NALSAR विवाद के बाद जब BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की काफी आलोचना हो रही है, तब सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के प्रमुख के तौर पर उनके बने रहने पर सवाल उठाए गए।

एडवोकेट योगमाया एमजी द्वारा दायर इस रिट याचिका में मिश्रा के कार्यकाल और इस पद पर उनके लंबे समय तक बने रहने को चुनौती दी गई।

याचिका में बताया गया कि मिश्रा पहली बार 2012 में BCI चेयरमैन बने थे। 2014 में थोड़े समय के ब्रेक के बाद वह नवंबर 2014 में इस पद पर लौटे और तब से चेयरमैन बने हुए हैं। मार्च 2025 में उन्हें फिर से निर्विरोध चुना गया। याचिकाकर्ता इसे उनका लगातार सातवां कार्यकाल बता रहे हैं।

मुख्य चुनौती BCI द्वारा अप्रैल 2025 में घोषित पांच साल के कार्यकाल को लेकर है। गजट नोटिफिकेशन में मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि BCI नियमों के नियम 12(2) में चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल के कार्यकाल या सदस्यता खत्म होने तक (जो भी पहले हो) का प्रावधान है। याचिका में कहा गया है कि कोई प्रशासनिक नोटिफिकेशन नियमों द्वारा तय सीमा से ज़्यादा कार्यकाल नहीं बढ़ा सकता।

याचिकाकर्ता इस तर्क को भी चुनौती देते हैं कि उत्तराधिकारी चुने जाने तक BCI सदस्यों के पद पर बने रहने से चेयरमैन भी अनिश्चित काल तक पद पर बने रह सकते हैं। उनका तर्क है कि एडवोकेट्स एक्ट की धारा 4(3) का प्रावधान केवल एक अंतरिम व्यवस्था है। यह चेयरमैन के अलग कार्यकाल को नहीं बढ़ाता है।

नए चुनाव की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से 21 अप्रैल 2025 के गजट नोटिफिकेशन को रद्द करने और BCI को इसे वापस लेने या निरस्त करने का निर्देश देने की मांग की गई।

इसमें यह आदेश देने की भी मांग की गई कि मिश्रा और वाइस-चेयरमैन पद छोड़ दें और स्वतंत्र निगरानी में तय समय-सीमा के भीतर नए चुनाव कराए जाएं।

याचिकाकर्ता ने ऐसे नियम बनाने की भी मांग की, जो किसी व्यक्ति के BCI चेयरमैन या वाइस-चेयरमैन के तौर पर काम करने के कार्यकाल की संख्या पर सीमा तय करें। इसमें 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' और पारदर्शी रोटेशनल सिस्टम की मांग की गई है ताकि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को BCI का प्रमुख बनने का मौका मिल सके।

याचिका में ऐसे सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई, जिनसे यह पक्का किया जा सके कि एक्टिंग, एड-हॉक, कार्यवाहक या अंतरिम नियुक्तियों के ज़रिए कार्यकाल की सीमा को दरकिनार न किया जा सके।

राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल

याचिका में BCI के चेयरमैन रहते हुए मिश्रा की राजनीतिक गतिविधियों पर भी सवाल उठाए गए।

इसमें 2024 में BJP द्वारा नॉमिनेट किए जाने के बाद उनके राज्यसभा सदस्य बनने का ज़िक्र है। याचिकाकर्ता का यह दावा नहीं है कि राजनीतिक जुड़ाव की वजह से ही वे अयोग्य हो जाते हैं। बल्कि, तर्क यह है कि एक ही समय में राजनीतिक पद पर बने रहना और वकीलों के लिए देश के वैधानिक रेगुलेटर का प्रमुख होना, संस्थागत निष्पक्षता और स्वतंत्रता की धारणा पर सवाल खड़े करता है।

याचिका में राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दों पर BCI के प्लेटफ़ॉर्म से जारी सार्वजनिक बयानों का भी ज़िक्र है। ऐसा ही एक बयान 23 जुलाई, 2026 का था, जो छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों से संबंधित था; इसमें उन्होंने इन आंदोलनों को विदेशी-प्रायोजित और राष्ट्र-विरोधी ताकतों द्वारा संचालित बताया। याचिकाकर्ता सवाल उठाता है कि क्या ऐसे बयानों को BCI की जनरल काउंसिल ने मंज़ूरी दी थी और क्या वे काउंसिल के वैधानिक कार्यों के दायरे में आते हैं।

BCI ट्रस्ट की जांच के लिए स्वतंत्र समिति

याचिका का एक बड़ा हिस्सा BCI ट्रस्ट PEARL-FIRST [बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ट्रस्ट फ़ॉर प्रमोशन ऑफ़ एजुकेशन (लीगल एंड प्रोफ़ेशनल) एंड रिफ़ॉर्म्स इन लॉ एंड फ़ॉर इम्प्रूवमेंट ऑफ़ रिसर्च एंड सोशल ट्रेनिंग] से संबंधित है।

याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने का आग्रह करता है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज या हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस करें। समिति को CAG द्वारा नॉमिनेट किए गए ऑडिटर और वित्तीय व तकनीकी विशेषज्ञों की मदद मिलेगी।

समिति से PEARL-FIRST की वैधता और कामकाज की जांच करने को कहा गया, जिसमें इसके 18 सितंबर, 2020 के ट्रस्ट डीड का आर्टिकल 3(iii) भी शामिल है।

याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान 11 मैनेजिंग ट्रस्टियों को स्थायी बनाता है, चाहे वे BCI के सदस्य बने रहें या नहीं। तर्क यह है कि इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही और संस्थागत नियंत्रण पर सवाल उठते हैं।

समिति BCI, 1974 के ट्रस्ट, PEARL-FIRST और IIULER, गोवा के बीच संबंधों की भी जांच करेगी।

फंड और ट्रस्ट अकाउंट्स का ऑडिट

याचिका में खास तौर पर BCI के वैधानिक फंड; ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन से हुई कमाई; का समय-सीमा के भीतर ऑडिट कराने की मांग की गई। संस्थागत प्राप्तियां; ट्रस्ट का वित्त; वेंडर अनुबंध; और संबंधित-पक्ष लेनदेन।

याचिकाकर्ता का कहना है कि AIBE में हजारों लॉ ग्रेजुएट द्वारा अनिवार्य शुल्क का भुगतान शामिल है और उन बैंक अकाउंट्स के बारे में सवाल बने हुए हैं, जिनमें शुल्क प्राप्त होता है, उनका नियंत्रण किसके पास है, व्यय की मंजूरी और ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण।

याचिका में BCI और PEARL-FIRST के बीच वित्तीय और प्रशासनिक संबंधों की जांच की भी मांग की गई।

IIULER और नियुक्तियां जांच के दायरे में

याचिकाकर्ता ने गोवा में BCI द्वारा चलाए जा रहे लॉ कॉलेज - इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च (IIULER) - पर भी सवाल उठाए।

वह चाहती हैं कि एक स्वतंत्र समिति अप्रैल 2012 के बाद से हुई नियुक्तियों, भर्ती, प्रमोशन और प्रशासनिक कार्यों की जांच करे, जहां भी प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता हो।

याचिका में खास तौर पर IIULER, गोवा, ट्रस्ट और संबंधित संस्थानों में नियुक्तियों से जुड़े आरोपों का ज़िक्र किया गया। इसमें विज्ञापन, आवेदन, चयन समिति की कार्यवाही, मूल्यांकन शीट, नियुक्ति आदेश, सेवा रिकॉर्ड, संबंधों का खुलासा और वित्तीय मंज़ूरी जैसे रिकॉर्ड की मांग की गई।

याचिकाकर्ता ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन आरोपों को साबित हो चुके निष्कर्षों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। वह रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच चाहती हैं।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से BCI, 1974 के ट्रस्ट, PEARL-FIRST और IIULER, गोवा के मूल रिकॉर्ड को तुरंत सुरक्षित रखने और पेश करने का आदेश देने की भी मांग की गई।

इनमें ट्रस्ट डीड, प्रस्ताव, एजेंडा, नोटिस, उपस्थिति रजिस्टर, मिनट्स (बैठक का विवरण), इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और मेटाडेटा, खाते, बैंक स्टेटमेंट, अनुबंध, टेंडर दस्तावेज़, भर्ती रिकॉर्ड और बातचीत शामिल हैं।

इसमें केस के लंबित रहने के दौरान इन रिकॉर्ड को नष्ट करने, बदलने या हटाने से रोकने के आदेश की भी मांग की गई।

BCI के कामकाज में ज़्यादा पारदर्शिता

आखिर में, याचिका में BCI के कामकाज को और ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई।

इसमें मांग की गई कि हर सदस्य को बैठक से पहले उचित नोटिस और एजेंडा मिले। इसमें प्रस्तावों को रिकॉर्ड करने और एक तय समय के भीतर कन्फर्म मिनट्स को प्रकाशित करने की मांग की गई।

इसमें BCI और उसके द्वारा नियंत्रित, प्रमोट किए गए या बड़े पैमाने पर वित्तपोषित संस्थानों या ट्रस्टों के सालाना स्वतंत्र रूप से ऑडिट किए गए खातों और महत्वपूर्ण अनुबंधों को प्रकाशित करने की भी मांग की गई।

याचिकाकर्ता चाहती है कि BCI उन प्रस्तावों और फैसलों के पीछे के दर्ज कारणों का खुलासा करे जो वकीलों, छात्रों और शैक्षणिक संस्थानों पर महत्वपूर्ण असर डालते हैं।

पिछले हफ़्ते, BCI के चेयरपर्सन और वाइस चेयरपर्सन के कार्यकाल की सीमा तय करने की मांग करते हुए एक और याचिका दायर की गई।

यह याचिका वकील दीपक प्रकाश के ज़रिए दायर की गई।

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