किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 में ज़मानत के प्रावधान

Update: 2022-03-01 07:30 GMT

"Juvenile Delinquency" यानि बाल अपराध, मार्टिन न्यूमेयर के अनुसार- किसी अवयस्क का समाजविरोधी व्यवहार जो व्यक्तिगत तथा सामाजिक विघटन उत्पन्न करता है उसे बाल अपराध कहा जा सकता हैं। सामान्य अर्थो में समझा जाये तो एक किशोर [Teenager] द्वारा किया जाने वाला कृत्य, जो कि तत्समय प्रवर्तन किसी विधि के अंतर्गत अपराध है। इसके साथ ही यह एक प्रकार की वैश्विक समस्या भी है, न केवल भारत में अपितु पश्चिमी देश भी इससे त्रस्त है।

UNICEF के जारी किए आंकड़ो के अनुसार 11 से 15 वर्ष के बच्चे सामान्य से अधिक लैंगिक अपराधों में संलिप्त है और महज 14 से 16 वर्षीय बालक आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाली गैंग से जुड़ जाते है। वर्ष दर वर्ष इनमें केवल बढ़ोतरी होती जाती है, क्यों 20 वर्ष तक कि उम्र में आते आते ऐसे व्यक्ति आदतन अपराधी बन चुके होते है। जो कि मानव सभ्यता के उन्नत विकास के लिये एक मुख्य बाधा है, क्योंकि एक किशोर द्वारा किये अपराध से न केवल वह स्वयं बल्कि उसके परिवारजनों को और समस्त मनुष्य समाज को विभिन्न परिणामों का सामना करना पड़ता है।

कहना तो यह भी उचित होगा कि बाल अपराधी मुख्यतः मामलों वे किशोर है, जो स्वयं कभी सामाजिक व पारिवारिक वेदना से पीड़ित [victim] रह चुके है।

इसके मुख्य कारण निम्नलिखित है-

1. सामाजिक – आर्थिक समस्याएं

2. मनोवैज्ञानिक समस्याएं

3. दूषित पारिवारिक वातावरण

4. बालक/बालिकाओं का शारीरिक शोषण

इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण वर्ष-2020 में आयी फ़िल्म "Dhuusar" है, जो कि सन-1997, कलकत्ता में घटित मशहूर बारुई दम्पति हत्याकाण्ड पर आधारित है। इस मामले में सजल बारुई नामक 16 वर्षीय किशोर ने अपने ही माता पिता की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी थी। इस फ़िल्म के माध्यम से निर्देशक ने वास्तविक घटना को चित्रपट पर दर्शा कर अहम भूमिका निभाते हुए पूर्ण प्रयास किया है कि, क्यों तथा किन सामाजिक परिस्थितियों के कारण नाबालिग़ों द्वारा अपराध को अंजाम दिया जाता है और उनके अद्दतन अपराधी बनने की पृष्ठभूमि क्या रहती है।

ऐसी स्थिति को यदि देखा जाए तो यह समाज के लिए एक गंभीर विचारणीय मुद्दा है। ऐसी ही परिणामों को मद्देनजर रखते हुए है और इनसे निपटने के आशय से किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000[ JJ ACT] को अधिनियमित किया गया तथा वर्ष 2012 में घटित निर्भया मामले [Delhi gang rape] के पश्चात वर्ष 2015 के संशोधन द्वारा इसमें और कठोर प्रावधान जोड़े गए तथा अब वर्ष 2021 में इसे सरकार द्वारा पुनः संशोधित किया गया है।

इसके पीछे मुख्य कारण अधिनियम में उपस्थित ऐसी कमियों[ lacunas] को दूर करना था, जिसके कारण कई बाल अपराधी उन लोप का लाभ उठाते हुए न्याय की परिधि से छूट जाते थे, परन्तु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि यह विधि मात्र किशोर अपराधियों को दंडित करने चाहती है अपितु ये उनके सामाजिक, शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक विकास को भी प्रोहत्सं प्रदान करती है। ऐसे कई प्रावधान है।

इस विधि में जो इस उद्देश की पूर्ति करते है और बच्चों को सुधार सेवाएं प्रदान कर उन्होंने समाज की मुख्य धारा की हिस्सा बनाना चाहते। सर्वप्रथम ये देखना होगा कि इस विधि अनुसार बालक कौन है?

