जब कोई नागरिक जेल में हो तो राज्य ट्रायल को लंबा नहीं खींच सकता: सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामले में कर्नाटक के 'बेतुके' प्रॉसिक्यूशन प्लान की आलोचना की

Update: 2026-08-13 04:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को UAPA मामले में कर्नाटक सरकार के "बेतुके" प्रॉसिक्यूशन प्लान (मुकदमा चलाने की योजना) पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि जब कोई आरोपी ट्रायल के दौरान जेल में बंद हो तो राज्य को "ट्रायल को सालों तक लंबा खींचने की छूट" नहीं मिल सकती।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने शाहिद खान की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं। खान 22 सितंबर, 2022 से हिरासत में है। उस पर 'पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया' के सदस्यों के साथ मिलकर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और गैर-कानूनी व हिंसक गतिविधियों में शामिल होने की बड़ी साज़िश रचने का आरोप है।

चार्जशीट में IPC की धाराओं 153A, 121A, 120B और 121 के अलावा, गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धाराओं 17 और 18 का भी ज़िक्र किया गया।

कोर्ट ने खास तौर पर गवाहों से पूछताछ के लिए प्रॉसिक्यूशन की योजना की आलोचना की। मामले में कुल 707 गवाह हैं, जिनमें से राज्य ने कहा कि खान के मामले में 50 गवाहों से पूछताछ का प्रस्ताव था। 64 सुरक्षित गवाहों (Protected Witnesses) में से केवल तीन या चार से ही उसके खिलाफ पूछताछ का प्रस्ताव था।

जस्टिस बागची ने प्रॉसिक्यूशन के तरीके को "किसी परीकथा जितना बेतुका" बताया। उन्होंने सवाल किया कि राज्य कैसे एक साल तक गवाहों से पूछताछ का प्रस्ताव दे सकता है, जबकि उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि असल में कम से कम कितने गवाहों की ज़रूरत है।

कोर्ट ने राज्य के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि आरोपी द्वारा बार-बार अंतरिम ज़मानत और डिस्चार्ज (आरोप से बरी होने) की अर्ज़ियां लगाने के कारण ट्रायल में देरी हुई।

जस्टिस बागची ने कहा,

"क्या अंतरिम ज़मानत की अर्ज़ी से ट्रायल में रुकावट आती है? आप जो प्रॉसिक्यूशन प्लान दे रहे हैं, वह किसी परीकथा जितना बेतुका है। आप 1 साल में गवाहों से पूछताछ करना चाहते हैं... हम यह साफ़ तौर पर जानना चाहते हैं कि आप कम से कम कितने गवाहों से पूछताछ करना चाहते हैं... [...] लापरवाही भरा रवैया दिखाता है। हम प्रॉसिक्यूशन एजेंसी की संवेदनहीनता दिखा रहे हैं, जो तब भी साफ़ जानकारी न देने की विलासिता दिखा सकती है, जब कोई नागरिक ट्रायल के इंतज़ार में जेल में सड़ रहा हो। अंतरिम अर्ज़ियों और गवाहों से पूछताछ के बारे में आपकी समझ गलत है। जिस दिन गवाह मौजूद होता है, उसी दिन उससे पूछताछ की जाती है और ज़मानत की अर्ज़ी पर भी उसी दिन विचार किया जाता है; भारत में कहीं भी गवाह को वापस नहीं भेजा जाता। अगर आप अपना गवाह नहीं लाते तो इसका मतलब यह नहीं है कि अंतरिम अर्ज़ी दाखिल नहीं की जाएगी।"

जज ने इस बात पर भी चिंता जताई कि प्रॉसिक्यूशन एजेंसियां ​​अक्सर तेज़ी से ट्रायल करके सज़ा दिलाने के बजाय ज़मानत की अर्ज़ियों का विरोध करने पर ज़्यादा ध्यान देती दिखती हैं। जज ने पहले भी एक दूसरे मामले में ऐसी ही चिंता जताई थी।

इस बीच CJI सूर्यकांत ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट के अंतरिम ज़मानत खारिज करने के आदेश में 10-12 पेज थे। उन्होंने कहा कि ऐसी अर्जियों को आम तौर पर एक छोटे से आदेश के ज़रिए निपटाया जा सकता है ताकि न्यायिक समय का इस्तेमाल असल ट्रायल के लिए किया जा सके।

बेंच ने ज़ोर दिया कि जब कोई आरोपी पहले ही सालों से हिरासत में हो तो प्रॉसिक्यूशन कार्यवाही में अनिश्चित काल तक देरी नहीं कर सकता। कोर्ट ने पहले राज्य को निर्देश दिया था कि वह एक ठोस प्रॉसिक्यूशन प्लान पेश करे, जिसमें उन गवाहों की संख्या बताई जाए जिनसे पूछताछ की जानी है।

खान की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आदित्य सोंधी ने कहा कि याचिकाकर्ता चार साल से ज़्यादा समय से हिरासत में है और उसने सिर्फ़ एक अंतरिम ज़मानत अर्ज़ी दाखिल की थी, जिसकी ज़रूरत उसके ससुर की मौत के कारण पड़ी थी। उन्होंने यह भी बताया कि IPC अपराधों के संबंध में इसी तरह के आरोपों का सामना कर रहे नौ अन्य आरोपी पहले से ही ज़मानत पर हैं।

आखिरकार, कोर्ट ने खान की जेल की अवधि को देखते हुए अपने अतिरिक्त हलफनामे में राज्य का प्रस्ताव स्वीकार करने से इनकार किया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मामला ऐसे जज के पास लंबित है, जो 97 अन्य ट्रायल भी देख रहे थे।

कोर्ट ने केंद्र, कर्नाटक राज्य और कर्नाटक हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वे पर्याप्त संख्या में विशेष NIA कोर्ट स्थापित करने के कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि याचिकाकर्ता का केस देख रहे ट्रायल जज को 10-12 ट्रायल (याचिकाकर्ता का केस भी शामिल) सौंपे जाएं और याचिकाकर्ता को 3 सुरक्षित गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद ज़मानत के लिए अर्ज़ी देने की छूट दी।

Case : Shahid Khan v. State of Karnataka | SLP(Crl) No. 6100/2026

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