सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें शिवसेना पार्षद रमेश सुक्रिया म्हात्रे को ज़मानत दी गई थी। म्हात्रे पर महाराष्ट्र के डोंबिवली में एक म्युनिसिपल अस्पताल में डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों के साथ मारपीट करने का आरोप है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने म्हात्रे को तीन दिन के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया।

बेंच ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि एक कड़ा संदेश दिया जाना चाहिए और मेडिकल बिरादरी पर इस तरह से हमला नहीं किया जा सकता।

जस्टिस मेहता ने कहा,

"संदेश बिल्कुल साफ और ज़ोरदार होना चाहिए। मेडिकल बिरादरी को इस तरह से छुआ या उन पर हमला नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट महाराष्ट्र सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें म्हात्रे को ज़मानत देने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 अगस्त के आदेश को चुनौती दी गई।

म्हात्रे की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने कहा कि उनके क्लाइंट पहले ही 19 दिन कस्टडी में बिता चुके हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ज़मानत रद्द करने के लिए कड़े आधार की ज़रूरत होती है।

उन्होंने यह भी बताया कि मजिस्ट्रेट कोर्ट में ट्रायल शुरू हो चुका है, जिसमें अभियोजन पक्ष के दो गवाहों से पूछताछ हो चुकी है। शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर हैं। उसका बयान 3 अक्टूबर को दर्ज किया जाना है।

उन्होंने तर्क दिया कि म्हात्रे ने जांच और ट्रायल में सहयोग किया है और कार्यवाही में कोई बाधा नहीं डाली है। उन्होंने आगे कहा कि यह मजिस्ट्रेट द्वारा सुने जाने योग्य मामला है और कोर्ट आमतौर पर ऐसे मामलों में ज़मानत दे देता है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि म्हात्रे की रिहाई से ट्रायल पर बुरा असर पड़ सकता है, खासकर उन आरोपों और अभियोजन पक्ष की दलीलों को देखते हुए जो उनके खिलाफ हैं।

म्हात्रे और चार अन्य आरोपियों पर सरकारी कर्मचारियों के साथ मारपीट, जानबूझकर चोट पहुंचाना, दंगा करना, आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान करने जैसे अपराधों के साथ-साथ 'महाराष्ट्र मेडिकेयर सर्विस पर्सन्स एंड मेडिकेयर सर्विस इंस्टीट्यूशंस (हिंसा और संपत्ति को नुकसान या हानि की रोकथाम) अधिनियम, 2010' के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

दवे ने बताया कि म्हात्रे के खिलाफ लगाए गए मुख्य अपराध के लिए अधिकतम पांच साल की सज़ा का प्रावधान है। साथ ही कहा कि यह मामला मजिस्ट्रेट द्वारा सुने जाने योग्य है। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या म्हात्रे पर ज़्यादा गंभीर अपराधों के तहत मामला चलाया जा सकता है।

दवे ने यह भी तर्क दिया कि म्हात्रे के ख़िलाफ़ बताए गए 19 आपराधिक मामले राजनीतिक कारणों से दर्ज किए गए और उनमें से 18 मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया।

कोर्ट ने पालघर में मेडिकल स्टाफ़ पर हुए हमले की एक और घटना का भी ज़िक्र किया जिसमें शिवसेना के कार्यकर्ता शामिल थे। एक ही राजनीतिक संगठन के सदस्यों से जुड़ी बार-बार हो रही ऐसी घटनाओं की ओर इशारा किया।

दवे ने साफ़ किया कि म्हात्रे पालघर की घटना में शामिल नहीं हैं।

हालांकि, कोर्ट ने कहा,

"संगठन वही है। आप नेता हैं। आप ज़िम्मेदार हैं। विचारधारा भी वही है। किसी दूसरी विचारधारा का व्यक्ति ऐसा नहीं करता।"

कोर्ट ने म्हात्रे के आपराधिक इतिहास और अस्पताल में तीन डॉक्टरों (जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं) पर कथित हमले का भी ज़िक्र किया।

दवे ने सुप्रीम कोर्ट से संयम बरतने का आग्रह करते हुए कहा कि यह देश की सर्वोच्च अदालत है और मजिस्ट्रेट द्वारा सुने जाने वाले अपराधों के मामलों में आम तौर पर ज़मानत देती है।

हालाकि, कोर्ट का मानना ​​था कि हेल्थकेयर प्रोफ़ेशनल्स पर हमलों के मामले में सख़्त रुख़ अपनाना ज़रूरी है। कोर्ट ने तेज़ी से ट्रायल के लिए समय-सीमा तय करने वाले हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से भी इनकार किया।

आख़िरकार, कोर्ट ने राज्य की अपील मंज़ूर की और म्हात्रे को ज़मानत देने वाले हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ज़मानत देने वाला हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और उन्हें तीन दिनों के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया।

Case Title - STATE OF MAHARASHTRA vs. RAMESH SUKRYA MHATRE

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