सामने एक और लॉजिस्टिकल या उचित प्रक्रिया से जुड़ा मुद्दा यह है कि कोडार को एक बार मंज़ूरी मिल चुकी है, भले ही सीधे इस संदर्भ में नहीं, लेकिन नौ जजों की बेंच ने कोडार पर मंज़ूरी की मुहर लगाई।”
Case: Arjun Flour Mills v State of Odisha (Civil Appeal No. 8763 of 1994)