सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 172 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान पुलिस अधिकारियों को मनमानी कार्रवाई के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना, उनके निर्देशों को न मानने वाले लोगों को हिरासत में लेने या हटाने का अधिकार देता है।

B.Tech स्टूडेंट समृद्धि दास द्वारा दायर इस रिट याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई कि धारा 172 संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करती है, जो कानून के समक्ष समानता, मौलिक स्वतंत्रता और जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देते हैं।

याचिका में तर्क दिया गया कि यह प्रावधान पुलिस अधिकारी के अपने आकलन के आधार पर हिरासत में लेने की इजाज़त देता है, जिसके लिए किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की उचित आशंका, दर्ज किए गए कारण या न्यायिक जांच के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता नहीं होती है।

याचिका में कहा गया,

"याचिकाकर्ता का कहना है कि कुल मिलाकर, ये उपाय सार्वजनिक प्राधिकरण के खिलाफ शांतिपूर्ण और घोषित प्रदर्शन पर पहले से रोक लगाने (prior restraint) के समान हैं; ये आनुपातिकता (proportionality) की कसौटी पर खरे नहीं उतरते; और BNSS की धारा 172, जिस हद तक यह पुलिस की अपनी संतुष्टि के आधार पर बड़े पैमाने पर हिरासत की इजाज़त देती है, वह स्पष्ट रूप से मनमानी है और अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(d) और 21 का उल्लंघन करती है।"

BNSS की धारा 172(1) लोगों से यह अपेक्षा करती है कि वे अध्याय XII के तहत अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए पुलिस अधिकारी द्वारा जारी कानूनी निर्देशों का पालन करें; यह अध्याय पुलिस द्वारा निवारक कार्रवाई (preventive action) से संबंधित है। धारा 172(2) पुलिस अधिकारी को ऐसे किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने या हटाने का अधिकार देती है, जो ऐसे निर्देश का विरोध करता है, उसे मानने से इनकार करता है, उसे नज़रअंदाज़ करता है या उसकी अनदेखी करता है। साथ ही अधिकारी उस व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर सकता है या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर जल्द से जल्द रिहा कर सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया कि दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure), 1973 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था और इसमें "कानूनी निर्देश" (lawful directions), "हटाना" (remove) और "छोटे मामले" (petty cases) जैसे महत्वपूर्ण शब्दों को परिभाषित नहीं किया गया है। याचिका के अनुसार, पुलिस द्वारा जारी किए जा सकने वाले निर्देशों और किन हालात में किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जा सकता है, इस पर स्पष्ट सीमाएं न होने से मनमाने और भेदभावपूर्ण तरीके से कानून लागू होने की संभावना बनती है।

यह याचिका दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई से जुड़ी है। यह प्रदर्शन मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के संबंध में था। याचिका में कहा गया कि छात्रों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया या विरोध स्थल तक पहुंचने से रोका गया; इनमें से कुछ लोगों को इलाके से काफी दूर ही रोक लिया गया और कुछ को ट्रेनों से उतार दिया गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि वह विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रही थीं, लेकिन अधिकारियों द्वारा लगाई गई पाबंदियों के कारण वहां नहीं पहुंच सकीं। याचिका में BNSS की धारा 163 के तहत रोक लगाने वाले उपायों, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, ट्रेनों को रद्द करने और दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद करने को भी चुनौती दी गई।

BNSS की धारा 172 के बारे में याचिका में तर्क दिया गया है कि पुलिस के निर्देश को "नजरअंदाज करने" या "अनदेखा करने" जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बिना किसी जानबूझकर किए गए उल्लंघन या अपराध के सबूत के ही हिरासत में लेने की इजाजत मिल जाती है। इसमें आगे यह भी बताया गया कि धारा 172 में कारणों को दर्ज करने, हिरासत के आधार बताने या रिकॉर्ड रखने की कोई शर्त नहीं है, और न ही हर मामले में एक तय समय के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की स्पष्ट आवश्यकता है।

इसमें कहा गया,

"BNSS की धारा 172, जिस तरह से लागू की गई है, पुलिस अधिकारी को लोगों को निर्देश देने और ऐसे निर्देशों का विरोध करने, मानने से इनकार करने या नजरअंदाज करने वाले किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने या हटाने का अधिकार देती है। BNSS की धारा 170 (संज्ञेय अपराध की योजना बनाने वाले व्यक्ति की निवारक गिरफ्तारी) और धारा 35 के विपरीत, इसमें संज्ञेय अपराध की उचित आशंका की कोई शर्त नहीं है, कारणों का कोई रिकॉर्ड नहीं है और न्यायिक समीक्षा से जुड़ी कोई समय-सीमा भी नहीं है। इसलिए BNSS की धारा 172 असंवैधानिक है।"