• इस अधिनियम की धारा 2(12) के अनुसार- बालक से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी नही की है और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 82 के अनुसार- कोई बात अपराध नही है, जो 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया हो।

अतः स्पष्ट है यदि कोई बालक जो 7 वर्ष से अधिक और 18 वर्ष से कम आयु का है, उसके संबंध में प्रक्रिया जेजे एक्ट ,2015 वाली अपनाई जाएगी। इसकी प्रक्रिया जटिल नही होकर सामान्य है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य बालकों के विकास,उपचार, समाज मे पुनः मिलाने के मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना है और द्वितीयक रूप से आदतन, जघन्य एवं घोर अपराधों के अभियुक्त बालकों की गतिविधियों पर अंकुश लगाना भी शामिल है।

शायद यही कारण है, विधायिका ने इसके जमानत संबंधित प्रावधान में कठोरता और उदारवादिता दोनों ही दृष्टिकोणों को अपनाते हुए इसे भिन्न रूप से उपबंधित किया है, जो की धारा-12 अनुसार इस प्रकार है-

(1) जब किसी जमानती या गैर-जमानती अपराध का आरोपी और जाहिर तौर पर एक किशोर, गिरफ्तार किया जाता है या हिरासत में लिया जाता है या बोर्ड के सामने पेश किया जाता है या पेश किया जाता है तो ऐसा व्यक्ति, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में किसी भी बात के होते हुए भी ( 2) 1974) या उस समय लागू किसी अन्य कानून में, जमानत के साथ या बिना जमानत पर रिहा किया जा सकता है [या एक परिवीक्षा अधिकारी की देखरेख में या फिट व्यक्ति की किसी भी उपयुक्त संस्था की देखरेख में रखा गया।

वह इसलिए रिहा नहीं किया जाना चाहिए, अगर यह मानने के लिए उचित आधार दिखाई देते हैं कि रिहाई से उसे किसी ज्ञात अपराधी के साथ जुड़ने की संभावना है या उसे नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरे में डाल दिया जाएगा या उसकी रिहाई न्याय के उद्देश्य को पराजित कर देगी।

(2) जब गिरफ्तार किए गए ऐसे व्यक्ति को थाने के प्रभारी अधिकारी द्वारा उपधारा (1) के तहत जमानत पर रिहा नहीं किया जाता है तो ऐसा अधिकारी उसे निर्धारित तरीके से केवल एक अवलोकन गृह में ही रखेगा जब तक कि वह कर सकता है बोर्ड के समक्ष लाया जाए।

(3) जब ऐसे व्यक्ति को बोर्ड द्वारा उपधारा (1) के तहत जमानत पर रिहा नहीं किया जाता है, तो वह उसे जेल में डालने के बजाय, उसे एक अवलोकन गृह या सुरक्षित स्थान पर ऐसी अवधि के लिए भेजने का आदेश देगा। उसके संबंध में जांच लंबित है जैसा कि आदेश में निर्दिष्ट किया जा सकता है।

उपधारा(1) का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया जाए तो यह स्पष्ट करता है कि अपराध चाहे किसी भी श्रेणी का हो, किशोर न्याय बोर्ड या पुलिस द्वारा उसे छोड़ दिया [Shall ]जाएगा, लेकिन इसी उपधारा का परन्तुक एक विशेष बात पर जोर देता है, निम्न दशाओं में विधि के उलघन करने वाले बालक को नही छोड़ा जाएगा [he Shall not be released]-

1. बालक किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आएगा या,

2. वह नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरे में पड़ सकता है या,

