सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक व्यक्ति जो दिवाला दिवालियापन संहिता की धारा 29 ए के तहत प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के लिए अयोग्य है, कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230 के तहत समझौता और व्यवस्था की योजना का प्रस्ताव नहीं कर सकता है।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (लिक्विडेशन प्रोसेस) रेगुलेशंस, 2016 की संवैधानिक वैधता को भी बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया है कि वह व्यक्ति जो आईबीसी के तहत कॉरपोरेट देनदार के लिए प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के लिए पात्र नहीं है, किसी भी तरह से इस तरह के समझौते या व्यवस्था के लिए पक्ष नहीं होगा।

न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए और साथ ही परिसमापन प्रक्रिया विनियमों के विनियमन 2 बी की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए ये अवलोकन किया।

एनसीएलटी ने इन मामलों में,तय किया था कि एक व्यक्ति को जो एक प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के लिए दिवाला एवं दिवालियापन संहिता की धारा 29 ए के तहत अयोग्य है, को कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230 के तहत समझौता और व्यवस्था की योजना का प्रस्ताव देने से भी प्रतिबंधित किया गया है।

शीर्ष अदालत की पीठ ने कहा,

"यह एक प्रकट बेतुकेपन की ओर ले जाएगा, अगर व्यक्ति जो एक प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के लिए अयोग्य हैं, कंपनी की परिसंपत्तियों को परिसमापन में बेचने या कॉरपोरेट देनदार की बिक्री में भाग लेना एक 'चिंता का विषय' है, जिस तरह 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत एक समझौता या व्यवस्था का प्रस्ताव करने की अनुमति दी जाती है।"

दोनों आईबीसी और कंपनी अधिनियम 2013 के विभिन्न पूर्व उदाहरणों और प्रावधानों का उल्लेख करते हुए, अदालत ने इस प्रकार निर्णय के पैरा 68 में कहा:

आईबीसी और 2013 के अधिनियम की धारा 230 के साथ इसके जुड़े विधायी इतिहास में निहित वैधानिक योजना, एक कंपनी के संदर्भ में, जो परिसमापन में है, वर्तमान मामले में विवाद के परिणाम के लिए महत्वपूर्ण है। पहला बिंदु यह है कि आईबीसी के अध्याय III के तहत परिसमापन, उस क़ानून के तहत विचार की गई कार्यवाही की संपूर्ण सरगम ​​पर चलता है। ध्यान देने योग्य दूसरा बिंदु यह है कि परिसमापन प्रक्रिया के दौरान पुनरुद्धार के तरीकों में से एक की परिकल्पना 2013 के अधिनियम की धारा 230 के सक्षम प्रावधानों में की गई है, जिसमें आईबीसी की धारा 34 के तहत नियुक्त परिसमापक का सहारा लिया जा सकता है। तीसरा बिंदु यह है कि धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था की योजना को आमंत्रित करते समय परिसमापक की वैधानिक रूप से जारी गतिविधियां बंद नहीं होती हैं। आईबीसी में परिसमापक की नियुक्ति धारा 34 में प्रदान की जाती है और धारा 35 में उनके कर्तव्यों को निर्दिष्ट किया गया है। 2013 के अधिनियम की धारा 230 के प्रावधानों का सहारा लेते हुए, आईबीसी के तहत नियुक्त परिसमापक को, ऊपर से कॉरपोरेट देनदार के पुनरुद्धार का प्रयास करना है ताकि इसे कॉरपोरेट मौत की संभावना से बचाया जा सके। पुनरुद्धार या समझौता की योजना के अनुमोदन और उसके बाद उप-धारा (6) के तहत ट्रिब्यूनल द्वारा इसकी मंज़ूरी का परिणाम यह है कि यह योजना आईबीसी के तहत नियुक्त किए गए परिसमापक सहित हितधारकों पर एक बाध्यकारी चरित्र प्राप्त करता है। इस पृष्ठभूमि में, मिस्टर बजाज की यह दलील स्वीकार करना मुश्किल है कि 2013 के अधिनियम की धारा 230 एक इकलौता प्रावधान है जिसका आईबीसी के प्रावधानों से कोई संबंध नहीं है। निस्संदेह, 2013 के अधिनियम की धारा 230 इस अर्थ में अपने दायरे में व्यापक है कि यह केवल परिसमापन में एक कंपनी या कॉरपोरेट देनदार तक ही सीमित नहीं है जो आईबीसी के अध्याय III के तहत समाप्त हो रहा है। जाहिर है, इसलिए, आईबीसी की कठोरता 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत कार्यवाही पर लागू नहीं होगी जहां प्रस्ताव या समझौता या व्यवस्था की योजना एक इकाई के संबंध में है जो आईबीसी के तहत कार्यवाही का विषय नहीं है। लेकिन, जब, वर्तमान मामले में, 2013 के अधिनियम की धारा 230 के प्रावधानों को लागू करने की प्रक्रिया इसकी उत्पत्ति का पता लगाती है या, जैसा कि यह वर्णित किया जा सकता है, आईबीसी के तहत शुरू की गई परिसमापन कार्यवाही के लिए ट्रिगर के लिए, सद्भाव में प्रावधानों के दोनों सेटों को पढ़ना आवश्यक हो जाता है। दो विधियों के बीच एक सामंजस्यपूर्ण निर्माण यह सुनिश्चित करेगा कि एक ओर जहां धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था की योजना बनाई जा रही है, यह एक तरीके से होता है जो आईबीसी के अंतर्निहित सिद्धांतों के अनुरूप है क्योंकि यह योजना एक इकाई का सम्मान करने के लिए प्रस्तावित है जो आईबीसी के अध्याय III के तहत परिसमापन से गुजर रही है। जैसे, कंपनी को उसके प्रबंधन और एक कॉरपोरेट मौत से बचाना होगा। यदि एक प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के लिए व्यक्ति , जो कंपनी की परिसंपत्तियों को परिसमापन में बेचने या कॉरपोरेट देनदार की बिक्री में भाग लेने के लिए अयोग्य हैं, तो 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत एक समझौता या व्यवस्था का प्रस्ताव '' चिंता का विषय ' है।

अदालत ने, उस समझौते को भी खारिज कर दिया, जिसमें आईबीसी की धारा 29A और धारा 35 (1) (एफ) के तहत अपात्रों को संलग्न करने की योजना 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी क्योंकि अपीलकर्ता को 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत एक प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए "अयोग्य" माना जाएगा।

अदालत ने कहा,

"हम इस विवाद में कोई योग्यता नहीं पाते हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है, एक प्रस्ताव योजना प्रस्तुत करने के चरणों, परिसमापन में एक कंपनी की संपत्ति बेचना और कंपनी को परिसमापन के दौरान एक चिंताजनक स्थिति के रूप में बेचना, सभी इंगित करते हैं कि प्रमोटर या प्रबंधन को कंपनी में पिछले दरवाजे से प्रविष्टि की अनुमति नहीं होनी चाहिए और इसलिए, इन चरणों के दौरान भाग लेने के लिए अयोग्य हैं। 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था की योजना का प्रस्ताव, जब कंपनी आईबीसी प्रावधानों के तहत परिसमापन से गुजर रही है,ये एक अबाध क्रम में रहेगा। इस प्रकार, पूर्व स्थितियों में लागू होने वाली निषेधाज्ञा स्वाभाविक रूप से उत्तरार्द्ध से जुड़ी होनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एक जैसी स्थितियों के साथ समान व्यवहार किया जा रहा है।"

अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि धारा 35 (1) (एफ) केवल उस परिसमापक पर लागू होती है, जो परिसमापन में कॉरपोरेट देनदार की संपत्ति की बिक्री का संचालन करता है, बल्कि एनएलसीटी नहीं,जो ट्रिब्यूनल के रूप में कार्य करता है, जब वह कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 230 में अपनी शक्तियों के तहत काम करता है।

इस प्रकार कहा गया:

