क्राइम सीन फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस के मोबाइल ऐप का परीक्षण करने का निर्देश दिया, 6 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 18 नवंबर को दिल्ली पुलिस द्वारा विकसित एक मोबाइल ऐप के परीक्षण का निर्देश दिया। कोर्ट 2018 के एक मामले का निस्तारण कर रहा था, जिसमें प्राथमिक मुद्दा अपराधों की जांच में प्रौद्योगिकी के उपयोग, विशेष रूप से विशेषज्ञों द्वारा अपराध स्थल की तस्वीर/वीडियोग्राफी करने से संबंधित था।
जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट की खंडपीठ ने विशेषज्ञों से इस बारे में एक रिपोर्ट मांगी है कि क्या दिल्ली पुलिस के ऐप पर खींची गई और अपलोड की गई तस्वीरें और वीडियो पूरी तरह से छेड़छाड़ मुक्त हैं और संभवतः इस पर आपराधिक मुकदमे में साक्ष्य के रूप में भरोसा किया जा सकता है।
मामला
2018 में सुप्रीम कोर्ट इस सवाल पर विचार कर रहा था कि क्या जांच के दरमियान क्राइम सीन या रिकवरी सीन की वीडियोग्राफी जुटाए गए सबूतों में विश्वास को प्रेरित करने के लिए आवश्यक होनी चाहिए ।
यह मानते हुए कि जिस पक्ष के पास इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज नहीं है, उसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी (4) के तहत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने अपराध स्थल पर वीडियोग्राफी के इस्तेमाल के लिए रोडमैप को अंतिम रूप देने के पहलू और मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) पर विचार करने के लिए मामले को स्थगित कर दिया था।
(नोट: मौजूदा मामले में दो जजों की पीठ द्वारा दिए गए 2018 के फैसले को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशानराव गोरंट्याल और अन्य में यह माना कि धारा 65बी(4) के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के माध्यम से साक्ष्य की स्वीकार्यता के लिए एक शर्त है।)
हालांकि, अपराधों की जांच में प्रौद्योगिकी के उपयोग का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित रहा, जिसे वर्तमान में न्यायालय द्वारा निपटाया जा रहा है।
कोर्ट का 18 नवंबर का आदेश
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित 24 अगस्त, 2021 के आदेश के अनुसार, यूनियन ऑफ इंडिया के साथ-साथ दिल्ली पुलिस की ओर से एक व्यापक प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड में रखा गया और दिल्ली पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि उसने उक्त उद्देश्य के लिए एक ऐप विकसित किया है।
अदालत को बताया गया कि दक्षिणी दिल्ली जिले के 15 पुलिस थानों के जांच अधिकारी पायलट प्रोजेक्ट के रूप में फोटो/वीडियो कैप्चर कर रहे हैं और क्राइम सीन फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी के जरिए इसे अपलोड कर रहे हैं।
यूनियन ऑफ इंडिया ने कोर्ट को यह भी बताया कि दिल्ली पुलिस ऐप का इस्तेमाल कर रही है और वही एनसीआरबी की संतुष्टि के लिए है। कोर्ट को आगे बताया गया कि दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा की राज्य सरकारें आवश्यक स्पेशिफिकेशन्स के अनुसार सर्वर खरीदने की प्रक्रिया में हैं।
यह भी प्रस्तुत किया गया कि मध्य प्रदेश सरकार ने सर्वर पहले ही खरीद लिया है और टेस्टिंग एन्वाइरनमेंट में मोबाइल ऐप को इस्तेमाल करने का कार्य प्रगति पर है; कि गुजरात सरकार ने अपना मोबाइल ऐप विकसित किया है, जिसके लिए किसी सर्वर की आवश्यकता नहीं है और डेटा क्लाउड में रखा जाता है।
अवलोकन
कोर्ट ने शुरू में कहा कि ये घटनाक्रम उत्साहजनक हैं और अपराधों की जांच में और विशेष रूप से अपराध स्थल की तस्वीर/वीडियोग्राफी कराने में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने में एक लंबा रास्ता तय करेंगे।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि जांच में उपयोग के लिए इन सभी तकनीकी नवाचारों को सुनिश्चित करना चाहिए:
(ए) कि 4 तस्वीरों/वीडियोग्राफ के माध्यम से अपराध स्थल को कैप्चर करना और ऐप के माध्यम से इसे अपलोड करना पूरी तरह से छेड़छाड़ मुक्त और पूरी तरह से एन्क्रिप्टेड है;
(बी) फोटोग्राफ/वीडियोग्राफी की कैप्चरिंग और ऐप के माध्यम से इसे अपलोड करना समसामयिक होना चाहिए और जहां तक संभव हो, जीपीएस लोकेसंस के साथ भी होना चाहिए।
इसके अलावा कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि दिल्ली पुलिस द्वारा दक्षिणी दिल्ली जिले के 15 पुलिस स्टेशनों में लागू किए गए प्रोटोटाइप का विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किया जाना है।
कोर्ट ने आगे कहा, "अगर इस प्रकार से विकसित मोबाइल ऐप को विशेषज्ञों द्वारा फुलप्रूफ और विश्वसनीय पाया जाता है तो कोई भी निर्देश पारित होने से पहले उनकी रिपोर्ट कोर्ट को बहुत मददगार होगी।"
इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने इस प्रकार निर्देश दिया,
-पुलिस में कम से कम तीन उच्च पदस्थ अधिकारी, अधिमानतः राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से ऐसी टेस्टिंग के लिए विशेषज्ञों के रूप में जुड़े।
-ये विशेषज्ञ किसी भी साइबर-क्राइम एक्सपर्ट या उन लोगों की सेवाओं को शामिल करने के लिए स्वतंत्र हैं, जो इंटरनेट और वर्चुअल प्लेटफॉर्म से अच्छी तरह वाकिफ हैं।
-वे विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अरुण मोहन की सेवाओं को भी संबद्ध कर सकते हैं, जो एमिकस क्यूरी के रूप में इस न्यायालय की सहायता कर रहे हैं।
-इस तरह विकसित मोबाइल ऐप पर विचार करने और यह जांचने के बाद कि क्या कैप्चर और अपलोड की गई तस्वीरें/वीडियोग्राफी पूरी तरह से छेड़छाड़ मुक्त हैं और संभवतः आपराधिक मुकदमे में सबूत के रूप में भरोसा किया जा सकता है, विशेषज्ञ रिपोर्ट के माध्यम से अपने विचार दे सकते हैं।
अंत में, विशेषज्ञों को मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में तैयार की गई रिपोर्ट को ध्यान में रखने का भी निर्देश दिया गया है, जिसमें 28 जुलाई 2018 को जस्टिस राजेश बिंदल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी, जो हाईकोर्ट द्वारा स्वीकार करने के लिए मॉडल के रूप में काम करने के लिए मसौदा नियम तैयार करेगी।
इसके साथ ही कोर्ट ने छह सप्ताह के भीतर इस संबंध में व्यापक रिपोर्ट मांगी और मामले को 18 जनवरी, 2022 को सूचीबद्ध कर दिया।
केस शीर्षक - शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य