भारतीय आपराधिक कानून में सबसे ज़्यादा बहस वाले मुद्दों में से एक यह रहा है कि क्या शादी के अंदर बिना सहमति के यौन संबंध बनाना कानूनी कार्रवाई के दायरे में आता है या नहीं। कई संवैधानिक बदलावों के बावजूद, जिनमें अब गरिमा, निजता, शारीरिक अखंडता और निर्णय लेने की आज़ादी को मान्यता दी गई, भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) में अभी भी वैवाहिक बलात्कार से जुड़ी छूट शामिल है। इसलिए बहस मुख्य रूप से दो विकल्पों पर केंद्रित रही है: कानून बनाने वाली संस्था के तौर पर संसद और संवैधानिक रूप से अमान्य करने वाली संस्था के तौर पर उच्च न्यायपालिका।

हालांकि, यह दोतरफा नज़रिया कानूनी ढांचे में पहले से मौजूद व्याख्या की एक महत्वपूर्ण संभावना को नज़रअंदाज़ करता है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 67, जो भारतीय दंड संहिता की पुरानी धारा 376B के बराबर है, एक अलग अपराध तय करती है: जब पत्नी अलग रह रही हो और पति उसकी सहमति के बिना उसके साथ यौन संबंध बनाए। यह प्रावधान तब लागू होता है जब पति-पत्नी अलग-अलग रह रहे हों, "चाहे वे अलग रहने के कानूनी आदेश (डिक्री) के तहत हों या किसी और वजह से।"

अब तक अदालती कार्यवाही मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रही है कि क्या यह एक अलग अपराध है, लेकिन 'अन्यथा' (Otherwise) शब्द के अर्थ पर बहुत कम ध्यान दिया गया। यह लेख बताता है कि संसद का इरादा इस भाषा का इस्तेमाल करके प्रावधान के दायरे को 'न्यायिक अलगाव' (Judicial Separation) की आधिकारिक घोषणाओं से आगे बढ़ाना था। सही इस्तेमाल में 'अन्यथा' शब्द वैवाहिक संबंधों में कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त किसी भी तरह के दखल को शामिल कर सकता है, बिना संसद द्वारा पारित कानून के सीधे अर्थ से भटके हुए। ऐसी दलील कोई नया अपराध नहीं बनाती और न ही वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) से जुड़ी छूट को खत्म करती है। इसके बजाय, यह उन शब्दों को चुनने में विधायिका के इरादे को पूरा करती है, जिनका ठोस स्थितियों में अर्थ निकाला जाता है और जो व्यक्ति की गरिमा, अखंडता और स्वायत्तता जैसे संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं।

मौजूदा कानूनी स्थिति:

BNS की धारा 67 भारतीय आपराधिक कानूनों में विशेष प्रावधान है। यह मानती है कि शादी खत्म होने या पति-पत्नी के साथ न रहने पर भी आपराधिक जिम्मेदारी जरूरी नहीं कि खत्म हो जाए।

धारा 67 में कहा गया:

अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ, जो अलग रह रही है (चाहे अलग रहने के कानूनी आदेश से या किसी और वजह से), उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाता है, तो उसे जेल की सजा दी जाएगी...

यह प्रावधान काफी हद तक भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376B जैसा ही है, जिसे संसद ने पहले अपनाया था। इस लिहाज से यह ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यह दिखाता है कि भारतीय आपराधिक कानून ने कभी भी शादी को यौन संबंध बनाने के लिए हमेशा रहने वाली या न बदली जा सकने वाली सहमति नहीं माना है। बल्कि, संसद ने खुद माना कि कुछ मामलों में पति और पत्नी के बीच सहमति न होने पर यह एक आपराधिक कृत्य हो सकता है।

इस प्रकार धारा 67 केवल निकट भविष्य में लागू होने वाला प्रावधान नहीं है। यह विधायिका की इस समझ को दिखाता है कि हर स्थिति में शादी की संस्था बिना सहमति के यौन संबंध बनाने के खिलाफ पूरी सुरक्षा नहीं देती है। 'अन्यथा' शब्द क्यों महत्वपूर्ण है?

