सत्य निकेतन हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट सख्त, सभी राज्यों की राजधानियों में बिल्डिंग कानून उल्लंघन पर मांगी रिपोर्ट
दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही पांच मंजिला इमारत गिरने के हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मामला केवल पीजी आवास तक सीमित रखने के बजाय देशभर में भवन निर्माण नियमों और जमीन के गलत इस्तेमाल के मामलों पर ध्यान केंद्रित किया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में संबंधित प्राधिकरणों से बिल्डिंग बायलॉज और भूमि उपयोग के उल्लंघन पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांग।
अदालत में एमिक्स क्यूरी सीनियर एडवोकेट अजीत कुमार सिन्हा ने बताया कि सत्या निकेतन हादसे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही सही दिशा में आगे बढ़ रही है और अवैध निर्माणों को गिराने समेत कार्रवाई शुरू हो चुकी है। हालांकि, उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का मामला केवल पीजी आवास तक सीमित नहीं है। अवैध निर्माण और आवासीय जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल जैसे मुद्दे जिम, कोचिंग सेंटर और बीपीओ जैसे प्रतिष्ठानों में भी सामने आ सकते हैं।
सिन्हा ने अदालत को बताया कि निरीक्षण के दौरान दिल्ली के सैदुलाजाब इलाके में ऐसी इमारतें मिलीं, जहां करीब 500 लोग काम कर रहे थे। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने चिंता जताते हुए कहा कि कई जगहों पर सैकड़ों लोगों को एक कमरे में इस तरह रखा जा रहा है, जैसे उन्हें ठूंस दिया गया हो, जबकि यह तक नहीं देखा जाता कि इमारत इतनी संख्या में लोगों को रखने के लिए सक्षम है या नहीं और वहां आने-जाने के लिए पर्याप्त रास्ते तक उपलब्ध हैं या नहीं।
यह सुनवाई 6 सितंबर को दिल्ली के सत्या निकेतन में पीजी के तौर पर इस्तेमाल की जा रही पांच मंजिला इमारत गिरने की घटना के बाद चल रही व्यापक कार्यवाही का हिस्सा है। हादसे में सात लोगों की मौत हुई और 12 लोग घायल हुए थे। एमिकस क्यूरी ने दिल्ली में पीजी, निजी हॉस्टल और इसी तरह के छात्र आवासों का समयबद्ध निरीक्षण और सुरक्षा ऑडिट कराने के निर्देश देने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सत्या निकेतन हादसे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही को अपने पास स्थानांतरित करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट में मामला जिस स्थिति में चल रहा है, उसे उसी तरह जारी रहने दिया जाएगा और हाईकोर्ट से मामले की कम अंतराल पर निगरानी करने का अनुरोध किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही को बाधित करने की जरूरत नहीं है।
जस्टिस अमानुल्लाह ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट शुरुआत में जमीन के गलत इस्तेमाल के मुद्दे पर खास ध्यान देगा। विशेष रूप से ऐसे आवासीय इलाकों पर ध्यान दिया जाएगा, जहां संबंधित प्राधिकरण द्वारा निर्धारित भूमि उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
बेंच ने संबंधित प्राधिकरणों को भवन निर्माण नियमों और भूमि उपयोग के उल्लंघन पर की गई कार्रवाई तथा सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के अनुपालन को लेकर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 25 मार्च को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में नगर निगमों और नगरपालिकाओं को व्यापक सर्वे कर यह पता लगाने का निर्देश दिया कि कितने आवासीय इलाकों का इस्तेमाल गैर-आवासीय गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।
5 अगस्त के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि NDMC और MCD के तहत निर्धारित इलाकों में जरूरी भौतिक सर्वे पूरा नहीं हुआ। इसके बाद दोनों निकायों को सर्वे के लिए सक्षम ड्राफ्ट्समैन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया। इसी तरह लखनऊ में भी सर्वे कराने और उसकी रिपोर्ट पेश करने को कहा गया।
गुरुवार को अदालत को बताया गया कि दिल्ली और लखनऊ के कुछ इलाकों में निरीक्षण पूरा किया जा चुका है। दिल्ली में लाजपत नगर, मालवीय नगर और सरोजिनी नगर में निरीक्षण हुआ, जबकि लखनऊ में अलीगंज इलाके का सर्वे किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट केवल दिल्ली और लखनऊ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सभी संबंधित प्राधिकरणों को 25 मार्च और 5 अगस्त के आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट अदालत के समक्ष दाखिल करनी होगी।
इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर दो बजे होगी।