3. उसकी रिहाई न्याय को विफ़ल कर सकती है।

सामान्य तौर पर यदि देखा जाए तो यह किशोर अभियुक्त की जमानत खारिज/इनकार किये जाने के आधार है, जिसे स्वयं विधायिका ने युक्तियुक्त प्रक्रिया का भाग बनाया है।

इसी आशय की व्याख्या करते हुए माननीय न्यायालय ने विक्की उर्फ विक्रम सिंह बनाम यूपी और अन्य राज्य, मामले में तय किया कि यदि अपराध जघन्य प्रकृति का है, मात्र इस आधार पर किशोर के जमानत आवेदन खारिज नही किया जा सकता। क्योंकि ऐसे मामलों में जमानत देना आज्ञापक [Mandatory] है। उपधारा में प्रयुक्ति "Shall" अभिव्यक्ति[expression] से यह स्पष्ट होता है तथा जमानत पर विचार करते समय अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता नही देखी जाएगी।"

अभी हाल ही में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अयान अली बनाम उत्तराखंड राज्य,2022 मामले में न्याय पीठ ने विधि का उलघन करने वाले बालक के जमानत के सम्बंध में सूक्ष्म विवेचना करते हुए कहा की "एक किशोर के संबंध में जमानती या गैर-जमानती अपराध के बीच का अंतर समाप्त कर दिया गया है।

जमानत से इनकार किया जा सकता है यदि यह मानने के लिए उचित आधार है कि छोड़े पर ऐसा किशोर किसी 'ज्ञात अपराधी' के संपर्क में आ सकता है या अन्य दो आधारो के संबंध में पेश किए साक्ष्यों से साबित हो जाता हैं तो बालक को जमानत पर नही छोड़ा जाएगा और यदि विचरण न्यायालय केवल अपराध की प्रकृति या गंभीरता देख कर जमानत रद्द कर देता है तो किशोर व्यक्ति धारा-102 JJACT,2015 के अधीन पुनरीक्षण [Revision] हेतु आवेदन फ़ाइल कर सकता है।"

इसका अर्थ यह भी नही है कि, ज़मानत पर सुनते समय न्यायालय केवल एक उपकरण की तरह कार्य करेगा। उसके पास शक्ति है कि वह जमानत पर सुनते समय अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत परिवीक्षा अधिकारी द्वारा तैयार की सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट [social investigation report] को मंगवा कर अवलोकन कर सकता है और उसी के अनुसरण में अपनी राय बनाएगा साथ ही धारा12(1)परंतुक में वर्णित उन 3 आधारों को भी मस्तिष्क में रखेगा। दोनो के सम्मिलित प्रभाव से अपना आदेश देगा।

निष्कर्ष:-

अधिनियम के अधीन की जाने वाली हर कार्यवाही का परीक्षण धारा 3 में उपबंधित मूल सिद्धांतों के अनुरूप किया जाएगा और किशोर[juvenile] की निर्दोषिता की उपधारणा की जाएगी तथा पूर्ण ध्यान दिया जाएगा कि अनावश्यक ही बालको को विधि प्रक्रिया से उत्पीड़ित न किया जाए और न ही उनका विचारण वयस्कों के भांति किया जाएगा। सिद्धांतों के इसके अनुसार ही किशोर के शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा, ताकि प्रत्येक बच्चे के लिए सुरक्षा एवं कल्याण सुनिश्चित किया जा सके।

इसीलिए अधिनियम में कही भी अभियुक्त बालक शब्द का प्रयोग नही किया गया है बल्कि विधि का उलंघन करने वाला बालक, प्रयुक्त किया गया है। इसके पीछे की समस्या यह है कि, यदि बालकों को सुधारात्मक परिवेश नही प्रदान किया तो उनका जीवन अराजगता में विलुप्त हो जाएगा और इसके परिणाम राष्ट्र एवं समाज हेतु हानिकारक होंगे। अवश्य ही इसी संकल्पना को पूर्ण करने हेतु विधायिका ने जमानत संबंधी प्रकिया को लचीला बनाया है। क्योंकि बेल नियम है और जेल अपवाद।

इस आलेख में लेख के विचार उनके निजी विचार हैं।

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