व्याख्या का मुख्य मुद्दा इस वाक्यांश में है:

“अलग रहना, अलग रहने के कानूनी आदेश से या अन्यथा।”

पहली नज़र में यह वाक्यांश वर्णनात्मक लग सकता है। हालांकि, कानूनी क्षेत्र में इसका बहुत महत्व है।

कानून की व्याख्या का एक बुनियादी नियम यह है कि संसद द्वारा बनाए गए हर शब्द की व्याख्या उसके अपने गुण-दोष के आधार पर की जानी चाहिए। अदालतें हमेशा कानून की ऐसी व्याख्या करने से बचती हैं, जिससे वह "बेकार" (Redundant), "अतिरिक्त" (Surplusage) या "निरर्थक" (Otiose) हो जाए। विधायिका द्वारा अपनाए गए किसी भी वाक्यांश के बारे में यह माना जाता है कि उसे जान-बूझकर जोड़ा गया है, और इसलिए उसका कोई स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए।

अगर संसद का इरादा धारा 67 के दायरे को केवल न्यायिक अलगाव (Judicial Separation) तक सीमित रखने का होता, तो वह कह सकती थी: "अलगाव के आदेश (Decree) के तहत"। दूसरी ओर, अगर विधायिका का इरादा इस प्रावधान को केवल शारीरिक अलगाव के मामलों पर लागू करने का होता, तो वह न्यायिक आदेशों (Judicial Decrees) का ज़िक्र ही नहीं करती।

इसलिए "या अन्यथा" (or Otherwise) शब्द का जान-बूझकर इस्तेमाल कोई संयोग नहीं है।

यह शब्द निश्चित रूप से इस प्रावधान के दायरे को न्यायिक अलगाव के आदेशों से आगे बढ़ाता है। सबसे ठोस व्याख्या यह है कि संसद का इरादा इस वाक्यांश के ज़रिए उन सभी स्थितियों को शामिल करना था जिन्हें कानूनी रूप से ऐसी स्थिति के तौर पर मान्यता प्राप्त है, जहां पति-पत्नी कानूनी रूप से अलग-अलग रह सकते हैं।

ये स्थितियां ऐसी हो सकती हैं:

a) घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत सुरक्षा/निवास के आदेश।

b) हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत न्यायिक अलगाव (जुडिशियल सेपरेशन)।

c) विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत आदेश (डिक्री)।

d) लागू व्यक्तिगत कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त पारंपरिक अलगाव।

e) भरण-पोषण की कार्यवाही जो कानून के समर्थन से अलग रहने को मान्यता देती है।

हालांकि, इन सभी स्थितियों में एक बात समान है, जो भौगोलिक दूरी से कहीं अधिक है: यह वैवाहिक साथ रहने में रुकावट की कानूनी मान्यता है। इस प्रकार "अन्यथा" (Otherwise) शब्द का उपयोग कानून द्वारा आधिकारिक तौर पर प्रदान किए गए अलग रहने और औपचारिक न्यायिक अलगाव के बीच एक विधायी कड़ी का काम करता है।

यह कानून की शर्तों से परे अपराध में कोई संशोधन नहीं है। इसके बजाय, यह संसद के हर उस शब्द को अर्थ देता है जिसे जानबूझकर कहा गया, और यह कानूनों की व्याख्या को ऐसे तरीके से सीमित करता है, जो विधायिका के सभी शब्दों के साथ न्याय करता है।

धारा 67 की न्यायिक मान्यता:

धारा 67 (पहले IPC की धारा 376B) पर सीमित मामलों की सुनवाई हुई है; लेकिन जिन मामलों की सुनवाई हुई, उन्होंने पुष्टि की है कि बिना सहमति के यौन संबंध बनाने के लिए मुकदमा चलाने पर शादी कोई पूर्ण बचाव (डिफेंस) नहीं है।

माननीय जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने निमेशभाई भरतभाई देसाई बनाम गुजरात राज्य, 2018 SCC OnLINE Guj 732 मामले में कहा है कि संसद ने जानबूझकर एक अलग अपराध का प्रावधान किया था जब जीवनसाथी अलगाव के किसी आदेश या अन्यथा अलग रह रहा हो। अदालत ने विशेष रूप से "अन्यथा" के अर्थ पर गहराई से विचार नहीं किया, लेकिन यह माना कि शादी कायम रहने से आपराधिक दायित्व नहीं रुकेगा। यह धारा 67 की व्यापक समझ के लिए अच्छी पृष्ठभूमि की जानकारी देता है।

संवैधानिक चर्चा RIT फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2022) मामले में प्रमुख हो गई, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने वैवाहिक बलात्कार अपवाद की वैधता पर बंटा हुआ फैसला दिया है। दोनों फैसलों में, हालांकि वे किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे, सहमति, शरीर की स्वायत्तता, नैतिक जिम्मेदारियों और IPC की धारा 376B की विशेष स्थिति का विस्तार से पता लगाया गया। यह मामला दिखाता है कि धारा 67 एक अनोखा प्रावधान है, और इसे भारतीय आपराधिक कानून व्यवस्था में सिर्फ़ एक साधारण अपवाद नहीं माना जा सकता।

