सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने बताया कि तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने उनसे 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA) के मुख्य प्रावधानों को बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाओं के मामले में "बीच का रास्ता" अपनाने को कहा था।

एक और खुलासा करते हुए जस्टिस कौल ने बताया कि जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़ा मामला उनकी बेंच से तब हटा लिया गया था, जब वे केंद्र सरकार पर कॉलेजियम की लंबित सिफारिशों पर कार्रवाई करने के लिए जोर डाल रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि तत्कालीन CJI पर यह मामला उनकी बेंच से हटाने का कुछ दबाव था, हालांकि वह यह नहीं कह सकते कि क्या यह दबाव सरकार की ओर से डाला गया।

'द वायर' के पत्रकार करण थापर से अपनी आने वाली किताब 'विदाउट फियर ऑर फेवर' (बिना डर ​​या पक्षपात के) के बारे में बात करते हुए जस्टिस कौल ने इन दोनों मामलों को लेकर CJI चंद्रचूड़ के साथ हुई अपनी बातचीत का जिक्र किया।

'कभी बीच का रास्ता नहीं अपनाया'

PMLA मामले से जुड़े घटनाक्रम को याद करते हुए जस्टिस कौल ने बताया कि CJI चंद्रचूड़ ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया था। उस समय जस्टिस कौल की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच को 'विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाओं की सुनवाई करनी थी।

जस्टिस कौल ने बताया कि इस चर्चा के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना भी मौजूद थे, जो उस बेंच का हिस्सा थे।

जस्टिस कौल के अनुसार, CJI ने उन्हें इस मामले में आगे न बढ़ने के लिए मनाने की कोशिश की और सुझाव दिया कि अगर वह आगे बढ़ने का फैसला करते हैं तो उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए और "बीच का रास्ता" अपनाना चाहिए।

जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने सुनवाई जारी रखने का फैसला किया, क्योंकि पीछे हटने से उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ सकते थे।

उन्होंने कहा,

"लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे? कि मैं इसके लिए पैसे ले रहा हूँ? अगर 22 साल तक जज रहने के बाद मैं इस तरह के मुद्दे पर झुक जाता हूं तो इसका मतलब है कि मैंने अपना काम ठीक से नहीं किया। मेरी ईमानदारी मेरे लिए बहुत मायने रखती है; मैं किसी के दबाव में आकर उससे समझौता नहीं कर सकता।"

जस्टिस कौल ने बताया कि उन्होंने CJI से कहा था कि अपने न्यायिक करियर में उन्होंने कभी भी बीच का रास्ता नहीं अपनाया, बल्कि जब भी उन्हें लगा कि कोई कदम उठाना सही है तो उन्होंने उस पर आगे बढ़कर काम किया।

उन्होंने CJI से कही अपनी बात को याद करते हुए बताया,

"अपने न्यायिक करियर में मैंने कभी भी किसी भी तरह से बीच का रास्ता नहीं अपनाया। अगर मुझे कोई बात सही लगी, तो मैंने उस पर आगे बढ़कर काम किया।"

जस्टिस कौल ने आगे बताया कि इस बातचीत के बाद वह और जस्टिस खन्ना सुनवाई के लिए कोर्ट रूम की ओर गए।

जस्टिस कौल ने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले को उनके रिटायरमेंट तक खींचना चाहती थी और लगातार सुनवाई टालने (Adjournment) की मांग करती रही; आखिरकार, उनके रिटायरमेंट से कुछ समय पहले ही उस बेंच को भंग कर दिया गया।

इस बेंच के सामने जो याचिकाएं थीं, उनमें सुप्रीम कोर्ट के 2022 के 'विजय मदनलाल चौधरी' मामले के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की गई। उस फैसले में PMLA के कई प्रावधानों को बरकरार रखा गया था, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्तारी, तलाशी और ज़ब्ती की शक्तियां, और ज़मानत के लिए रखी गई कड़ी शर्तें शामिल हैं।

PMLA मामले को जस्टिस कौल की बेंच से हटाने की कोशिश की गई।

जस्टिस कौल ने आगे बताया कि सुनवाई से पहले इस मामले को उनकी बेंच से हटाने की कोशिश की गई थी।

इंटरव्यू के दौरान, थापर ने पूछा कि क्या यह सच है कि इस मामले को उनसे दूर ले जाने की "कोशिश" की गई।

