वर्ष 2026 में एडवोकेट-ऑन-रिकार्ड (AoR) परीक्षा आयोजित न करने के सुप्रीम कोर्ट प्रशासन के निर्णय को चुनौती देते हुए अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। याचिकाकर्ता वे उम्मीदवार हैं, जिन्होंने पिछली AoR परीक्षा में केवल एक विषय में सफलता नहीं पाई और नियमों के तहत अगली परीक्षा में पुनः शामिल होने के पात्र घोषित किए गए।
मामले का उल्लेख सीनियर एडवोकेट दामा शेषाद्रि नायडू ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के समक्ष किया।
सुनवाई के दौरान जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि अभ्यर्थी कुछ वर्ष प्रतीक्षा क्यों नहीं कर सकते तब नायडू ने कहा कि याचिकाकर्ता पूर्णतः असफल अभ्यर्थी नहीं हैं बल्कि वे केवल एक पेपर से चूके थे और नियम 11(1) के तहत पुनर्परीक्षा के पात्र हैं।
उन्होंने कहा कि यदि उन्हें एक और अवसर दिया जाए तो वे परीक्षा उत्तीर्ण कर सकते हैं। इसके बाद पीठ ने मामले को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
गौरतलब है कि 30 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के परीक्षक बोर्ड ने निर्णय लिया था कि वर्ष 2026 में एओआर परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। रजिस्ट्रार एवं सचिव द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया कि एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की कुल संख्या को देखते हुए यह निर्णय लिया गया तथा अगली परीक्षा संभवतः वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट की 13 अप्रैल, 2026 तक की सूची के अनुसार एओआर की कुल संख्या 3791 थी। इसके बाद 16 अप्रैल को 205 और वकीलों को AoR के रूप में शामिल किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि परीक्षा न कराने का निर्णय उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय है, जो सीमित अंतर से पिछली परीक्षा में सफल नहीं हो पाए और जिन्हें नियमों के तहत अगला अवसर मिलना था।
मामले की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में होगी।