मौजूदा जजों के बच्चों की सरकारी वकील के तौर पर नियुक्ति को लेकर हालिया विवादों ने न्यायिक मर्यादा और हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट) के मुद्दे को चर्चा में ला दिया। यह बात सामने आने पर सवाल उठे कि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे को भारत के चुनाव आयोग के वकील के तौर पर पैनल में शामिल किया गया; क्योंकि यह तथ्य तब सामने आया जब जज ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त अधिनियम' की वैधता से जुड़े मामलों और मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी मेधा रूपम से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर ली थी।

इससे पहले, अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से आबकारी नीति मामले से खुद को अलग करने (Recusal) की मांग की थी। उन्होंने इसके लिए कई वजहें बताई थीं, जिनमें उनके बच्चों का केंद्र सरकार के वकील के तौर पर पैनल में शामिल होना भी शामिल था। इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि अगर केंद्र के साथ जजों के बच्चों का पैनल में शामिल होना खुद को अलग करने का आधार माना जाए तो कई जजों को मामलों की सुनवाई से खुद को अलग करना पड़ेगा। जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि कोई वादी यह तय नहीं कर सकता कि जजों के बच्चे कैसे रहें।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस पीके मिश्रा के बेटे की राजस्थान के एडिशनल एडवोकेट जनरल (Additional Advocate General) के तौर पर नियुक्ति पर भी सवाल उठे थे। इसे इस आधार पर चुनौती दी गई कि उन्हें 10 साल से कम का कानूनी प्रैक्टिस का अनुभव था, हालांकि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इसमें दखल देने से इनकार किया।

इस पृष्ठभूमि में LiveLaw ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओक की राय जानी।

आदर्श रूप से जजों के बच्चों को सरकारी नियुक्तियों से बचना चाहिए

जस्टिस ओक ने राय दी कि आदर्श रूप से मौजूदा जजों के बच्चों को अपने माता-पिता के रिटायर होने तक सरकारी संस्थानों और एजेंसियों के लिए पैनल वकील के तौर पर नियुक्ति से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी संयम बरतने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता में जनता का भरोसा बनाए रखने में मदद मिलेगी।

इंटरव्यू में जस्टिस ओक ने कहा कि हालांकि मौजूदा जजों के बच्चों के वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने में सिद्धांत रूप से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चिंता तब पैदा होती है, जब उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED), भारत के चुनाव आयोग (ECI), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और अन्य सरकारी निकायों जैसे संस्थानों के लिए पैनल वकील के तौर पर नियुक्त किया जाता है। उन्होंने ज़ोर दिया कि ऐसी नियुक्तियां (पैनल में शामिल करना) एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के ज़रिए होनी चाहिए, जिसमें योग्यताएँ साफ़ तौर पर तय हों और सभी योग्य वकीलों को मुकाबला करने का मौका मिले।

जस्टिस ओक ने कहा कि पैनल में वकीलों को शामिल करने से पहले संस्थाओं को योग्यता के नियम तय करने चाहिए, आवेदन मँगाने चाहिए और एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

उन्होंने कहा,

"अगर किसी को सीधे पैनल सदस्य के तौर पर नियुक्त किया जाता है और वह व्यक्ति किसी मौजूदा जज का बेटा या बेटी है तो ज़ाहिर है कि कई सवाल उठेंगे कि क्या यह नियुक्ति मेरिट के आधार पर हुई या उन्हें यह पद सिर्फ़ अपनी खास स्थिति की वजह से मिला।"

उन्होंने आगे कहा कि अगर संस्थाएँ निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाएं और हर योग्य वकील को मुकाबला करने का मौका दें, तो इस चिंता को दूर किया जा सकता है।

जजों को एजेंसियों द्वारा अपने बच्चों को पैनल में शामिल किए जाने की जानकारी देनी चाहिए और उनके मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

जस्टिस ओक ने कहा कि अगर किसी मौजूदा जज का बेटा या बेटी ED, ECI या NIA जैसी संस्थाओं के लिए वकील के तौर पर पैनल में शामिल है तो जज को इस रिश्ते के बारे में बताना चाहिए और उस संस्था से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग रखना चाहिए।

उन्होंने कहा,

"उदाहरण के लिए, अगर किसी का बेटा ED पैनल का वकील है, तो जज को ED का कोई भी मामला नहीं लेना चाहिए।"

साथ ही जस्टिस ओक ने सरकारी संस्थाओं और ED, ECI और NIA जैसी एजेंसियों द्वारा पैनल में शामिल किए जाने और केंद्र या राज्य सरकार के लिए पैनल वकील के तौर पर नियुक्ति के बीच फ़र्क बताया।

