छात्र प्रदर्शनकारी को नोटिस देने वाला एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट निलंबित, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कथित तौर पर छात्रों को प्रेरित करने के आरोप में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस देने वाले ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी।
यह मामला अक्षत त्रिपाठी की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। छात्र ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी है। यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की संबंधित धाराओं के तहत जारी किया गया और इसमें छात्र को छह महीने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका तथा इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया।
सीनियर एडवोकेट पी.वी. दिनेश ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिका का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश जाना चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि नोटिस में छात्र पर छात्रों के बीच सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैलाने और उन्हें प्रस्तावित CJP धरने में शामिल होने के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जब इस मामले का उल्लेख उनके समक्ष बुधवार को किया गया, तब उन्होंने इस पर गंभीर रुख अपनाया और राज्य सरकार से जवाब मांगा। इसके बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया।
अक्षत त्रिपाठी ने वकील ऑन रिकॉर्ड सुभाष चंद्रन के.आर. के माध्यम से याचिका दायर की। याचिका के अनुसार, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 126 के तहत कार्रवाई शुरू की थी। यह प्रावधान ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा मांगने की अनुमति देता है, जब किसी व्यक्ति के शांति भंग करने या सार्वजनिक शांति को प्रभावित करने की आशंका की सूचना हो। नोटिस में संबंधित सूचना की सत्यता की जांच के लिए धारा 135 का भी उल्लेख किया गया।
याचिका के मुताबिक, नोटिस का आधार ईको फर्स्ट पुलिस थाने के एक उपनिरीक्षक की रिपोर्ट थी। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि अक्षत त्रिपाठी छात्रों के बीच सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैला रहे थे और उन्हें प्रस्तावित CJP धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इससे छात्रों के बीच तनाव पैदा हो गया और उनके बीच लड़ाई-झगड़े की स्थिति बन सकती थी, जिससे शांति और सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की आशंका थी।
छात्र की याचिका में कहा गया कि नोटिस में उसके खिलाफ किसी विशेष तारीख, समय, कथित बयान, प्रत्यक्ष कृत्य या वास्तविक अथवा आसन्न हिंसा की किसी घटना का उल्लेख नहीं किया गया। याचिका के अनुसार, आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री भी छात्र को उपलब्ध नहीं कराई गई।
याचिका में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। नोटिस 4 सितंबर को जारी किया गया और छात्र को 5 सितंबर को पेश होने के लिए कहा गया। याचिका में कहा गया कि छात्र को वकील से सलाह लेने, आरोपों को समझने और पांच लाख रुपये के दो जमानतदारों की व्यवस्था करने के लिए मुश्किल से एक दिन का समय दिया गया। छात्र ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत और अनुचित प्रक्रिया बताया।
अक्षत त्रिपाठी ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर के उस आदेश के सीधे विपरीत है, जिसमें छात्र प्रदर्शनों से संबंधित एफआईआर रद्द की गईं और छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई गई। याचिका में तर्क दिया गया कि साथी छात्रों को प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकार के दायरे में आता है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) के तहत शांतिपूर्ण और बिना हथियार सभा करने के अधिकार का भी हवाला दिया गया। छात्र का कहना है कि केवल प्रस्तावित धरने में छात्रों के शामिल होने का आह्वान करना अपने आप में शांति भंग करने या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने वाला कृत्य नहीं माना जा सकता, जब तक इसके समर्थन में ठोस और विशिष्ट सामग्री मौजूद न हो।
याचिका में पांच लाख रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि के दो जमानतदारों की शर्त को भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालने वाला बताया गया। छात्र ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को इस तरह प्रभावित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उसे जवाब देने और जमानतदारों की व्यवस्था करने के लिए केवल एक दिन दिया गया हो।
मामले की सुनवाई के दौरान एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के निलंबन की जानकारी सामने आने के बाद अब याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर नजर है। यह मामला छात्र प्रदर्शनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पहले के संरक्षणात्मक आदेशों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उनके बाद की गई कार्रवाई के बीच उठे विवाद से जुड़ा है।