किराया विलेख में प्रतिवर्ष किराया बढ़ाने के आकस्मिक उपबंध का अर्थ यह नहीं कि किरायेदारी एक साल से अधिक अवधि के लिए थी : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2020-06-18 05:51 GMT

उच्चतम न्यायालय ने पाया है कि, केवल इसलिए कि रेंट डीड में एक खंड होता है जो किरायेदार को प्रत्येक वर्ष कुछ प्रतिशत तक किराया बढ़ाने के लिए बाध्य करता है, इसका मतलब यह नहीं पढ़ा जा सकता है कि किरायेदारी एक वर्ष से अधिक की अवधि के लिए थी।

इस मामले में, शीर्ष अदालत के समक्ष विचार करने के लिए मुद्दा था कि क्या किरायेदार द्वारा हस्ताक्षरित किराये विलेख को पंजीकरण अधिनियम 1908 की धारा 17(1)(डी) के तहत पंजीकृत कराने की आवश्यकता है? कोर्ट ने कहा कि पंजीकरण अधिनियम की धारा 17(1)(डी) के तहत साल-दर-साल, या एक साल से अधिक की किसी भी अवधि के लिए या वार्षिक किराये के लिए अचल संपत्ति की लीज का पंजीकरण अनिवार्य है। जिस किराये विलेख पर विवाद है, उसमें इस बात का उल्लेख नहीं किया गया था कि कितनी अवधि के लिए किराया विलेख निष्पादित किया गया था।

ऐसी स्थिति में न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एम आर शाह एवं न्यायमूर्ति वी रमासु्ब्रमण्यन की खंडपीठ ने कहा :

"जब लीज डीड में किराये की अवधि का जिक्र नहीं किया जाता है, तो वैसी स्थिति में लीज/रेंट डीड की सही प्रकृति का पता लगाने के लिए लीज/किराया संबंधी विलेख में दर्ज अन्य शर्तों और संबंधित पक्षों के इरादे पर विचार किया जाता है।"

विवादित किराया विलेख में न तो वार्षिक किराये का उल्लेख किया गया था, न ही इसमें यह जिक्र किया गया था कि लीज साल-दर-साल के लिए है। लेकिन इसमें उपबंध नौ है, जिसमें इस बात का जिक्र किया गया है कि किरायेदार प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत किराया बढ़ाकर देने के लिए बाध्य होगा। इस उपबंध का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा :

"उपबंध (9) उस विशेष उपबंध की तरह इस्तेमाल हो भी सकता है और नहीं भी, जिसके अंतर्गत मालिक को यह अधिकार सुरक्षित किया गया हो कि प्रति माह पांच तारीख को किराये का भुगतान न मिल पाने की स्थिति में या खुद की जरूरत पड़ने पर एक महीने का नोटिस देकर दुकान खाली करायी जा सकती है। उपबंध (9) एक आकस्मिक उपबंध है, जो प्रतिवर्ष किरायेदार को 10 प्रतिशत किराया बढ़ाने के लिए बाध्य करता है। यह उपबंध एक साल से अधिक किराये पर रहने की स्थिति के लिए आकस्मिक व्यवस्था की तरह थी, लेकिन इस उपबंध का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि किराया एक साल से अधिक समय के लिए दिया गया था।"

इसलिए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रेंट नोट ऐसा नहीं था, जिसे पंजीकरण अधिनियम की धारा 17(1)(डी) के तहत अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने की जरूरत होती है।

केस नं. : सिविल अपील नं. 2617/2020

केस का नाम : श्रीचंद (मृत) बनाम सुरिन्दर सिंह

कोरम : न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति वी. रमासुब्रमण्यन 

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