सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को ज़ोर दिया कि संवैधानिक लोकतंत्र के लिए बार की आज़ादी ज़रूरी है और वकीलों से इसकी रक्षा करने का आग्रह किया। उन्होंने केंद्र या राज्य स्तर की बार काउंसिलों से भी कहा कि वे पेशेवर नैतिकता, नैतिकता और पेशेवर क्षमता को बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्म-मंथन करें।

उन्होंने कहा,

"भारत में बार को मुक़दमा लड़ने वाले लोगों के लिए अपनी उपयोगिता, हमारे लोकतंत्र की रक्षा करने और अदालतों की गरिमा बनाए रखने में अपनी भूमिका, और न्याय व क़ानून के शासन को बनाए रखने में अपनी अपरिहार्यता के बारे में फिर से सोचना चाहिए। बार काउंसिलों को - चाहे वे केंद्र की हों या राज्यों की - पेशेवर नैतिकता, नैतिकता और पेशेवर क्षमता को बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्म-मंथन करना चाहिए। जब ​​कोई बार काउंसिल अपने सदस्यों का सम्मान नहीं पाती है, तो यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है।"

जस्टिस नागरत्ना की ये टिप्पणियां बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से जुड़े हालिया विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ उनकी टिप्पणियों और NALSAR के छात्रों के ख़िलाफ़ आदेशों की कानूनी समुदाय ने कड़ी आलोचना की। इसके बाद मिश्रा के इस्तीफ़े की मांग बढ़ गई और सुप्रीम कोर्ट में उनके कार्यकाल को चुनौती देने और बार काउंसिल के कामकाज की जांच की मांग करने वाली याचिकाएं दायर की गईं।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बार की आज़ादी वकीलों को उनके अपने फ़ायदे के लिए दिया गया कोई अधिकार नहीं है। यह इसलिए मौजूद है, क्योंकि एक संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों की ज़रूरत होती है जो राज्य, बाज़ार या यहां तक ​​कि अपने क्लाइंट से अनुमति लिए बिना सलाह दे सकें, बहस कर सकें, चुनौती दे सकें और प्रतिनिधित्व कर सकें।

उन्होंने कहा,

"वकील लोकतंत्र के 'सेफ़्टी वॉल्व' (सुरक्षा कवच) होते हैं। इसलिए सफल करियर की चाहत में यह न भूलें कि किस वजह से आपका पेशा बचाने लायक है। इसकी आज़ादी की रक्षा करें। इसका भरोसा जीतें।"

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बार को मुक़दमा लड़ने वाले लोगों के लिए अपनी उपयोगिता, लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका और अदालतों की गरिमा, न्याय और क़ानून के शासन को बनाए रखने में अपनी ज़िम्मेदारी के बारे में फिर से सोचना चाहिए। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की कानूनी व्यवस्था लंबित मामलों, देरी, बढ़ती लागत और अनिश्चितता से जूझ रही है। उन्होंने कहा कि बार (वकीलों के संगठन) को एकजुट होकर यह सोचना चाहिए कि न्याय देने की व्यवस्था को कैसे बनाए रखा जा सकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने याद दिलाया कि कानूनी पेशे से जुड़े लोगों ने राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि बार के सदस्य और बार एक संगठन के तौर पर परेशान मुकदमों वाले लोगों और लोकतंत्र को बनाए रखने के प्रति अपने कर्तव्यों पर आत्म-मंथन करें।

उन्होंने कहा,

"इस देश के वकील हमारे संविधान के मूल्यों के वाहक हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि बार की किसी भी चूक या गलती का देश के राजनीतिक और नागरिक जीवन पर गहरा असर पड़ेगा।

उन्होंने वकीलों से अपनी सोच बदलने और अपने क्लाइंट के लिए जन-सेवा की भावना से काम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशा सिर्फ़ कोई नौकरी या व्यापार नहीं, बल्कि "भरोसे का पद" है।

पास होने वाले छात्रों को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वकील का कर्तव्य सिर्फ़ काम की शर्तों या क्लाइंट के निर्देशों तक सीमित नहीं होता। क्लाइंट वकील को निर्देश दे सकता है, लेकिन ऐसे मौके भी आ सकते हैं, जब वकील को क्लाइंट को बताना पड़े कि प्रस्तावित तरीका समझदारी भरा नहीं है, कानूनी रूप से सही नहीं है और न तो क्लाइंट के हित में है और न ही कानून के शासन के हित में।

