'मनरेगा ने बहुत अच्छा काम किया': सुप्रीम कोर्ट ने दी VB-GRAM G Act को चुनौती देने की इजाज़त
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 2015 की एक जनहित याचिका (PIL) का निपटारा किया। यह याचिका महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MNREGA) के तहत मज़दूरों को देर से भुगतान के लिए मुआवज़ा देने से जुड़ी थी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने पाया कि PIL में उठाए गए मुद्दे 'स्वराज अभियान' मामले के फ़ैसले के दायरे में आते थे। फिर भी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण की दलीलों पर विचार करते हुए कोर्ट ने उन्हें 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025' (VB-G RAM G एक्ट, जिसने मनरेगा एक्ट की जगह ली है) के प्रावधानों के संबंध में नई याचिका दायर करने की छूट दी।
बता दें, PIL में दो मुद्दे उठाए गए- मनरेगा के तहत देर से मिली मज़दूरी के लिए मुआवज़ा देना, और एक्ट के तहत तय न्यूनतम मज़दूरी के बजाय राज्य द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी देना।
सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस मोहना ने कहा कि VB-G RAM G एक्ट ने पुराने ढांचे की जगह ले ली है और अब मनरेगा एक्ट लागू नहीं है।
हालांकि, भूषण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नया एक्ट न्यूनतम मज़दूरी के मामले में मनरेगा का ज़िक्र करता है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्यों द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान किया जाना चाहिए, वरना इसे ज़बरदस्ती काम कराने (Forced Labor) जैसा माना जाएगा।
भूषण ने कहा,
"अब जो मुद्दा बचा है, वह यह है कि क्या राज्यों द्वारा नोटिफ़ाई की गई न्यूनतम मज़दूरी का भुगतान किया जाना चाहिए। 'स्वराज अभियान' मामले में कोर्ट ने कहा कि भुगतान किया जाना चाहिए, लेकिन अभी तक भुगतान नहीं किया गया। नए एक्ट के तहत पूरे देश में रोज़गार आधा हो गया और इसमें राज्यों को 50% फ़ंड देने की ज़रूरत है। नए एक्ट में कहा गया कि एक न्यूनतम मज़दूरी (Floor Minimum Wage) नोटिफ़ाई की जाएगी, जो मनरेगा के तहत दी जाने वाली मज़दूरी से कम नहीं हो सकती। नए एक्ट के तहत 300 रुपये का भुगतान किया जा रहा है।"
इसके जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान के तहत काम का अधिकार (Right to Work) कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
जज ने भूषण से कहा,
"यह भाग IV के तहत एक लोकतांत्रिक आकांक्षा ज़्यादा है। उस आकांक्षा को पूरा करने के लिए राज्य नीति बनाता है, जिसमें एक तय मुआवज़ा स्तर दिया जाता है। क्या हमें इसकी तुलना अनुच्छेद 18 की सख्ती से करनी चाहिए? यह एक बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब हमें देना है। क्योंकि अगर हम ऐसा करते हैं, और राज्य अपनी सामाजिक कल्याण गतिविधियों को कम कर देता है तो क्या हम 'मैन्डमस' (आदेश) जारी करके कह सकते हैं कि आपको मनरेगा या VB-G RAM G एक्ट लागू करना ही होगा?"
वकील ने जवाब दिया कि कोर्ट ने सम्मानजनक जीवन को अनुच्छेद 21 के अधिकारों का हिस्सा माना है और सम्मानजनक जीवन के लिए ज़रूरी है कि नौकरी मिलने पर कम से कम न्यूनतम वेतन तो मिले।
आखिरकार, बेंच ने भूषण से कहा कि अगर ज़रूरत हो, तो याचिकाकर्ता नए एक्ट के प्रावधानों को चुनौती देते हुए एक नई याचिका दायर कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि CJI ने मनरेगा की एक कल्याणकारी योजना के तौर पर तारीफ़ की, लेकिन कहा कि किसी पीड़ित व्यक्ति के सामने आए बिना PIL में उठाए गए मुद्दे की जांच करना मुश्किल होगा।
CJI ने कहा,
"ग्रामीण इलाकों में लोगों ने मनरेगा की सच में तारीफ़ की। हज़ारों-लाखों लोग ऐसे है, जिनके पास आजीविका का कोई ज़रिया नहीं है। इसलिए सम्मानजनक तरीके से आजीविका कमाने के मकसद से - कि आप काम करेंगे और फिर कमाएंगे - यह योजना इतनी व्यापक थी कि गाँव में हर किसी को इसका फ़ायदा मिले। उस समय योजना के मकसद को देखते हुए न्यूनतम बकाया वेतन का सिद्धांत एक व्यावहारिक तरीका हो सकता था... मनरेगा ने ग्रामीण इलाकों में बहुत अच्छा काम किया... यह एक बहुत निस्वार्थ योजना थी, एक अच्छी, असरदार कल्याणकारी योजना थी। यह मुफ़्त में कुछ देने वाली योजना नहीं थी। न ही यह शोषण का मामला थी।"
जब भूषण ने फिर ज़ोर दिया कि कोर्ट को नए एक्ट के प्रावधानों की जांच करनी चाहिए तो CJI ने साफ़ तौर पर कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा नहीं किया जा सकता।
CJI ने कहा,
"[अगर] कोई याचिका आती है तो हम निश्चित रूप से जांच करेंगे।"
Case : ARUNA ROY AND ORS. v. UNION OF INDIA WP(C) No. 768/2015