CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल, RTI रिकॉर्ड के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में नई अर्जी
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की नियुक्तियों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में नई अर्जी दाखिल की है। इसमें सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति मांगी गई है।
याचिकाकर्ता सूरी पयाला का आरोप है कि इन नियुक्तियों के लिए गठित सर्च कमेटी और चयन समिति के सामने रखे गए रिकॉर्ड में उम्मीदवारों के चुनाव कराने के अनुभव और उनकी ईमानदारी का विशिष्ट आकलन किए जाने का विवरण नहीं मिलता।
उन्होंने अपनी रिट याचिका में संशोधन की मांग करते हुए कहा है कि विधायी विभाग से RTI के जरिए मिले दस्तावेजों के अनुसार, चयन प्रक्रिया में मुख्य रूप से उम्मीदवारों के नाम, सेवा संबंधी जानकारी, नियुक्ति की तारीखों और सर्विस रिकॉर्ड पर विचार किया गया।
हालांकि, ये याचिकाकर्ता के आरोप हैं। इन पर सुप्रीम कोर्ट का कोई निष्कर्ष सामने आने की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
यह याचिका मार्च 2024 और फरवरी 2025 में की गई नियुक्तियों को चुनौती देती है। ये नियुक्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत की गई थीं।
याचिकाकर्ता ने अधिनियम की धारा 5 और 6 का हवाला देते हुए चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
धारा 5 के तहत सर्च कमेटी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने के योग्य पांच व्यक्तियों का पैनल तैयार करना होता है, जबकि धारा 6 चयन समिति की सिफारिश से संबंधित है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि चयन प्रक्रिया की कार्यवाही में उम्मीदवारों की पात्रता और अनुभव का उल्लेख तो है, लेकिन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि चुनाव कराने के अनुभव और ईमानदारी से जुड़ी शर्तों का आकलन किस तरह किया गया।
उनके मुताबिक, केवल धारा 5 का उल्लेख कर देना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसके प्रावधानों का किस तरह पालन किया गया।
मार्च 2024 की नियुक्तियों पर क्या सवाल उठाए गए?
14 मार्च 2024 को ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता ने इन नियुक्तियों से पहले उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
अर्जी के मुताबिक, सर्च कमेटी के एजेंडे में 10 नामों का पैनल तैयार करने की बात थी, लेकिन अंततः छह उम्मीदवारों की सिफारिश की गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उम्मीदवारों की संख्या कम करने के लिए कौन-से मानदंड अपनाए गए।
उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की असहमति का भी उल्लेख किया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, चौधरी ने शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की प्रोफाइल मांगी थी, लेकिन उन्हें 221 नामों की सूची दी गई।
अर्जी में दावा किया गया है कि चयन समिति की बैठक के मिनट्स में इन आपत्तियों पर पर्याप्त चर्चा दर्ज नहीं है।
फरवरी 2025 की चयन प्रक्रिया पर भी सवाल
याचिकाकर्ता ने 17 फरवरी 2025 को हुई नियुक्तियों की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। उस दिन ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।
अर्जी में 6 जनवरी 2025 के विधायी विभाग के एक नोट का हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, अधिनियम की धारा 5 के तहत भारत सरकार के सचिव के समकक्ष पद पर कार्यरत या उस पद पर रह चुके व्यक्तियों के नाम मांगे जाने का प्रस्ताव था।
इसके बाद 8 जनवरी 2025 के एक पत्र के जरिए कथित तौर पर कार्यरत सचिवों और पिछले दो वर्षों में सेवानिवृत्त हुए सचिवों के नाम मांगे गए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि नियुक्ति से संबंधित फाइलों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि चयन के लिए अपनाए गए तरीके में बदलाव क्यों किया गया और उम्मीदवारों के दायरे को पिछले दो वर्षों में सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों तक सीमित क्यों रखा गया।
उन्होंने 16 फरवरी 2025 को हुई सर्च कमेटी की बैठक में चुनाव आयुक्त के पद के लिए अलग से पांच उम्मीदवारों का पैनल तैयार किए जाने पर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, बैठक के एजेंडे में मुख्य चुनाव आयुक्त के पद के लिए पैनल मांगा गया था, लेकिन अतिरिक्त पैनल तैयार करने का पर्याप्त कारण रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं है।
राहुल गांधी की असहमति का भी किया जिक्र
याचिकाकर्ता ने 17 फरवरी 2025 को चयन समिति की बैठक के दौरान राहुल गांधी की असहमति का भी उल्लेख किया है।
अर्जी के अनुसार, गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई होने तक बैठक स्थगित करने की मांग की थी और deliberations यानी विचार-विमर्श में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद समिति ने अपनी सिफारिशों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
याचिकाकर्ता ने इस घटनाक्रम को भी चयन प्रक्रिया से जुड़े अपने तर्कों के समर्थन में रखा है।
नियुक्तियां रद्द होने पर क्या मांग की गई?
RTI के जरिए मिले दस्तावेजों के आधार पर याचिकाकर्ता अपनी याचिका में एक अतिरिक्त आधार जोड़ना चाहते हैं। उनका कहना है कि 14 मार्च 2024 और 17 फरवरी 2025 को की गई नियुक्तियों की सिफारिशों को कानून की नजर में अमान्य घोषित किया जाना चाहिए
इसके साथ ही उन्होंने वैकल्पिक राहत भी मांगी है।
उनका प्रस्ताव है कि यदि नियुक्तियां रद्द की जाती हैं, तो मौजूदा पदाधिकारियों को नई नियुक्तियां किए जाने के लिए एक निश्चित संक्रमणकालीन अवधि तक पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सकती है।
इस अवधि के दौरान नए नीतिगत फैसलों पर सीमाएं लगाने की मांग भी की गई है, जबकि फैसले से पहले किए गए कार्यों को सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया है।
फिलहाल, यह याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल अर्जी में लगाए गए आरोप और मांगी गई राहत हैं। नियुक्तियों की वैधता और चयन प्रक्रिया में कानून का पालन हुआ या नहीं, इस पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना होगा।