उन्होंने कहा कि वकील क्लाइंट के लिए काम करते हैं, लेकिन वे ऐसे संस्थानों में काम करते हैं, जो आम जनता के होते हैं। इसलिए, उनका कर्तव्य दो दिशाओं में होता है – उस व्यक्ति के प्रति जिसने उन्हें कोई मामला सौंपा है और उस संस्थान के प्रति जिसके भीतर वे उस मामले को आगे बढ़ाते हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने कानूनी पेशे के बदलते स्वरूप के बारे में भी बात की और प्रैक्टिस शुरू करने वाले युवा वकीलों को सलाह दी।

उन्होंने कहा कि बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है और तकनीक कानूनी काम के स्वरूप को बदल देगी। रोज़मर्रा की रिसर्च और ड्राफ्टिंग तेज़ हो जाएगी और जानकारी सस्ती हो जाएगी। नतीजतन, सिर्फ़ जानकारी होने का महत्व कम हो जाएगा। हालाँकि, उन्होंने कहा कि सही फ़ैसला लेने या समझदारी दिखाने का महत्व बना रहेगा।

उन्होंने कहा कि युवा वकीलों को पूरे विवाद को देखने की आदत डालनी चाहिए, न कि सिर्फ़ उसमें शामिल कानूनी पहलुओं को। उन्हें यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि क्या किसी विवाद को अदालत में ले जाना चाहिए, क्या केस करने से पहले पक्षों को बातचीत करनी चाहिए, क्लाइंट के हितों से समझौता किए बिना किन बातों पर सहमति दी जा सकती है, दूसरी पार्टी क्या चाहती थी, और कब ज़ोर देना है और कब रुकना है।

जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे सिर्फ़ कानूनी प्रावधानों को रटने के बजाय बातचीत (Negotiation) करना, समझौते का ड्राफ़्ट तैयार करना और मध्यस्थता (Arbitration) की कार्यवाही असल में कैसे काम करती है, यह सीखें। उन्होंने उनसे मध्यस्थता की कार्यवाही देखने और यह समझने को भी कहा कि अच्छे वकील कैसे बातचीत करते हैं—वे क्या कहते हैं और क्या नहीं कहते।

उन्होंने अदालतों में पेश होने वाले वकीलों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से बने नकली फैसलों पर भरोसा करने के खिलाफ भी आगाह किया।

उन्होंने कहा,

"अगर आप अदालत में बहस कर रहे हैं, तो पक्का करें कि AI से मिले नकली फैसलों का हवाला न दें। 'हैलुसिनेशन' (AI की गलत जानकारी) का शिकार न बनें।"

जस्टिस नागरत्ना ने वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के महत्व पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक मुकदमेबाजी से वैकल्पिक तरीकों की ओर एक साफ़ बदलाव देखा गया। हालांकि मुकदमेबाजी का अपना महत्व बना हुआ है और अदालतें न्याय प्रणाली की मुख्य आधार बनी हुई हैं।

उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी में प्रक्रियात्मक जटिलता, देरी, खर्च और इसके स्वभाव से ही विरोधी (Adversarial) होने जैसी चुनौतियां होती हैं। इसलिए मध्यस्थता (Arbitration), सुलह-सफाई (Mediation) और समझौता-वार्ता (Conciliation) न्याय प्रणाली का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वकीलों को न सिर्फ़ यह समझना चाहिए कि ADR के तरीके क्या हैं, बल्कि यह भी कि वे कब उपयोगी होते हैं। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता का सही समय बहुत ज़रूरी है और उन्होंने कंपनी एक्ट के तहत ट्रिब्यूनल में चल रही कार्यवाही में मध्यस्थता की संभावना का ज़िक्र किया, खासकर उन विवादों में जहां भरोसा टूटने या अहंकार के टकराव की बात हो, जैसे कि बहुमत और अल्पसंख्यक शेयरधारकों के बीच विवाद।

उन्होंने 'Arb-Med-Arb' मॉडल का भी ज़िक्र किया, जिसके तहत अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया की निश्चितता सुनिश्चित करने के लिए मध्यस्थता (Arbitration) शुरू की जा सकती है। उसके बाद मध्यस्थता (Mediation) के लिए कार्यवाही को रोका जा सकता है। अगर मध्यस्थता सफल होती है तो समझौते को मध्यस्थता प्रक्रिया में दर्ज किया जा सकता है। अगर मध्यस्थता विफल रहती है तो मध्यस्थता (Arbitration) फिर से शुरू होती है और एक बाध्यकारी फैसला आता है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आज के वकील की अहमियत सिर्फ़ कानून जानने के लिए नहीं, बल्कि समस्याओं को सुलझाने की क्षमता के लिए भी बढ़ रही है।

उन्होंने पास होने वाले छात्रों से कहा कि वे NLU दिल्ली से "अदालत के अधिकारी और संविधान के संरक्षक" के तौर पर निकल रहे हैं और उनसे आग्रह किया कि वे कानून के शासन की सेवा में अपने ज्ञान और समझ का इस्तेमाल करें।

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