बिहार SIR फैसले की समीक्षा के लिए असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया
लोकसभा सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को वैध ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा की मांग करते हुए याचिका दायर की है।
ओवैसी मूल बिहार SIR मामले में पक्षकार नहीं थे। हालांकि, उन्होंने मतदाता, निर्वाचित जनप्रतिनिधि और AIMIM प्रमुख के रूप में समीक्षा याचिका दाखिल की है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष ने SIR को लेकर एक रिट याचिका दायर की है।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR को वैध ठहराया था
बिहार SIR मामले में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने चुनाव आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को बरकरार रखा था। कोर्ट ने कहा था कि मतदाता सूची का SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की संवैधानिक आवश्यकता को आगे बढ़ाता है।
ओवैसी की समीक्षा याचिका में कहा गया है कि फैसले के बाद सामने आई नई जानकारियों के मद्देनजर चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया की दोबारा जांच आवश्यक है।
चुनाव आयुक्तों की असहमति से जुड़ी रिपोर्ट का हवाला
याचिका में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया कि लगभग 10 महीने की अवधि में करीब 14 फैसले दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति के बिना लिए गए।
याचिका के अनुसार, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता पंजीकरण फॉर्म में किए गए बदलावों और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, विशेष रूप से SIR, को लेकर सवाल उठे हैं।
ओवैसी ने कहा है कि चुनाव आयोग की आंतरिक फाइल टिप्पणियां, पत्राचार और निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसलिए याचिका में नई सामने आई सामग्री पर विचार करने और चुनाव आयोग से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत कराने की मांग की गई है।
यूपी SIR में 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े फॉर्म का उल्लेख
समीक्षा याचिका में द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की 9 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने कथित तौर पर 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने के लिए ऐसे फॉर्म स्वतः तैयार किए, जिनमें नाम हटाने का कारण दर्ज नहीं था।
याचिका में कहा गया है कि इससे प्रक्रिया की निष्पक्षता और निर्धारित कानूनी सुरक्षा उपायों के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। इसके अनुसार, जिन अधिकारियों को आपत्तियों पर निर्णय लेना था, वे ही अपने निर्णयों के आधार पर नाम हटाने के अनुरोध शुरू करने की स्थिति में आ गए। याचिका में इसे उनके वैधानिक कार्यों के स्वतंत्र निर्वहन से जुड़ा मुद्दा बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैरा 75 का हवाला
याचिका में बिहार SIR फैसले के पैरा 75 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग की शक्तियों का इस्तेमाल कानून की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। याचिका के अनुसार, विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते समय आयोग को कारण दर्ज करने चाहिए और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम या निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में मौजूद किसी स्पष्ट निषेध का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार निर्णय लेने की प्रक्रिया मनमानी से प्रभावित होने या अपनाया गया उपाय उद्देश्य की तुलना में पूरी तरह असंगत होने पर न्यायिक हस्तक्षेप किया जा सकता है।
ओवैसी की याचिका में कहा गया है कि अब आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया की वैधता ही सवालों के घेरे में है। इसमें आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग ने हलफनामों, संलग्न दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड के बावजूद SIR से जुड़े फैसलों पर अपने ही सदस्यों की आंतरिक आपत्तियों का खुलासा नहीं किया।
नई सामग्री पहले उपलब्ध नहीं होने का दावा
समीक्षा याचिका के अनुसार, बिहार SIR फैसले के बाद सामने आई सामग्री याचिकाकर्ता को फैसले से पहले उपलब्ध नहीं थी और न ही उसे उस समय अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता था, क्योंकि संबंधित रिकॉर्ड चुनाव आयोग के पास थे।
याचिका में कहा गया है कि यदि फैसले की समीक्षा नहीं की गई, तो ऐसी निर्णय प्रक्रिया को न्यायिक मंजूरी मिल सकती है, जिसके महत्वपूर्ण पहलू मूल सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं थे।
ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट से नई सामने आई सामग्री पर विचार करने और चुनाव आयोग से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड तलब करने का अनुरोध किया है।