बार मेंबर ने सुप्रीम कोर्ट में बताया: सदस्यों से चर्चा किए बिना लिए गए BCI के फ़ैसले (NALSAR के ख़िलाफ़ कार्रवाई समेत)
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के एक सदस्य ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि BCI के नाम पर कई बार अहम फ़ैसले लिए गए और सूचनाएं जारी की गईं, जबकि इसके सदस्यों से कोई चर्चा नहीं की गई। साथ ही अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, जो काउंसिल के पदेन (Ex-Officio) सदस्य होते हैं, उन्हें बैठकों की सूचना और एजेंडा तक नहीं भेजा गया।
BCI सदस्य एन. मनोज कुमार ने वकील योगमाया एमजी की रिट याचिका के जवाब में अपना हलफ़नामा दायर किया। योगमाया ने BCI चेयरमैन के तौर पर मनन कुमार मिश्रा के बने रहने को चुनौती दी थी। कुमार ने वकीलों की इस शीर्ष वैधानिक संस्था के कामकाज, गवर्नेंस और फ़ाइनेंस को लेकर याचिका में उठाए गए मुद्दों का काफ़ी हद तक समर्थन किया।
BCI के फ़ैसले एकतरफ़ा लिए गए
कुमार का तर्क है कि एडवोकेट एक्ट के तहत वैधानिक अधिकार सामूहिक रूप से BCI के पास होते हैं और इसे किसी पदाधिकारी के व्यक्तिगत अधिकार में नहीं बदला जा सकता। उनके अनुसार, BCI में "एकतरफ़ा फ़ैसले लेने का लगातार चलन" रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई बार बैठकों के एजेंडा मीटिंग से ठीक पहले मैसेजिंग ग्रुप में भेजे या पोस्ट किए गए, जिससे सदस्यों को मामलों को समझने और चर्चा में प्रभावी ढंग से भाग लेने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला।
उन्होंने यह भी कहा कि BCI की बैठकों के मिनट्स (कार्यवाही का विवरण) पुष्टि और मंज़ूरी के लिए सदस्यों के बीच नहीं बांटे गए। उनका कहना है कि कई बार अहम संस्थागत और नीतिगत फ़ैसले BCI के नाम पर बताए गए, जबकि उनसे जुड़ी चर्चा या प्रस्ताव सदस्यों के सामने नहीं रखे गए।
कई मौकों पर बैठकों के एजेंडा मीटिंग शुरू होने से ठीक पहले मैसेजिंग ग्रुप में भेजे या पोस्ट किए गए।
बैठकों के मिनट्स कभी भी पुष्टि और मंज़ूरी के लिए सदस्यों के बीच नहीं बांटे गए। यह प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है।
कई बार अहम संस्थागत और नीतिगत फ़ैसले भी BCI के नाम पर बताए गए, जबकि उनसे जुड़ी चर्चा या प्रस्ताव सदस्यों के सामने नहीं रखे गए। यह तरीका उस बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन करता है, जिसके तहत वैधानिक काउंसिल को सभी सदस्यों की सार्थक भागीदारी के साथ एक सामूहिक संस्था के तौर पर काम करना चाहिए। NALSAR के मामले में की गई कार्रवाई जनरल काउंसिल के सामने नहीं रखी गई
कुमार ने कहा कि BCI चेयरमैन ने 13 अगस्त को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, हैदराबाद के 2026 में ग्रेजुएट होने वाले बैच के एनरोलमेंट को रोकने का जो विवादित आदेश जारी किया था, उसे चर्चा के लिए जनरल काउंसिल के सामने नहीं रखा गया और इस कार्रवाई को मंज़ूरी देने वाला कोई प्रस्ताव भी सामने नहीं लाया गया। इसके बाद उन्होंने चेयरमैन को पत्र लिखकर इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई। हालांकि, बाद में BCI चेयरमैन ने यह फ़ैसला वापस ले लिया, लेकिन कुमार ने कहा कि "यह घटना चेयरमैन द्वारा संस्थागत अधिकारों का एकतरफ़ा इस्तेमाल करने के पैटर्न को दिखाती है, जो उस कानूनी व्यवस्था के ख़िलाफ़ है जिसके तहत ऐसे अधिकार सामूहिक काउंसिल के पास होते हैं।"
AG और SG को नोटिस और एजेंडा नहीं दिए गए
कुमार ने बताया कि हालांकि एडवोकेट्स एक्ट में साफ़ तौर पर कहा गया कि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल BCI के पदेन सदस्य होंगे। फिर भी उन्हें BCI की बैठकों के नोटिस और एजेंडा नहीं भेजे गए, जिससे काउंसिल की चर्चाओं में उनकी सार्थक भागीदारी नहीं हो पाई।
उन्होंने बताया कि उन्होंने चेयरमैन के सामने यह मुद्दा उठाया, जिसके बाद भरोसा दिलाया गया कि भविष्य की बैठकों के लिए लॉ ऑफ़िसर्स को नोटिस और एजेंडा भेजे जाएंगे। हालांकि, हलफ़नामे के अनुसार, उस भरोसे का पालन नहीं किया गया और वही प्रक्रिया जारी रही।