इसके जवाब में जस्टिस कौल ने कहा कि उन्हें एक अन्य जज से पता चला कि याचिकाओं का वह समूह किसी दूसरी बेंच के पास चला गया है, जिससे उन्हें "काफी परेशानी" हुई।

उन्होंने कहा:

"जजों में से एक, जो मेरे सहकर्मी थे, उन्होंने बताया कि यह मामला किसी और बेंच के सामने गया था। इसने मुझे परेशान किया। मैंने उस समय चीफ जस्टिस से बात की। उन्होंने बताया कि किसी जज ने अपने और अपनी बेंच के सामने चल रहे सभी मामलों को एक साथ मिलाने (कंसोलिडेशन) का आदेश दे दिया था। मैंने कहा कि चीफ जस्टिस की सहमति के बिना ऐसा कैसे हो सकता है... मैंने उनसे कहा, अगर आप नहीं चाहते कि मैं इन मामलों की सुनवाई करूं तो मुझे बता दें। मुझे हर तरह के मामले सुनने की कोई खास जल्दी नहीं है, लेकिन किसी जज के पास से कोई मामला इस तरह नहीं छीना जाना चाहिए।"

जस्टिस कौल ने आगे बताया कि बाद में CJI चंद्रचूड़ ने जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी के साथ मिलकर तीन जजों की एक बेंच गठित की।

जजों की नियुक्ति के मामले को हटाए जाने पर

जस्टिस कौल ने यह भी बताया कि जब वह जजों की नियुक्ति के लिए एक समय-सीमा (टाइमलाइन) लागू करने की कोशिश कर रहे थे, तब यह मामला उनकी बेंच से हटा लिया गया था।

थापर ने पूछा कि क्या यह सच है कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने उनसे जजों की नियुक्ति का मामला इसलिए हटा लिया था, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि सरकार के खिलाफ कोई प्रतिकूल आदेश दिया जा सकता है?

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस कौल ने इस घटना को "बहुत अजीब" बताया। उन्होंने कहा कि उस मामले में बेंच असल में सरकार को थोड़ा "प्रोत्साहित" (पुश) करने की कोशिश कर रही थी, ताकि जजों की नियुक्ति में देरी न हो।

जस्टिस कौल, जस्टिस सुधांशु धूलिया के साथ उस बेंच का हिस्सा थे, जो केंद्र सरकार के खिलाफ दायर अवमानना ​​याचिकाओं (Contempt Petitions) की सुनवाई कर रही थी। ये याचिकाएं जजों की नियुक्ति में देरी को लेकर थीं। सुनवाई के दौरान, बेंच ने कॉलेजियम के प्रस्ताव पर कोई कदम न उठाने और "अपनी पसंद के लोगों को चुनने" (Pick and Choose) के रवैये के लिए सरकार की आलोचना की थी। हालाँकि, अचानक ही इस मामले को बेंच की कॉजलिस्ट (कार्यसूची) से हटा दिया गया।

उन्होंने कहा,

"हम उस मामले में चीजों को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। मुझे नहीं पता कि उस चरण में वह मामला क्यों हटा लिया गया। जाहिर है, याचिकाकर्ता इससे बहुत दुखी थे, इसलिए उन्होंने इस बात का जिक्र किया। मैंने सुप्रीम कोर्ट के संबंधित रजिस्ट्रार को कोर्ट में बुलाया। वे आए और बोले कि लंच के समय मुझसे मिलकर बता देंगे। मैं उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहता था। तो, लंच के समय उन्होंने मुझे बताया कि फाइल पर एक नोट था, जिसके अनुसार शायद 2 साल पहले जब यह मामला मुझे सौंपा गया था, तब चीफ जस्टिस से कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली गई। इसलिए इस मामले को वापस लेना ही उचित समझा गया।"

जस्टिस कौल ने बताया कि उन्होंने CJI के सामने अपनी नाराजगी जताई थी कि जिस तरह से यह मामला उनसे वापस लिया गया, वह नहीं होना चाहिए था।

जब थापर ने संस्मरण में लिखी इस बात की ओर इशारा किया कि "चीफ जस्टिस किसी दबाव में थे", तो जस्टिस कौल ने जवाब दिया, "शायद उन्हें लगा होगा कि मुझे यह मामला नहीं संभालना चाहिए।"

जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार ने CJI पर दबाव डाला था कि वह जस्टिस कौल की बेंच से यह मामला हटा दें तो उन्होंने कहा, "यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है।"

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