"आईबीसी के अध्याय III के प्रावधानों के तहत नियुक्त परिसमापक को कई शक्तियों और कर्तव्य सौंपे गए हैं। आईबीसी की धारा 37 से 42 तक परिसमापन के दौरान परिसमापक की शक्तियों के बारे में बताया गया है। परिसमापक कई कार्य करता है जो कि प्रकृति और चरित्र में एक अर्ध-न्यायिक हैं।। धारा 35 (1) खुद को यह बताती है कि परिसमापक को जो शक्तियां और कर्तव्य सौंपे गए हैं, " फैसला करने वाले प्राधिकारी के निर्देशों के अधीन हैं।" परिसमापक, दूसरे शब्दों में, एनएलसीटी के अधिकार क्षेत्र के लिए कार्य करता है, जो कि सहायक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है। किसी कंपनी के संबंध में 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था की योजना, जो कि आईबीसी के तहत परिसमापन है, कानून के प्रावधान का एक सही निर्माण नहीं होगा। "

विनियमन 2 बी के लिए चुनौती का मुख्य आधार यह था कि विनियमन ने कंपनी अधिनियम की धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था के लिए एक आवेदन की प्रस्तुति के संबंध में एक अयोग्यता का परिचय देकर आईबीबीआई के अधिकार को पार कर दिया।

इस तर्क को संबोधित करते हुए, अदालत ने इस प्रकार कहा:

"हमारे विचार में स्थिति को विनियमन 2 बी के प्रावधानों से स्वतंत्र दो दृष्टिकोणों से माना जा सकता है,। हमने पहले चर्चा में संकेत दिया है कि विनियमन 2 बी की अनुपस्थिति में भी, 35 (1) (एफ) के साथ पढ़ते हुए धारा 29 ए के तहत अयोग्य व्यक्ति को धारा 230 के तहत पुनरुद्धार के लिए, एक कंपनी के मामले में , किसी योजना का प्रस्ताव करने की अनुमति नहीं है, जो आईबीसी के तहत परिसमापन से गुजर रही है।हम इस निष्कर्ष पर आए हैं, जैसा कि पहले बताए गए कारणों के लिए उल्लेख किया गया है, कि एक कंपनी जो आईबीसी के अध्याय III के प्रावधानों के तहत परिसमापन के दौर से गुजर रही है, धारा 230 के तहत प्रस्तावित समझौता या व्यवस्था परिसमापन प्रक्रिया का एक पहलू है। समझौता या व्यवस्था की योजना का उद्देश्य कंपनी को पुनर्जीवित करना है। तत्कालीन धारा 391 के प्रावधानों को लागू करते हुए सिद्धांत को मेघल होम्स (सुप्रा) के निर्णय में लिया गया था। वही तर्क जो अध्याय II के तहत प्रस्ताव प्रक्रिया में फैलता है ( धारा 29 ए के प्रावधानों के तहत ) अध्याय III के तहत परिसमापन प्रक्रिया में भी व्याप्त होता है (धारा 35 (1) (एफ) के प्रावधानों के आधार पर)। यह स्थिति होने के नाते, इसमें संदेह का कोई तरीका नहीं हो सकता है कि विनियमन 2 बी का प्रोविज़ो प्रकृति में स्पष्टीकरण के लिए है। यहां तक ​​कि अनुपस्थित रहने पर भी, धारा 29 ए के तहत अयोग्य व्यक्ति को 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था का प्रस्ताव करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसलिए हम 2 बी की वैधता के लिए चुनौती में कोई योग्यता नहीं पाते हैं।"

अपीलों को खारिज करते हुए, पीठ ने इस प्रकार निष्कर्ष निकाला:

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर, हम पाते हैं कि संसद द्वारा धारा 29A और आईबीसी की धारा 35 (1) (एफ) में लगाई गई निषेधाज्ञा को भी 2013 के अधिनियम की धारा 230 के तहत समझौता या व्यवस्था की एक योजना से जोड़ना होगा, जब कंपनी आईबीसी के तत्वावधान में परिसमापन से गुजर रही है। इसलिए, परिसमापन प्रक्रिया विनियमों का विनियमन 2 बी, विशेष रूप से विनियमन 2 बी (1) के लिए, संवैधानिक रूप से मान्य है।

केस: अरुण कुमार जगतरामका बनाम जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड [ सीए 9664/ 2019 ]

पीठ : जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह

वकील: एडवोकेट संदीप बजाज, एडवोकेट शिव शंकर बनर्जी, सीनियर एडवोकेट अमित सिब्बल, सीनियर एडवोकेट गोपाल जैन,

उद्धरण: LL 2021 SC 160

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