जस्टिस निशा बानू को शामिल न करने से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

Update: 2026-02-06 09:51 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मद्रास हाइकोर्ट कॉलेजियम के प्रस्ताव को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता और इसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

यह रिट याचिका ए. प्रेम कुमार द्वारा दाखिल की गई थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि नवंबर, 2025 में मद्रास हाइकोर्ट कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिश शून्य है, क्योंकि उस बैठक में हाइकोर्ट की तत्कालीन दूसरी सबसे सीनियर जज जस्टिस निशा बानू को शामिल नहीं किया गया था।

गौरतलब है कि 14 अक्टूबर, 2025 को केंद्र सरकार ने जस्टिस निशा बानू का तबादला मद्रास हाइकोर्ट से केरल हाइकोर्ट किया था। हालांकि तबादले की अधिसूचना के बावजूद जस्टिस निशा बानू मद्रास हाइकोर्ट में ही कार्यरत रहीं और राष्ट्रपति की ओर से स्मरण पत्र जारी होने के बाद ही उन्होंने 19 दिसंबर, 2025 को केरल हाइकोर्ट में कार्यभार संभाला।

याचिका में सवाल उठाया गया कि इस अवधि के दौरान जब वह तबादले के बावजूद मद्रास हाइकोर्ट में बनी रहीं क्या वरिष्ठता के आधार पर उन्हें कॉलेजियम की बैठक में शामिल किया जाना चाहिए था।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट रचना श्रीवास्तव ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष दलील दी कि कॉलेजियम की संरचना ही गलत थी, क्योंकि उस समय जस्टिस निशा बानू मद्रास हाइकोर्ट की जज थीं।

उन्होंने कहा,

“कॉलेजियम की संरचना ही गलत थी। जस्टिस निशा बानू उस समय भी जज बनी हुई थीं। उन्होंने ट्रांसफर हाइकोर्ट में कार्यभार ग्रहण नहीं किया था।”

इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा,

“हम आपको केवल यह आश्वासन दे सकते हैं कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और कॉलेजियम के जज इतने सक्षम हैं कि वे हर बात पर विचार कर सकें। हमें इस बारे में सलाह देने के लिए धन्यवाद।”

जब सीनियर एडवोकेट ने हाइकोर्ट जाने की स्वतंत्रता मांगी तो चीफ जस्टिस ने कहा,

“कुछ भी मत कीजिए। इस विषय को हमारे संज्ञान में लाने के लिए आपका बहुत धन्यवाद।”

इसके बाद पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा,

“जिस मुद्दे को उठाया गया, वह न्यायिक विचारणीय नहीं है। ऐसे मामलों पर प्रशासनिक पक्ष में सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचार किया जाना चाहिए। हम इस रिट याचिका पर सुनवाई करना आवश्यक नहीं समझते।”

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