चेक बाउंस मामले को धारा 482 के तहत केवल तभी रद्द किया जा सकता है, जब राशि पूरी तरह से वसूली योग्य ना हो; कर्ज टाइम बार्ड है या नहीं, यह साक्ष्य का प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2023-09-07 12:06 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सवाल कि क्या क्या चेक को टाइम बार्ड डेट (ऋण) के लिए जारी किया गया, का ‌निर्धारण साक्ष्य के आधार पर किया जाना चाहिए।

जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा,

"यह केवल उन मामलों में है, जहां वह राशि, जिसके लिए चेक जारी किया गया है और वह बाउंस हो गया है और वह राशि बिल्कुल भी वसूली योग्य नहीं है, और उसकी वसूली के लिए आपराधिक कार्रवाई शुरू की गई है, सीमा क्षेत्राधिकार (threshold jurisdiction) का सवाल उठेगा।

ऐसे मामलों में, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर रहे न्यायालय का हस्तक्षेप उचित होगा, हालांकि अन्यथा नहीं।"

इस मामले में, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस की शिकायत को इस आधार पर रद्द कर दिया कि अभियोजन कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण के संबंध में नहीं था।

अपील में अदालत ने अपने पहले के फैसलों (एस नटराजन बनाम समा धर्मन और अन्य (2021) 6 एससीसी 413 और एवी मूर्ति बनाम बीएस नागाबासवन्ना (2002) 2 एससीसी 642) का हवाला दिया, जिसमें सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका में विचार के दायरे को समझाया गया था, जिसमें एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दायर शिकायत को रद्द करने की मांग की गई थी।

कोर्ट ने कहा,

"यह बिल्कुल स्पष्ट है कि एनआई एक्ट के तहत संभावित कार्यवाही की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए और यह भी ध्यान में रखते हुए कि चेक खुद भुगतान करने का एक वादा है, भले ही कर्ज समय बाधित हो, इस अदालत ने उस परिस्थिति में अनुबंध अधिनियम की धारा 25(3) में निहित प्रावधान को ध्यान में रखा है और संकेत दिया है कि यदि यह प्रश्न कि क्या ऋण या देनदारी सीमा से बाधित है, ऐसी कार्यवाहियों में विचार करने योग्य मुद्दा है, तो इसका निर्णय पार्टियों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर किया जाना है, क्योंकि सीमा का प्रश्न कानून और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है।

यह केवल उन मामलों में है, जहां वह राशि, जिसके लिए चेक जारी किया गया है और वह बाउंस हो गया है और वह राशि बिल्कुल भी वसूली योग्य नहीं है, और उसकी वसूली के लिए आपराधिक कार्रवाई शुरू की गई है, सीमा क्षेत्राधिकार (threshold jurisdiction) का सवाल उठेगा। ऐसे मामलों में, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग कर रहे न्यायालय का हस्तक्षेप उचित होगा, हालांकि अन्यथा नहीं।उस रोशनी में इस अदालत का विचार है कि साक्ष्य के पहले चरण में कार्यवाही को रद्द करने के लिए सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक याचिका पर विचार करना उचित नहीं होगा।"

हालांकि यह तर्क दिया गया कि चेक उस ऋण के संबंध में जारी किया गया है जो अप्रवर्तनीय (लागू करने योग्य नहीं) है या एक देनदारी है, जिसे रिकवर नहीं किया जा सकता है, ऐसी स्थिति में एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत अनुमान उपलब्ध नहीं होगा, पीठ ने कहा, "मामले में शामिल तथ्यों से प्रथमदृष्ट्या यह संकेत प्राप्त होता है कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष शिकायत में किया गया दावा, जिस चेक पर आधारित है, वह बाउंस हो चुका है और उसे टाइम बार्ड नहीं माना जा सकता है और इस तरह इसे ऐसे कर्ज के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, जो कि कानूनी तौर पर रिकवरी योग्य नहीं है।"

अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में न केवल राशि कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज थी, बल्‍कि शिकायत भी समय के भीतर दर्ज की गई थी। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और शिकायत बहाल कर दी।

केस टाइटलः के. ह्यमावती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य 2023- लाइव लॉ (एससी) 752 - 2023 आईएनएससी 811

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