'Alibi' को सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही साबित किया जा सकता है, ऐसा कोई सख़्त नियम नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने BSF जवान के ख़िलाफ़ IPC की धारा 498A का केस रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 अगस्त) को कहा कि दस्तावेज़ी सबूत - जिसमें आरोपी के घटनास्थल पर मौजूद न होने को साबित करने वाले आधिकारिक सर्विस रिकॉर्ड भी शामिल हैं - ऐसे ठोस सबूत हैं जिन पर आपराधिक केस को रद्द करने के लिए शुरुआती चरण में ही विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि यह नियम कि आरोपी को आमतौर पर ट्रायल के दौरान ही 'Alibi' साबित करना चाहिए, कोई सख़्त नियम नहीं है। इसे ऐसे नहीं समझा जा सकता कि ट्रायल से पहले के चरण में 'Alibi' साबित करने वाले भरोसेमंद और निर्विवाद दस्तावेज़ी सबूतों पर विचार करने पर पूरी तरह रोक है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,
"इसे ऐसा सख़्त नियम नहीं माना जा सकता कि आरोपी की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी से जुड़े किसी भी तरह के दस्तावेज़ी सबूत को - चाहे उसका स्रोत या स्वरूप कुछ भी हो और उसकी प्रमाणिकता पर कोई विवाद न हो - शुरुआती चरण में देखा ही नहीं जा सकता।"
बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता (BSF जवान) के ख़िलाफ़ घरेलू क्रूरता का केस (IPC की धारा 498A) रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। यह जवान भारत-बांग्लादेश सीमा के पास तैनात था और कथित घटना के समय उत्तर प्रदेश में मौजूद नहीं था।
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए आधिकारिक सर्विस दस्तावेज़ों को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार किया था, जो एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 11 के तहत 'Alibi' के दावे को साबित करते थे।
'राजेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2007)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि 'Alibi' के दावे में तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल शामिल हैं, जिनका फ़ैसला सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।
हाईकोर्ट के फ़ैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
Cause Title: RAHUL VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH AND ANOTHER