याचिका में तर्क दिया गया कि इस प्रावधान में "कानूनी निर्देशों" का जिक्र पुलिस के विवेक पर पर्याप्त रोक नहीं लगाता, क्योंकि इसमें ऐसे निर्देशों के स्वीकार्य विषय, रूप या अवधि को परिभाषित नहीं किया गया। इसमें कहा गया कि इस अधिकार का इस्तेमाल बोलने, शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने, आने-जाने और दूसरी सुरक्षित गतिविधियों पर असर डालने वाले निर्देश जारी करने के लिए किया जा सकता है, और निर्देशों का पालन न करने पर तुरंत हिरासत में लिया जा सकता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि आज़ादी छीनने वाले किसी भी कानून में मनमाने ढंग से शक्ति के इस्तेमाल के खिलाफ सुरक्षा उपाय होने चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों से सिर्फ़ कार्रवाई को "गिरफ्तारी" के बजाय "हिरासत" या "हटाना" कहकर नहीं बच सकती।

याचिका में कहा गया,

"धारा 172 में किसी शुरुआती संतुष्टि, कारण, रिकॉर्ड या तय समय में पेश करने की ज़रूरत नहीं है, और 'मामूली मामले' में हिरासत पूरी तरह से न्यायिक जांच के दायरे से बाहर रहती है। इसके उलट, धारा 170 सिर्फ़ तब एहतियाती गिरफ्तारी की इजाज़त देती है जब किसी संज्ञेय अपराध को करने की योजना का पता हो और उसे किसी और तरीके से रोका न जा सके। 'गिरफ्तारी' के बजाय 'हिरासत में लेना या हटाना' शब्दों का इस्तेमाल करके, धारा 172 अध्याय V के सुरक्षा उपायों से भी बचती है। अगर किसी अपराध के आरोप में गिरफ्तारी को सही ठहराना ज़रूरी है, तो बिना किसी अपराध के आरोप वाली हिरासत सिर्फ़ किसी निर्देश को 'नज़रअंदाज़' करने के आधार पर नहीं हो सकती। धारा 172 में अनुच्छेद 22(1), (2) या (5) का कोई भी सुरक्षा उपाय शामिल नहीं है: न कोई आधार, न वकील, न पक्ष रखने का मौका, और न ही चौबीस घंटे के भीतर पेश करने की अनिवार्यता, जो सिर्फ़ 'मामूली मामलों' में रिहाई पर लागू होती है।"

याचिका में आगे यह भी तर्क दिया गया कि धारा 172 पुलिस को बहुत ज़्यादा अधिकार देती है क्योंकि इसमें उन निर्देशों और हालात का दायरा ठीक से तय नहीं किया गया है, जिनके तहत हिरासत को सही ठहराया जा सके। इसके विकल्प के तौर पर याचिका में इस प्रावधान की ऐसी व्याख्या करने की मांग की गई, जिसके तहत हर मामले के लिए अलग-अलग और लिखित कारण न्यायिक जांच और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन ज़रूरी हो।

धारा 172 को चुनौती देने के अलावा, याचिका में जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में धारा 163 BNSS के तहत जारी निषेधाज्ञा को भी चुनौती दी गई है और यह घोषित करने की मांग की गई कि 10 अक्टूबर को धारा 172 के तहत की गई हिरासत गैर-कानूनी थी। इसमें गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिए गए लोगों के लिए मुआवज़े, हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और आधार का खुलासा करने, और शांतिपूर्ण सभाओं के लिए बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने की भी मांग की गई।

याचिका में विरोध प्रदर्शन से जुड़े CCTV फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-वर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, पुलिस कंट्रोल रूम लॉग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को सुरक्षित रखने और पेश करने की भी मांग की गई। इसमें अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई कि वे यह पक्का करें कि हिरासत में मौजूद प्रदर्शनकारियों की जानकारी उनके परिवारों और कानूनी सलाहकारों को तुरंत दी जाए, या फिर ऐसे लोगों को कोर्ट के सामने पेश किया जाए।

याचिकाकर्ता ने प्रदर्शन के कारण मेट्रो स्टेशन बंद करने, ट्रेनें रद्द करने और मोबाइल इंटरनेट बंद करने के फैसलों को भी चुनौती दी है और मांग की है कि इन्हें ज़रूरत से ज़्यादा और असंवैधानिक घोषित किया जाए।

अन्य मांगों में यह घोषणा भी शामिल है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए अधिकारियों से पहले से इजाज़त लेने के बजाय सिर्फ़ उन्हें सूचना देना ही काफ़ी होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने शांतिपूर्ण सभाओं और BNSS की धारा 163 और 172 के तहत शक्तियों के इस्तेमाल के लिए बाध्यकारी गाइडलाइंस बनाने की भी मांग की।

अंतरिम राहत के तौर पर दास ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि जब तक याचिका पर सुनवाई चल रही हो, तब तक दिल्ली पुलिस कमिश्नर को धारा 172 लागू करने से रोका जाए।

Case Title : Samriddhi Das v. Union of India and Ors.

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