संवैधानिक आधार:

धारा 67 का कोई भी इस्तेमाल संविधान के मूल्यों के अनुसार ही होना चाहिए।

जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी (रिटायर्ड) बनाम भारत संघ (2017) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा, शारीरिक अखंडता और निर्णय लेने की आज़ादी को निजता का हिस्सा माना। इसी तरह सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन (2009) मामले में कोर्ट ने माना कि प्रजनन संबंधी विकल्प अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।

इन सिद्धांतों को सुप्रीम कोर्ट ने जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2019) मामले में और स्पष्ट किया, जिसमें कहा गया कि शादी से व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों और आज़ादी पर कोई असर नहीं पड़ता। इन सभी फैसलों से यह निष्कर्ष निकलता है कि शादी में भी सहमति और शरीर का सम्मान महत्वपूर्ण है।

इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017) मामले का तर्क भी ध्यान देने योग्य है। हालांकि यह मामला बाल विवाह से संबंधित था, सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार के अपवाद की व्याख्या को सीमित किया क्योंकि शादी बिना सहमति के यौन संबंध बनाने के लिए पूरी सुरक्षा नहीं देती (सिवाय नाबालिग पत्नियों के मामले के)। यह फैसला उस दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें कोर्ट आपराधिक कानून और गरिमा व शारीरिक स्वायत्तता के संवैधानिक अधिकारों के बीच तालमेल बिठाना चाहता है।

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने X बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग (2023) मामले में माना कि कुछ स्थितियों में पति अपनी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकता है। हालांकि, ये टिप्पणियां वैवाहिक बलात्कार के अपवाद का खंडन नहीं करतीं, लेकिन ये महिला की शारीरिक अखंडता और अपनी शादी से जुड़े निर्णय लेने की उसकी आज़ादी की पुष्टि करती हैं।

BNSS की धारा 221: एक ज़रूरी सुरक्षा उपाय

धारा 67 का दायरा बढ़ाने पर एक आपत्ति यह है कि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में इस चिंता का समाधान पहले ही कर दिया गया। BNSS की धारा 221 के अनुसार आरोप लगने के अलावा कोई भी अदालत धारा 67 के तहत किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगी। शिकायत पत्नी द्वारा की जानी चाहिए और आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले मजिस्ट्रेट को यह यकीन होना चाहिए कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

यह नियम शुरुआत में ही न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था करता है। 'अन्यथा' (Otherwise) शब्द के व्यापक अर्थ को मानने से अपने आप ही अंधाधुंध मुकदमे नहीं चलेंगे। इसलिए अदालत में इस पर सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता होगी।

यह व्याख्या क्यों महत्वपूर्ण है:

प्रस्तावित व्याख्या यह नहीं कहती कि अदालतों को कोई नया अपराध बनाना चाहिए या वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को अमान्य कर देना चाहिए। बल्कि, यह अदालतों को कानूनी व्याख्या के एक स्थापित सिद्धांत की ओर निर्देशित करती है, जो यह है कि संसद द्वारा पारित हर शब्द का कुछ न कुछ अर्थ होना चाहिए।

'अन्यथा' शब्द का अर्थ कानून के शब्दों को नहीं बदलता है, और न ही अपराधी की जवाबदेही को स्पष्ट रूप से बताए गए दायरे से बाहर बढ़ाता है। इसके बजाय, यह संसद के शब्दों को सार्थक बनाता है और गरिमा, समानता और शारीरिक स्वायत्तता के संवैधानिक सिद्धांतों के साथ सामंजस्य सुनिश्चित करता है।

BNS की धारा 67, IPC की धारा 376B से कहीं अधिक है। यह इस बात का उदाहरण है कि संसद यह मानती है कि शादी होने का मतलब यह नहीं है कि सहमति की ज़रूरत नहीं है। इसलिए, "चाहे अलगाव के आदेश के तहत हो या अन्यथा" शब्दों को अलगाव के सभी कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त तरीकों को शामिल करने के लिए प्राथमिकता के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

ऐसी व्याख्या जो विधायिका के इरादे का सम्मान करती है, कानून के हर शब्द को अर्थ देती है और संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, उसके लिए किसी नए अपराध को बनाने की आवश्यकता नहीं है। धारा 67 शादी में यौन स्वायत्तता के प्रति अधिक सम्मान बनाए रखने का एक कानूनी रूप से सही और संवैधानिक रूप से टिकाऊ तरीका है, जो BNSS की धारा 221 में शामिल प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पूरक है।

लेखक- डॉ. सौम्या खन्ना और सुशांत डबराल है। विचार व्यक्तिगत हैं।

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