सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि भारत में न्यायपालिका कभी फेल नहीं हुई है और न्याय देने की व्यवस्था के सामने आने वाली नई चुनौतियों का सामना करती रहेगी। उन्होंने न्यायपालिका को "लोकतंत्र का रक्षक" बताया।

जस्टिस मिश्रा ने कहा,

"इस देश में न्यायपालिका कभी फेल नहीं हुई है और न ही कभी फेल होगी। जब भी हमारे सामने कोई नई चुनौती आएगी, हम उसका सामना करेंगे और उसका समाधान निकालेंगे।"

ग्वालियर में नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी के सहयोग से आयोजित "न्यायिक शिक्षा के बढ़ते दायरे" (Expanding Horizons of Judicial Education) पर दो दिवसीय वेस्ट ज़ोन रीजनल कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए जस्टिस मिश्रा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय लोकतंत्र की नींव मज़बूत है, जो मुश्किल समय में लोगों की रक्षा के लिए उनके काम आएगी।

जज ने कहा,

"हमारा लोकतंत्र, जो मज़बूती से जमा हुआ है और चट्टान की तरह ठोस है, समय की कसौटी पर खरा उतरेगा। न केवल अन्य अंग, बल्कि लोकतंत्र की रक्षक न्यायपालिका भी इसे और लोगों को बचाने के लिए हमेशा आगे आएगी।"

जस्टिस मिश्रा ने अपराध और विवादों के बदलते स्वरूप पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अब जजों को मौजूदा कानूनी सिद्धांतों को ऐसी वास्तविक स्थितियों पर लागू करना पड़ता है, जिनके बारे में पुराने फैसलों (Precedents) के समय शायद सोचा भी नहीं गया होगा।

जज ने कहा,

"अदालतों के सामने आने वाली समस्याएं अब और भी जटिल होती जा रही हैं। और हमारे पास उन समस्याओं को हल करने के लिए पुराने उदाहरण या केस लॉ नहीं हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि जहाँ अपराधी और गलत काम करने वाले लोग ज़्यादा चालाक होते जा रहे हैं, वहीं जजों को भी जटिल स्थितियों से निपटने के लिए अपने दायरे को बढ़ाना होगा।

इसी क्रम में जज ने तेज़ी से विकसित हो रही तकनीक, खासकर डीपफेक और डिजिटल रूप से हेरफेर की गई सामग्री से पैदा होने वाली चुनौतियों पर भी बात की।

जज ने कहा,

"टेक्नोलॉजी की वजह से... अगर आप YouTube, डीपफेक और ऐसी दूसरी चीज़ें देखें... तो यह पता लगाना बहुत मुश्किल हो गया कि क्या असली है और क्या नकली।"

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अब समस्या सिर्फ़ डिजिटल सबूतों की असलियत तक सीमित नहीं है, क्योंकि "सबूत ही नकली होते हैं। उन्हें बनाने वाले लोग भी नकली होते हैं। और कई बार तो कोर्ट में केस और केस लड़ने वाले, दोनों ही नकली होते हैं।"

इसलिए उन्होंने जजों से अपील की कि वे अदालतों में पेश किए गए मटीरियल के पीछे की असलियत को समझने के लिए "अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं"।

इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जज भी शामिल हुए, जिनमें जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संजीव सचदेवा शामिल थे।

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