कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरभ दास और आशुतोष रांका की हिरासत से जुड़ी कार्यवाही ने ऐसी अजीबोगरीब बात सामने ला दी, जिसके बारे में शायद कानूनी हलकों के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं या चर्चा करते हैं - वह यह कि पुलिस अधिकारी 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' (विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट) के रूप में काम करते हैं।

दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 70 के तहत जारी एक अधिसूचना के जरिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर, अतिरिक्त कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर, एडिशनल डिप्टी कमिश्नर और असिस्टेंट कमिश्नर को 'एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' की शक्तियां दी गई हैं। ये शक्तियां 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर' (CrPC) के अध्याय VIII (जो अब 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के अध्याय IX के बराबर है) के अंतर्गत आती हैं, जो शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण (Good Behaviour) के लिए सुरक्षा से संबंधित हैं।

इन प्रावधानों (CrPC की धारा 107 / BNSS की धारा 126 आदि) के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट उन लोगों के खिलाफ निवारक (Preventive) कार्यवाही शुरू कर सकते हैं, जिनके बारे में यह संदेह हो कि वे शांति भंग कर सकते हैं या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ सकते हैं। ऐसे लोगों को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड (मुचलका) भरना पड़ता है। यदि शांति बनाए रखने के इस बॉन्ड का उल्लंघन होता है, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को बॉन्ड की अवधि तक हिरासत में रखने का आदेश दे सकते हैं (CrPC की धारा 122 / BNSS की धारा 141)।

कई राज्यों में राजस्व विभाग के अधिकारियों (जैसे RDO) को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के रूप में अधिसूचित किया जाता है, जो इन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों पर पुलिस अधिकारियों को ये शक्तियां दी गई हैं। तमिलनाडु में पुलिस अधिकारियों को ये शक्तियां देने वाली सरकारी अधिसूचनाओं को मद्रास हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि ये 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं (जिसके बारे में आगे विस्तार से बताया जाएगा)।

पुलिस जब मजिस्ट्रेट की भूमिका में आ जाए

ज्यादातर मामलों में CrPC की धारा 107 (जो अब BNSS की धारा 126 है) के तहत निवारक कार्यवाही, खुद पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर शुरू की जाती है। प्रावधान के अनुसार, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से यह तय करना होता है कि आगे की कार्यवाही जरूरी है या नहीं, और उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है।

सिद्धांत रूप में यहां एक तरह की स्वतंत्र जांच (Independent Check) की गुंजाइश होती है, जब पुलिस विभाग से बाहर का कोई अधिकारी खतरे की आशंका (Threat Perception) के बारे में पुलिस की रिपोर्ट का आकलन करता है। लेकिन अगर पुलिस तंत्र के भीतर का ही कोई व्यक्ति पुलिस रिपोर्ट का निर्णायक बन जाए तो स्वतंत्र मूल्यांकन की वह सैद्धांतिक अवधारणा भी खत्म हो जाती है।

इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के बंटवारे (Separation of Powers) को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं।

'अगर खाकी और न्यायिक चोगे को मिला दिया जाए तो इसका नतीजा कार्यपालिका की अराजकता (Executive Anarchy) होगा' : मद्रास हाईकोर्ट

2013-14 में तमिलनाडु सरकार ने अधिसूचनाएं जारी कीं, जिनके तहत पुलिस कमिश्नरेट वाले विभिन्न शहरों के डिप्टी पुलिस कमिश्नरों को CrPC की धारा 107 से 110 और 122 के अंतर्गत 'कार्यकारी मजिस्ट्रेट' (Executive Magistrate) की शक्तियां दी गईं।

2020 में मद्रास हाईकोर्ट की सिंगल बेंच (जस्टिस पी.एन. प्रकाश) ने 'देवी बनाम कार्यकारी मजिस्ट्रेट-सह-डिप्टी पुलिस कमिश्नर' मामले में इन अधिसूचनाओं पर सवाल उठाए। जज ने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान भी पुलिस को ऐसी शक्तियां नहीं दी गई थीं।

यह देखते हुए कि CrPC की धारा 107 के तहत होने वाली कार्यवाही न्यायिक प्रकृति की होती है, जज ने पुलिस अधिकारियों द्वारा ऐसी शक्तियों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। चूंकि इस मामले में पहले से ही एक अलग तरह का न्यायिक उदाहरण (Precedent) मौजूद था, इसलिए इस मुद्दे को दो जजों की पीठ (Division Bench) के पास भेज दिया गया।

2023 में जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस आनंद वेंकटेश की खंडपीठ ने 'पी. सतीश उर्फ ​​सतीश कुमार बनाम राज्य व अन्य' मामले में सरकार के उन आदेशों को रद्द किया, जो डिप्टी पुलिस कमिश्नरों को CrPC की धारा 107 के तहत शक्तियां देते थे। अदालत ने इन आदेशों को 'शक्तियों के बंटवारे' के सिद्धांत का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक करार दिया।

खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यदि "खाकी और न्यायिक चोगे को मिलाकर एक ही अधिकारी पर डाल दिया जाए तो जो तस्वीर सामने आएगी, वह कार्यपालिका की अराजकता (Executive Anarchy) की होगी।"

इस तरह की व्यवस्था के खतरे को इस प्रकार समझाया गया:

"यदि हम राज्य के इस तर्क को मान लें कि धारा 107 से 110 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए डिप्टी कमिश्नर को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट नियुक्त किया जा सकता है तो ऐसी स्थिति बन जाएगी, जहां पुलिस इंस्पेक्टर जांच करेगा और डिप्टी कमिश्नर के सामने जानकारी पेश करेगा। इसके बाद डिप्टी कमिश्नर धारा 116 के तहत जांच करेंगे और धारा 117 या 118 के तहत आदेश पारित करेंगे। हमारे सामने आए कुछ मामलों के आदेशों को देखकर हमें हैरानी हुई कि डिप्टी कमिश्नरों ने गवाहों से पूछताछ करके पूरी तरह से ट्रायल (मुकदमा) चलाया है, और एक मामले में तो उन्होंने गवाहों को 'होस्टाइल' (विपक्षी) भी घोषित कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो, जांच, अभियोजन और फैसले की पूरी प्रक्रिया अब एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) के एक ही हिस्से, यानी पुलिस ने अपने हाथ में ले ली है।"

हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया में पक्षपात की संभावना बनी रहती है। कोर्ट ने इसे "पुलिस विभाग के भीतर 'म्यूजिकल चेयर' (कुर्सी के खेल) जैसा" बताया, जो नागरिकों की आज़ादी के साथ खिलवाड़ करता है।

चूंकि इन शक्तियों के इस्तेमाल से किसी नागरिक को 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' (एहतियातन हिरासत) में रखा जा सकता है, इसलिए हाईकोर्ट ने जोर दिया कि इस पूरी प्रक्रिया में लोगों का पूरा भरोसा होना चाहिए।

"प्रिवेंटिव डिटेंशन एक 'जरूरी बुराई' है, लेकिन है तो यह एक बुराई ही। हमारा संविधान इसे स्वीकार तो करता है, लेकिन अनुच्छेद 22 के तहत कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय (Procedural Safeguards) भी देता है। लेकिन, चूंकि ये सुरक्षा उपाय पुलिस और सरकार पर कड़ी शर्तें लगाते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन ने एक नया और चालाक तरीका निकाल लिया है। इसके तहत वे अपने अधिकारियों को CrPC की धारा 107 से 110 के तहत शक्तियां दे देते हैं। इस तरह वे खुद ही जांचकर्ता, अभियोजक (Prosecutor) और जज बन जाते हैं और लोगों को जेल भेज देते हैं। इस तरह की प्रक्रिया 'कानून के शासन' (Rule of Law) और निष्पक्ष न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों को महज एक दिखावा बनाकर रख देती है। हमारी राय में यह 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) के उल्लंघन का एक स्पष्ट उदाहरण है। इसमें पुलिस प्रशासन ने अध्याय VIII के तहत न्यायिक शक्तियां खुद ही हथिया ली हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 50 में दिए गए बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है।"

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 'एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' (कार्यकारी मजिस्ट्रेट) किसी व्यक्ति को 'पीस बॉन्ड' (शांति बनाए रखने के मुचलके) के उल्लंघन के लिए सजा नहीं दे सकते। CrPC की धारा 122 के तहत सजा देने की शक्ति केवल 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट' (न्यायिक मजिस्ट्रेट) के पास ही होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का 1990 का फैसला: मुंबई पुलिस अधिकारियों को 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' के रूप में CrPC की धारा 107 के तहत शक्तियां देने वाली अधिसूचना को सही ठहराया गया।

'स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मोहम्मद सलीम खान' मामले में 1990 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुंबई के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर (ACP) - जिन्हें 'कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर' (CrPC) की धारा 21 के तहत 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' के रूप में अधिसूचित किया गया है - वे CrPC की धारा 107 के तहत एक 'एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' की शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

हालांकि, इस मामले में मुद्दा कहीं अधिक तकनीकी और सीमित दायरे का था। सवाल यह था कि क्या जिन अधिकारियों को 'विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट' (Special Executive Magistrates) के रूप में अधिसूचित किया गया है, वे CrPC की धारा 107 के तहत विशेष शक्तियां प्राप्त किए बिना, कार्यकारी मजिस्ट्रेट की हैसियत से निवारक कार्यवाही (preventive proceedings) शुरू कर सकते हैं?

