सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों के नाम पते वाले बैनर हटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यूपी सरकार की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बेंच को भेजा

Update: 2020-03-12 07:00 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 6 मार्च के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका को सुप्रीम कोर्ट की एक अवकाशकालीन पीठ ने गुरुवार को तीन-न्यायाधीशों की खंडपीठ को भेजा दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ में यूपी प्रशासन द्वारा शहर के चौराहों पर लगाए गए सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों के नाम, पते और फोटो वाले बैनरों को हटाने का निर्देश दिया था।

सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हिंसा करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए यूपी प्रशासन को उक्त बैनर हटाने के निर्देश दिए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसकी सुनवाई जस्टिस यू यू ललित और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने गुरुवार को की।

खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में "उन मुद्दों को शामिल किया जाना चाहिए, जिन्हें पर्याप्त शक्ति की बेंच के समक्ष विचार करने की आवश्यकता है और इसे अगले सप्ताह विचार के लिए बड़ी बेंच को भेज दिया। पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश के संचालन के लिए कोई आदेश पारित नहीं किया।

सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने यूपी सरकार के लिए पेश हुए और कहा कि उक्त बैनर लगाए गए थे क्योंकि स्थगन प्राधिकरण ने 95 लोगों को सुना था और पाया कि 57 लोग दंगे के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने कहा कि इन 57 लोगों में विभिन्न समुदायों के दंगाई शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि पुट्टास्वामी के मामले के फैसले के अनुसार, एक व्यक्ति के सार्वजनिक डोमेन में होने पर निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है। एक बार एक व्यक्ति को सार्वजनिक स्थानों पर हिंसक गतिविधियों में लिप्त होते हुए विडियोग्राफ किया गया हो तो वह निजता के अधिकार के संरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

पीठ ने एसजी से उस कानून के बारे में पूछा जिसके तहत कथित दंगाइयों के नाम वाले होर्डिंग्स लगाने की कार्रवाई की गई थी।

न्यायमूर्ति ललित ने कहा कि बर्बरता की निंदा की जानी चाहिए, उन्होंने पूछा कि क्या अपराधियों को 'कई बार पीड़ित' बनाया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि आरोपी व्यक्तियों के लिए भुगतान करने का समय अभी भी शेष था और वसूली की कार्यवाही को चुनौती देने वाली उनकी याचिकाएं लंबित हैं।  पीठ ने पूछा कि क्या इस तरह के "कठोर कदम" कानून द्वारा कवर किए गए थे।

पूर्व आईपीएस अधिकारी एस आर दारापुरी, जिनके नाम को एक बैनर में प्रकाशित किया गया था, की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ एएम सिंघवी ने प्रस्तुत किया कि सरकार की कार्रवाई में लिंचिंग की अपील की गई थी। सिंघवी ने प्रस्तुत किया कि बाल बलात्कारी और गंभीर अपराधियों के नाम भी प्रकाशित नहीं किए जाते। उन्होंने यह भी कहा कि नुकसान की वसूली का मुद्दा अभी भी  कनूनन विचाराधीन था।

वकील मोहम्मद शोएब की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने प्रस्तुत किया कि उनके मुवक्किल ने अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाने के लिए अतीत में हमलों का सामना किया है और बैनर में उनके नाम और पते के प्रकाशन के बाद उन पर हमला हो सकता है।

सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को झटका देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ में यूपी पुलिस द्वारा लगाए गए सभी पोस्टरों और बैनरों को हटाने का आदेश दिया था। इन बैनरों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध प्रदर्शन ले दौरान हिंसा फैलाने के आरोपी व्यक्तियों के नाम और फोटो वाले बैनर लगाए थे।

न्यायालय ने इन्हें हटाने का आदेश दिया। न्यायालय ने जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस आयुक्त को 16 मार्च तक उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रविवार को एक विशेष बैठक में लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए‌) के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोपी व्यक्तियों की तस्वीर और विवरणों वाले बैनर लगाने के लिए राज्य सरकार के अधिकारियों की खिंचाई की ।

मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की पीठ ने कहा कि कथित सीएए प्रोटेस्टर्स के पोस्टर लगाने की राज्य की कार्रवाई "अत्यधिक अन्यायपूर्ण" है और यह संबंधित व्यक्तियों की पूर्ण स्वतंत्रता पर एक "अतिक्रमण" है। 

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