रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता देने के फैसले पर रोक से इनकार: कलकत्ता हाईकोर्ट ने मांगे जवाब

Update: 2026-06-18 06:56 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी तृणमूल कांग्रेस विधायक रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता देने के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया। यह याचिका तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने दायर की थी, जिन्होंने दावा किया कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा उन्हें विपक्ष का नेता चुने जाने के बावजूद अध्यक्ष ने उस निर्णय को नजरअंदाज किया।

जस्टिस कृष्णा राव ने मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए सभी पक्षों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष की निर्णय प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि जब तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व की ओर से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाए जाने का प्रस्ताव पहले ही भेजा गया तो उसे लंबित रखते हुए बाद में बागी विधायकों के प्रस्ताव को कुछ ही दिनों में कैसे स्वीकार कर लिया गया।

अदालत ने कहा कि मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि पहले प्रस्ताव से जुड़े कथित जालसाजी के आरोप सही हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या अध्यक्ष सभी संबंधित पक्षों को सुने बिना एक प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दूसरे को स्वीकार कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने पूछा,

“ऐसा क्या है, जिसने अध्यक्ष को एक प्रस्ताव को नजरअंदाज कर दूसरे को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया?”

मामले के अनुसार तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने विधानसभा स्पीकर को सूचित किया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को सर्वसम्मति से विपक्ष का नेता चुना गया। स्पीकर ने इस संबंध में अतिरिक्त दस्तावेज और बैठक की कार्यवाही मांगी थी।

इसी बीच, पार्टी के बागी विधायकों के एक समूह ने दावा किया कि उन्हें विधायक दल के बहुमत का समर्थन प्राप्त है और उन्होंने रितब्रत बनर्जी के नाम का प्रस्ताव दिया। स्पीकर ने इस दावे को स्वीकार करते हुए रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता दे दी।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्पीकर ने राजनीतिक दल के फैसले को दरकिनार कर केवल विधायक दल के एक गुट की संख्या के आधार पर निर्णय लिया, जो संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है।

राज्य और विधानसभा स्पीकर की ओर से अदालत को बताया गया कि यह एक असाधारण स्थिति थी, जहां विपक्ष के नेता के पद पर दो अलग-अलग दावे सामने आए। स्पीकर ने विपक्षी दल के भीतर किस व्यक्ति को अधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त है, इसका आकलन किया और उसी आधार पर निर्णय लिया।

स्पीकर की ओर से कहा गया कि 80 में से 58 विधायकों ने रितब्रत बनर्जी का समर्थन किया और व्यक्तिगत रूप से अध्यक्ष के समक्ष उपस्थित होकर अपना समर्थन जताया। इसलिए विधायक दल के बहुमत को आधार बनाकर फैसला लिया गया।

वहीं, रितब्रत बनर्जी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने तर्क दिया कि विपक्ष के नेता का पद सदन की कार्यवाही से जुड़ा हुआ है और स्पीकर को यह देखने का अधिकार है कि किसे विपक्षी विधायकों का बहुमत समर्थन प्राप्त है।

दूसरी ओर, शोभनदेव चट्टोपाध्याय की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कल्याण बंद्योपाध्याय ने कहा कि विपक्ष का नेता तय करने का अधिकार राजनीतिक दल का है, न कि विधायक दल के किसी गुट का। उन्होंने दलील दी कि यदि विधायकों का कोई समूह पार्टी नेतृत्व के निर्णय के विपरीत जाकर विपक्ष का नेता चुनने लगे, तो इससे दलगत अनुशासन और संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होगी।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब रितब्रत बनर्जी को पार्टी से निष्कासित किए जाने की जानकारी अध्यक्ष को दी जा चुकी थी, तब उन्हें विपक्ष का नेता कैसे नियुक्त किया जा सकता है।

फिलहाल हाईकोर्ट ने अध्यक्ष के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन मामले की वैधता पर अंतिम निर्णय बाद की सुनवाई में किया जाएगा।

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