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जो शक्तियां पहले से ही कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को दी गई हैं, उन्हें स्वतः ही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को मिली हुई नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस विचार से असहमति जताई और कहा कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट स्वाभाविक रूप से उन सभी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को दी गईं। इसलिए विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को धारा 107 के तहत शक्तियां देने के लिए किसी अलग अधिसूचना की आवश्यकता नहीं है।

इस मामले में 'शक्तियों के पृथक्करण' (Separation of Powers) और 'पक्षपात की संभावना' (Likelihood of Bias) जैसे मुद्दे विचार के लिए सामने नहीं आए। मद्रास हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को अलग संदर्भ में देखा, क्योंकि तमिलनाडु के पुलिस अधिनियम की व्यवस्था महाराष्ट्र की व्यवस्था से अलग थी।

2018 में दिल्ली हाई कोर्ट की चेतावनी

2018 में 'अलदानिश रेन बनाम दिल्ली राज्य' (Aldanish Rein v. State of NCT of Delhi) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 107 के तहत निवारक कार्यवाही में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेटों (SEMs) के कामकाज की समीक्षा की थी। कोर्ट ने इन शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके पर गंभीर चिंता जताई।

अपने फैसले में जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की बेंच ने टिप्पणी की:

"कोर्ट को इस बात पर संदेह है कि क्या इन शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEMs) संविधान के अनुच्छेद 20, 21 और 22 की आवश्यकताओं के बारे में जानते भी हैं या नहीं। ऐसा लगता है कि उन्हें 'लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट' (Legal Services Authorities Act) की जरूरतों, या 'नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी' (NLSA) और 'दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी' (DSLSA) द्वारा घोषित योजनाओं की भी जानकारी नहीं है। भारतीय संविधान और CrPC के ये सभी प्रावधान—जिन्हें कोर्ट के कई फैसलों और LSAA के तहत स्पष्ट किया गया—ऐसा लगता है कि केवल कागजों तक ही सीमित रह गए।"

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि ज्यादातर मामलों में हिरासत के आदेश बिना सोचे-समझे, पहले से छपे हुए (Cyclostyled) फॉर्मों के जरिए जारी कर दिए जाते हैं और हिरासत में लिए गए लोगों को उचित कानूनी सहायता नहीं दी जाती। यह भी देखा गया कि कई मामलों में जमानत राशि (Surety Amount) बहुत ज्यादा तय कर दी जाती है, जिसके कारण लोगों को और अधिक समय तक हिरासत में रहना पड़ता है।

हाईकोर्ट ने अफ़सोस जताते हुए कहा,

"ऐसा लगता है कि SEMs (स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) इस बात पर गंभीरता से विचार ही नहीं करते कि क्या रिमांड की ज़रूरत है भी या नहीं, और अगर है, तो कितने समय के लिए ज़रूरी है।"

इसके बाद हाईकोर्ट ने कई दिशा-निर्देश जारी किए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि SEMs अपनी हिरासत में लेने की शक्तियों का दुरुपयोग न करें।

क्या इन्हें 'मजिस्ट्रेट' कहा भी जाना चाहिए?

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक कदम और आगे बढ़कर इन अधिकारियों के लिए 'मजिस्ट्रेट' शब्द के इस्तेमाल पर ही सवाल उठाया और सुझाव दिया कि इन्हें 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव ऑफिसर' कहा जाना चाहिए।

"उपराज्यपाल (LG) इन सरकारी अधिकारियों को SEMs के बजाय 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव ऑफिसर' कहने पर विचार कर सकते हैं। 'मजिस्ट्रेट' शब्द से भ्रम हो सकता है कि ये 'ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट' हैं, जबकि SEMs स्पष्ट रूप से ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट नहीं होते। फिलहाल, ये सभी पुलिस अधिकारी हैं जो साथ ही ACP के तौर पर भी काम करते हैं।"

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 'साथी सुंदरेश बनाम राज्य (2007)' मामले में चेतावनी दी थी कि निवारक (Preventive) कार्रवाई को "आसानी से अन्याय और उत्पीड़न का ज़रिया" बनाया जा सकता है, इसलिए इसकी कड़ी न्यायिक जांच होनी चाहिए। जब ​​खुद पुलिस अधिकारी ही इसकी जांच करते हैं, तो उचित कानूनी प्रक्रिया (Due Process) का पालन नहीं हो पाता, जिससे मनमानी तरीके से लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है।

नया BNSS, जिसे कानूनी व्यवस्था से औपनिवेशिक प्रभाव हटाने के लिए लाया गया, वह (धारा 15 के तहत) पुलिस अधीक्षक (SP) या उससे ऊपर के रैंक के पुलिस अधिकारियों को 'स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' के रूप में नियुक्त करने का अधिकार देता है।

'महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद सलीम खान' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ इसे मिलाकर देखें तो यह एक ऐसी कानूनी व्यवस्था बनाता है, जहां पुलिस पर कोई लगाम नहीं होती—यानी एक तरह का 'पुलिस स्टेट'।

इसलिए मद्रास हाईकोर्ट द्वारा उठाई गई संवैधानिक चिंताओं को देखते हुए पुलिस को 'एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट' की शक्तियां देने की इस प्रथा पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है।

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