'एडवोकेट्स एक्ट' में साफ़ तौर पर कहा गया कि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, 'बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया' (BCI) के 'एक्स-ऑफ़िशियो' (पद के कारण) सदस्य होंगे। इसके बावजूद, उन्हें BCI की बैठकों के नोटिस और एजेंडा नहीं भेजे गए, जिससे काउंसिल की चर्चाओं में उनकी सार्थक भागीदारी नहीं हो पाई। यह चूक इसलिए भी अहम है, क्योंकि अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, केंद्र सरकार के मुख्य कानूनी अधिकारी होने के नाते, BCI के कामकाज के लिए ज़रूरी संस्थागत नज़रिए लाते हैं।
जब भी मैंने चेयरमैन के सामने यह मुद्दा उठाया तो भरोसा दिलाया गया कि भविष्य की सभी बैठकों के लिए उन्हें नोटिस और एजेंडा ठीक से भेजे जाएंगे ताकि उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इस वादे के बावजूद, उस भरोसे को पूरा नहीं किया गया और उन्हें सही समय पर नोटिस न भेजने का सिलसिला जारी है। नियमों का यह पालन न करना न सिर्फ़ कानूनी व्यवस्था का उल्लंघन है, बल्कि प्रक्रियागत नियमितता और समावेशी फ़ैसला लेने के वादों के प्रति संस्थागत उदासीनता को भी दिखाता है।
BCI सदस्य के ये बयान इस महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के संदर्भ में अहम हो जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक नई BCI नहीं बन जाती, तब तक मनन कुमार मिश्रा का पद पर बने रहना रोज़मर्रा के कामकाज के लिए एक 'प्रो-टेम' (अस्थायी) व्यवस्था मानी जानी चाहिए और नीतिगत फ़ैसलों में अटॉर्नी जनरल को शामिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि जब अहम नीतिगत असर वाले मामलों पर विचार किया जाए, तो AG और SG को शामिल किया जाए।
PEARL-FIRST ट्रस्ट पर सवाल
कुमार ने BCI के ट्रस्ट 'PEARL-FIRST' के गठन और कामकाज पर भी चिंता जताई।
कुमार ने कहा कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, उन्हें काफ़ी समय तक मूल 'ट्रस्ट डीड' नहीं दी गई। 2020 की ट्रस्ट डीड की जांच करने पर उन्हें ऐसे प्रावधान मिले जिनके तहत कुछ लोगों को "स्थायी मैनेजिंग ट्रस्टी" बनाया गया, जिससे उन्हें BCI के सदस्य न रहने के बाद भी ट्रस्टी बने रहने की इजाज़त मिल गई।
बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने 2 सितंबर को हुई सुनवाई में उन प्रावधानों पर सवाल उठाए, जिनके तहत BCI के पदाधिकारी अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी स्थायी ट्रस्टी बने रह सकते थे।
हलफ़नामे में 'ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन' के संबंध में BCI और 'PEARL-FIRST' के बीच वित्तीय व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि एडवोकेट्स एक्ट या उसके तहत बने नियमों के किस अधिकार के तहत AIBE से होने वाली कमाई को किसी अलग ट्रस्ट में जमा या ट्रांसफर किया जा सकता है, जबकि वे AIBE को BCI का एक रेगुलेटरी काम मानते हैं।
उन्होंने AIBE से होने वाली कमाई का पूरा हिसाब-किताब मांगा, जिसमें ये बातें शामिल हैं: वे खाते जिनमें परीक्षा की फीस जमा की गई, BCI और PEARL-FIRST के बीच हुए ट्रांसफर, परीक्षा कराने वाली एजेंसियों और वेंडरों को किए गए पेमेंट, अलग-अलग परीक्षाओं से हुई अतिरिक्त कमाई और उस अतिरिक्त कमाई का बाद में कैसे इस्तेमाल किया गया।
BCI चेयरमैन के पांच साल के कार्यकाल को चुनौती
BCI चेयरमैन के तौर पर मनन कुमार मिश्रा के बने रहने पर BCI सदस्य मनोज कुमार ने उनके पांच साल के कार्यकाल के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। हलफनामे में BCI नियमों के चैप्टर I, पार्ट II के नियम 12(2) का ज़िक्र किया गया, जिसमें चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन के लिए दो साल के कार्यकाल या सदस्यता खत्म होने तक (जो भी पहले हो) का प्रावधान है।
कुमार इसकी तुलना 21 अप्रैल, 2025 के उस गैज़ेट नोटिफिकेशन से करते हैं, जिसमें मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल, 2025 से 16 अप्रैल, 2030 तक बताया गया है। वे इस अंतर को "साफ़ विसंगति" बताते हैं और कहते हैं कि कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने के अधिकार और कानूनी नियमों के साथ इसकी संगति की जांच की जानी चाहिए।
मनोज कुमार का जवाब वाला हलफनामा AoR बीजू पी. रमन के ज़रिए दाखिल किया गया।
Case : Yogamaya MG v. Union of India and others | W.P.(C) NO. 1092/2026