सिर्फ़ इसलिए कि किसी जज का बच्चा सरकारी वकील के तौर पर पैनल में शामिल है, जज को संबंधित सरकार से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई से खुद को अलग करने की ज़रूरत नहीं है।

उन्होंने कहा,

"अगर कोई विवादित मामला है तो सिर्फ़ इसलिए कि जज का बेटा या बेटी पैनल में शामिल है, जज को सुनवाई से अलग होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन वह हमेशा यह बता सकते हैं कि मेरा बच्चा पैनल में शामिल है। जानकारी देना एक बात है और अपने-आप सुनवाई से अलग हो जाना दूसरी बात। मुझे नहीं लगता कि सिर्फ़ इसलिए अपने-आप सुनवाई से अलग होने की ज़रूरत है कि बेटा या बेटी सरकारी पैनल के वकील हैं।"

उन्होंने कहा कि केंद्र या राज्य सरकार के पैनल के मामले में भी, पैनल में शामिल करने की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि पक्षपात के आरोपों से बचा जा सके। हालांकि, अगर किसी जज के बच्चे को रेगुलर सिलेक्शन प्रोसेस के ज़रिए चुना गया तो जज को केंद्र या राज्य सरकार से जुड़े सभी मामलों से खुद को अलग करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जजों को ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं करनी चाहिए जिनमें उनके बच्चे वकील के तौर पर पेश हुए हों।

जजों के परिवारों को भी संयम बरतना चाहिए

जस्टिस ओक ने कहा कि मौजूदा जजों के बच्चों के लिए आदर्श रास्ता यह होगा कि वे अपने माता-पिता के सेवानिवृत्त होने तक सरकारी निकायों और एजेंसियों से नियुक्तियां स्वीकार करने से बचें। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह स्व-लगाए गए संयम का मामला होगा और इसे कानूनी निषेध के माध्यम से नहीं लगाया जा सकता है।

उन्होंने कहा,

"आदर्श बात यह होगी कि जज के बच्चों को किसी भी सरकारी पैनल में नियुक्त होने से बचना चाहिए। लेकिन यह एक स्व-लगाया गया प्रतिबंध होगा। कानून के अनुसार, आप किसी को पैनल में शामिल होने से नहीं रोक सकते।"

जस्टिस ओक ने कहा कि जजों के परिवार के सदस्यों को भी विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए

उन्होंने कहा,

"मैं बॉम्बे हाईकोर्ट के जजों के बच्चों को जानता हूं, जो अपने पिता या मां के सेवानिवृत्त होने तक कम प्रोफ़ाइल रखते थे। यह परिवार के सदस्यों के विवेक दिखाने का सवाल है। आदर्श रूप से, जब माता-पिता जज बन जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिवार पर भी कुछ बाधाएं होती हैं। यदि वे उस बाधा का पालन करते हैं तो समस्या हल हो जाएगी।"

उन्होंने कहा कि अंततः, न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने की जिम्मेदारी न केवल न्यायाधीशों की बल्कि उनके परिवार के सदस्यों की भी है।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा को ECI के साथ बेटे के पैनल में शामिल होने का खुलासा करना चाहिए

भारत के चुनाव आयोग (ECI) के वकील के रूप में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे को सूचीबद्ध करने के विवाद पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस ओक ने कहा कि जस्टिस शर्मा को शुरुआत में ही इस तथ्य का खुलासा करना चाहिए।

उन्होंने कहा,

''जस्टिस शर्मा को शुरुआत में ही खुलासा करना चाहिए था।''

इस सवाल पर कि क्या चुनाव आयोग से जुड़े मामले की गैर-प्रकटीकरण के कारण दोबारा सुनवाई की जा सकती है, जस्टिस ओक ने कहा कि चूंकि मामले में योग्यता के आधार पर कोई निर्णय नहीं दिया गया, इसलिए तकनीकी रूप से, वापस लेने का कोई निर्णय नहीं है।

हालांकि, उन्होंने कहा कि एक अलग स्थिति उत्पन्न हो सकती है यदि किसी मामले का फैसला पहले ही योग्यता के आधार पर किया जा चुका हो और बाद में यह सामने आए कि जज के बच्चे को किसी एक पक्ष द्वारा सूचीबद्ध किया गया।

ऐसी स्थिति में एक पक्ष इस आधार पर फैसले को वापस लेने की मांग कर सकता है कि यदि रिश्ते का खुलासा हुआ होता तो उसके पास जज से फैसले को वापस लेने का अनुरोध करने का अवसर होता।

उन्होंने कहा,

"एक तर्क हो सकता है कि अगर इसका खुलासा किया गया होता तो पार्टी के पास इससे अलग होने का मौका होता और वे उस अवसर से वंचित रह गए। यही एकमात्र आधार हो सकता है।"

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: