ईमानदार लोक सेवकों की आड़ में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण : जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A को क्यों असंवैधानिक ठहराया?

Update: 2026-01-14 09:15 GMT

सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि जांच या अन्वेषण शुरू करने से पहले पूर्व स्वीकृति की शर्त कानून के उद्देश्य के ही विपरीत है और यह प्रावधान ईमानदार लोक सेवकों की रक्षा करने के बजाय वास्तव में भ्रष्ट लोक सेवकों को बचाने का काम करता है।

अपने पृथक निर्णय में जो कि जस्टिस के.वी. विश्वनाथन के साथ गठित पीठ के विभाजित फैसले का हिस्सा था जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि असली प्रश्न यह नहीं है कि धारा 17A के तहत स्वीकृति कौन देगा बल्कि यह है कि क्या इस प्रकार की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता ही होनी चाहिए।

उनके अनुसार यह प्रावधान जांच की प्रक्रिया को प्रारंभिक स्तर पर ही रोक देता है। इस प्रकार भ्रष्ट अधिकारियों को अनुचित संरक्षण प्रदान करता है।

उन्होंने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा कि यद्यपि इस प्रावधान का प्रत्यक्ष उद्देश्य ईमानदार लोक सेवकों को झूठी, दुर्भावनापूर्ण और निराधार जांच से बचाना बताया गया, लेकिन इसका अंतर्निहित उद्देश्य यह है कि यह धारा एक ऐसे कवच की तरह कार्य करे जो भ्रष्ट लोक सेवकों को बचा सके। जांच या अन्वेषण को प्रारंभ से ही स्वीकृति पर निर्भर बना देना भ्रष्ट अधिकारियों को न केवल संरक्षण देता है, बल्कि उन्हें जांच को विफल करने और आपराधिक न्याय प्रणाली को बाधित करने का अवसर भी प्रदान करता है।

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि धारा 17A का इतिहास यह दर्शाता है कि यह पहले से ही असंवैधानिक ठहराए गए प्रावधानों को पुनर्जीवित करने का तीसरा प्रयास है।

उन्होंने वर्ष 1998 के ऐतिहासिक निर्णय विनीत नारायण बनाम भारत संघ का उल्लेख किया, जिसमें सीबीआई द्वारा वरिष्ठ लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकारी स्वीकृति की आवश्यकता संबंधी कार्यकारी निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6A लाई गई, जिसे 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई मामले में संविधान पीठ ने अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया।

जस्टिस नागरत्ना के अनुसार धारा 17A उसी असफल व्यवस्था को नए रूप में कानून में वापस लाने का प्रयास है।

उन्होंने यह भी कहा कि भले ही धारा 17A देखने में सभी लोक सेवकों पर समान रूप से लागू होती प्रतीत होती हो, लेकिन वास्तविकता में यह उन अधिकारियों को संरक्षण देती है जो निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं। “अनुशंसा” और “निर्णय” जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से उच्च स्तर के अधिकारियों से जुड़े होते हैं, जबकि निचले स्तर के अधिकारी केवल फाइलें तैयार करते हैं और अंतिम निर्णय नहीं लेते। इस प्रकार, यह प्रावधान व्यवहार में एक विशेष वर्ग के लोक सेवकों को जांच से बचाता है, जो समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस तरह का वर्गीकरण न तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़ा है और न ही विधि के शासन के सिद्धांतों के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता।

उन्होंने धारा 17A में निहित मनमानेपन की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, जिस प्राधिकरण को पूर्व स्वीकृति देने या न देने का अधिकार है, वह स्वयं उस निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है जिसकी जांच की जानी है। इससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, नीतिगत पूर्वाग्रह, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और विभागीय दबाव जैसी परिस्थितियां स्वीकृति देने की प्रक्रिया को और भी अधिक पक्षपातपूर्ण बना सकती हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

जस्टिस नागरत्ना ने इस बात से भी असहमति जताई कि “सरकार” या “सेवा से हटाने में सक्षम प्राधिकारी” शब्दों की व्याख्या लोकपाल या लोकायुक्त के रूप में की जाए।

उन्होंने इसे न्यायिक कानून-निर्माण करार देते हुए कहा कि केवल स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी को बदल देने से प्रावधान की असंवैधानिकता समाप्त नहीं हो जाती।

उनके अनुसार, यदि वास्तव में पूर्व स्वीकृति की कोई व्यवस्था होनी भी थी, तो वह सरकार से स्वतंत्र, निष्पक्ष और स्वायत्त संस्था के माध्यम से होनी चाहिए थी। ऐसे किसी तंत्र के अभाव में धारा 17A अस्पष्ट, दिशाहीन और निष्प्रभावी हो जाती है।

अंततः जस्टिस नागरत्ना ने निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में ही बाधा खड़ी करने वाली धारा 17A न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, बल्कि भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को भी कमजोर करती है। इसलिए यह प्रावधान संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

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