सही प्रावधान का जिक्र न कर पाना ही अर्जी के लिए घातक त्रुटि नहीं हो सकती : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2019-10-08 07:23 GMT

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सही प्रावधान का उल्लेख न कर पाना ही अर्जी के लिए घातक त्रुटि नहीं हो सकती, यदि संबंधित आदेश पारित करने का अधिकार कोर्ट के पास मौजूद है।

इस मामले में मूल वादी मफाजी मोतीजी ठाकुर (एमएमटी) ने भूमि से संबंधित अपने अधिकार एवं हित जयेश कुमार छकद्दस शाह (जेसीएस) को सौंपे थे। जेसीएस ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के नियम 10 के आदेश संख्या-I के तहत अर्जी दायर करके ट्रायल कोर्ट में एमएमटी की ओर से दायर मुकदमे में प्रतिवादी संख्या दो के तौर पर शामिल करने का अनुरोध किया था।

ट्रायल कोर्ट ने जेसीएस की ओर से दायर वादकालीन याचिका यह कहते हुए निरस्त कर दी थी कि मामले में उसे पक्षकार बनाया जाना जरूरी नहीं है, क्योंकि उसके पक्ष में नया कॉज ऑफ एक्शन सामने आया है तथा उसे अलग से मुकदमा दायर करना चाहिए। जेसीएस ने उसके बाद संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने इस आधार पर स्वीकार कर लिया कि यद्यपि एमएमटी का कानूनी वारिश मुकदमा वापस लेना चाहता है, वह ऐसा कर सकते हैं लेकिन जेसीएस के अधिकार बुरी तरह प्रभावित होंगे, इसलिए जेसीएस को मुकदमे में पक्षकार के तौर पर शामिल होने का हक है।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने ('पृथ्वीराजसिंह नोदुभा जडेजा (मृत) बनामम जयेशकुमार छकद्दस शाह मामले में) अपील में कहा कि जेसीएस मूल वादी के अधिकारों का सम्पत्तिभागी रहा है, इसलिए उसे एमएमटी की जगह वादी के तौर पर पक्षकार बनने का अधिकार है। पीठ ने कहा:

"हमारे अनुसार, सीपीसी के नियम 10 के आदेश- I के तहत अर्जी दायर करना गलती थी, इसे सीपीसी के नियम 10 के आदेश संख्या XXII के तहत दायर किया जाना चाहिए था। यह स्थापित कानून है कि सही प्रावधान का उल्लेख न कर पाना ही अर्जी के लिए घातक त्रुटि नहीं हो सकती, यदि संबंधित आदेश पारित करने का अधिकार कोर्ट के पास मौजूद है।"

सीपीसी के नियम 10 का आदेश-XXII किसी मुदकमे में अंतिम आदेश से पहले समानुदेशन (एसाइनमेंट) के मामले में अपनायी गयी प्रक्रिया से सम्बद्ध है, जबकि सीपीसी के नियम 10 का आदेश- (I) तीसरे पक्ष को पक्षकार बनाने से जुडा है।



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