एटीएम से रुपए नहीं निकले फिर भी खाते से काटी राशि, एसबीआई बैंक पीड़ित ग्राहक को एक लाख रुपए चुकाए,पढ़िए फैसला

Update: 2019-10-09 06:55 GMT

हैदराबाद स्थित एक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को निर्देश दिया है कि वह अपने एक ग्राहक को मुआवजा और मुकदमेबाजी के खर्च के रूप में एक लाख रुपये का भुगतान करे। बैंक ने अपने एटीएम से लेनदेन विफल होने के बावजूद ग्राहक के खाते से राशि काट ली थी।

शिकायतकर्ता-ग्राहक, उदेरु सर्वोत्तम रेड्डी का मामला यह था, कि वह हैदराबाद स्थित एसबीआई के एक एटीएम से दस हजार रुपये निकालने गया था, लेकिन एटीएम की तकनीकी खराबी के कारण लेनदेन अस्वीकार कर दिया गया था और उसे कोई नकदी नहीं मिली थी। हालाँकि, कुछ 20 दिनों के बाद, उक्त राशि उनके खाते से डेबिट कर दी गई थी।

इसी के साथ, शिकायतकर्ता ने उस बैंक से संपर्क किया, जिस पर बैंक ने ग्राहक को सूचित किया कि कुछ समय के लिए पैसे 'होल्ड' पर रखे गए हैं, जब तक कि उन्हें इस बात की पुष्टि नहीं हो जाती थी कि एटीएम से कैश निकला था या नहीं। हालांकि बाद में यह दावा करते हुए कि लेन-देन सफल था और उसके खाते से रुपए काट लिए गए हैं।

इसके बाद, शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत के निवारण के लिए बैंकिंग लोकपाल, हैदराबाद से संपर्क किया, जिसने उससे पूछताछ किए बिना ही कार्यवाही को बंद कर दिया। नतीजतन, शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 12 के तहत फोरम से संपर्क किया, जिसमें दावा किया गया कि बैंक की सेवाओं में कमी थी।

कार्रवाई के दौरान, प्रतिवादी बैंक ने कहा कि शिकायतकर्ता का लेनदेन सफल रहा और कुछ तकनीकी खराबी के कारण राशि को तुरंत उसके खाते में डेबिट नहीं किया जा सका। इसके अलावा, लेन-देन के बाद एटीएम में कोई अतिरिक्त राशि नहीं पाई गई थी और यह स्वाभाविक था कि शिकायतकर्ता को उक्त राशि प्राप्त हुई थी।

बैंक ने फोरम के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि

1-मामले में उठाए गए विवाद पर सवाल करते हुए कहा कि यह विवाद उपभोक्ता विवाद नहीं था।

2-इस विवाद में तथ्यों और कानून के जटिल प्रश्न शामिल थे जिनके लिए सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा निर्णय की आवश्यकता थी।

प्रतिवादी द्वारा दिए तर्कों को खारिज करते हुए, अध्यक्ष, निम्मा नारायण और सदस्य, मीना रामनाथन की पीठ ने कहा कि इस मामले में फोरम का क्षेत्राधिकार न बनने का सवाल नहीं उठता है क्योंकि शिकायतकर्ता का प्रतिवादी बैंक में बचत खाता था और वह बैंक का 'ग्राहक' था। । इसके अलावा, चूंकि उसने बैंक के एटीएम का उपयोग किया था, इसलिए बैंक शिकायतकर्ता का सेवा प्रदाता भी था।

पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता ने लेनदेन की तारीखों के 90 दिनों के भीतर बैंक और बैंकिंग लोकपाल से संपर्क किया था और अभी तक, बैंक अपनी दलीलों के समर्थन में सीसीटीवी फुटेज पेश करने में विफल रहा था। (सीसीटीवी फुटेज को 90 दिनों के लिए संरक्षित किया जाता है, जब तक कि उस अवधि में कोई विवाद उत्पन्न न हो जाए, ऐसी स्थिति में फुटेज को भविष्य के लिए संरक्षित किया जाता है)

इस संबंध में पीठ ने कहा,

''बैंक की यह दलील कि-इस बात का कोई सबूत नहीं है कि ग्राहक ने घटना की तारीख से एसबीआई से शिकायत की है,इसको साबित करने का भार एसबीआई पर था और उसके लिए सीसीटीवी फुटेज पेश की जानी चाहिए थी। परंतु दलील दी गई कि सीसीटीवी की फुटेज अधिकतम 90 दिनों तक संरक्षित रखी जाती है और मामले में घटना की तारीख से 90 दिन से ज्यादा की अवधि बीत गई थी। इसलिए सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है,यह दलील कुछ नहीं बल्कि झूठ है।

विपरीत पक्षकार नंबर 1 और 2 द्वारा सीसीटीवी फुटेज को पेश न करना, जबकि शिकायतकर्ता ने 26-01-2017 से 90 दिनों के संरक्षण की अवधि के भीतर बैंक से शिकायत की थी, इससे एक प्रतिकूल निष्कर्ष निकालता है कि शिकायकर्ता को 10000 रुपये नहीं मिले।''

पीठ ने आगे कहा, कि तकनीकी समस्या, जैसा कि बैंक का दावा है कि उसके कारण शिकायतकर्ता के खाते से डेबिट करने में देरी हुई थी, ने निष्पक्ष चेतावनी दी थी कि कोई भी नकदी नहीं निकाली गई है।

"मामले में तथ्य यह है कि 10,000 रुपये (केवल दस हजार रुपये) शिकायतकर्ता के खाते से 15-02-2017 को डेबिट किया गया था, जो दर्शाता है कि एसबीआई के एटीएम में तकनीकी समस्याएं थीं। शिकायतकर्ता को 26-01-2017 को एसबीआई के एटीएम से 10000 रुपये(केवल दस हजार रुपये) की नकदी नहीं मिली होगी,इसकी काफी संभावना है। इसलिए शिकायतकर्ता को सेवा प्रदान करने में विपरीत पक्षकार नंबर 1 और 2 की ओर से सेवा में कमी रही है।''

इस प्रकार बैंक को उसकी सेवाओं में कमी के लिए उत्तरदायी मानते हुए, आयोग ने बैंक को निर्देश दिया है कि वह शिकायतकर्ता को हुई मानसिक पीड़ा और असुविधाओं के लिए 90000 रुपये का मुआवजा दें। इसके साथ ही मुकदमेबाजी के खर्च के लिए अलग से 10000 रुपये दिए जाएं और यह सभी राशि तीस दिन के अंदर दे दी जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो शिकायतकर्ता 8 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज का हकदार होगा।

शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व एडवोकेट के.सी. वेंकट रेड्डी ने किया था और एसबीआई का प्रतिनिधित्व मैसर्स वामराजु श्री कृष्णुडु ने किया था।  



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