आर्टिकल 226 - हाईकोर्ट को रिट याचिका का निपटारा करते समय चुनौती देने के आधार पर अपना दिमाग लगाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2022-01-13 12:46 GMT
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उड़ीसा हाईकोर्ट के आदेश का विरोध करने वाली एक विशेष अनुमति याचिका पर विचार करते हुए हाल ही में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट को याचिका में दी गई चुनौती के आधार को गंभीरता से देखना चाहिए और उस पर अपना दिमाग लगाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने चुनौती के आधार पर अपना दिमाग लगाए बिना रिट याचिका का निपटारा करने के लिए हाईकोर्ट की कार्यवाही की आलोचना की।

उड़ीसा हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित करके उड़ीसा प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ता को सुना। इस रिट याचिका के माध्यम से याचिकाकर्ताओं ने 2008 के आदेश संख्या 163 में उड़ीसा प्रशासनिक न्यायाधिकरण, भुवनेश्वर द्वारा पारित निर्णय और आदेश दिनांक 14.11.2012 को चुनौती दी है।

विरोधी पक्ष को ध्यान में रखते हुए जो तीन दशकों से काम कर रहा है, ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों में दखल देना हमारे लिए उचित नहीं होगा। तदनुसार रिट याचिका खारिज की जाती है। हालांकि इसे अन्य न्यायिक मामलों के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा।"

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए एस बोपन्ना की पीठ ने उड़ीसा राज्य और अन्य बनाम प्रशांत कुमार स्वैन मामले में हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कार्यवाही को नए सिरे से शुरू करने के लिए उड़ीसा हाईकोर्ट वापस भेज दिया।

पीठ ने कहा,

"हाईकोर्ट ने मामले में चुनौती के आधार पर या प्रस्तुतियाँ पर कोई विचार नहीं किया। वास्तव में हाईकोर्ट के आदेश की अंतिम पंक्ति इंगित करती है कि निर्णय को एक मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा।

यह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक मूल याचिका का निपटान करने का एक अनुचित तरीका है, क्योंकि हाईकोर्ट अपना दिमाग लगाने के लिए बाध्य है कि क्या ट्रिब्यूनल का निर्णय तथ्यों और कानून के अनुसार टिकाऊ है।"

सुप्रीम कोर्ट ने यह देखते हुए कि 2008 में ट्रिब्यूनल के समक्ष कार्यवाही शुरू की गई थी, आदेश की एक प्रति प्राप्त होने से तीन महीने की अवधि के भीतर मामले को तेजी से निपटाने के लिए हाईकोर्ट से अनुरोध किया।

केस शीर्षक: उड़ीसा राज्य और अन्य बनाम प्रशांत कुमार स्वैन|

2022 की सिविल अपील नंबर 154

कोरम: जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना

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