मुस्लिम रीति से शादी करने वाली हिंदू महिला को अंतरिम भरण-पोषण का अधिकार: कलकत्ता हाईकोर्ट

Update: 2026-05-20 08:19 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि कोई हिंदू महिला इस्लाम धर्म अपनाकर मुस्लिम रीति-रिवाज से विवाह करती है तो केवल विवाह की वैधता पर सवाल उठाकर मुस्लिम पति भरण-पोषण देने से बच नहीं सकता। अदालत ने कहा कि जब तक सक्षम अदालत विवाह को शून्य घोषित नहीं करती, तब तक पत्नी और बच्चे को अंतरिम भरण-पोषण पाने का अधिकार रहेगा।

जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने महिला और उसके नाबालिग बेटे के पक्ष में पारित अंतरिम भरण-पोषण आदेश बहाल करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया विवाह और बच्चे के पितृत्व के प्रमाण होने के बावजूद उन्हें भरण-पोषण से वंचित करना घोर अवैधता होगी।

अदालत ने कहा,

“विवादित पक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का फैसला साक्ष्यों और दीवानी मुकदमे के परिणाम के आधार पर होगा लेकिन उससे पहले महिला और नाबालिग बच्चे को भरण-पोषण से वंचित करना कानून और सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है।”

मामले में याचिकाकर्ता बनश्री हाजरा उर्फ बनश्री हाजरा मोल्ला ने दावा किया कि उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद वर्ष 2016 में आसनसोल में मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार पुलिस उपनिरीक्षक से विवाह किया था। विवाह का पंजीकरण मुस्लिम विवाह रजिस्ट्रार और काजी के समक्ष कराया गया।

इस विवाह से जनवरी 2017 में एक पुत्र का जन्म हुआ। महिला का आरोप था कि बाद में पति ने उसके साथ क्रूरता की, धमकियां दीं और फरवरी 2018 में उसे तथा बच्चे को छोड़ दिया। इसके बाद उसने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए याचिका दायर की।

आसनसोल की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने मार्च 2023 में महिला को 5 हजार रुपये प्रतिमाह और बच्चे को 4 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

हालांकि, बाद में एडिशनल सेशन जज ने यह कहते हुए आदेश रद्द किया कि पति ने विवाह और बच्चे के पितृत्व दोनों को चुनौती दी। अदालत ने यह भी कहा था कि महिला अब भी अपना हिंदू नाम इस्तेमाल कर रही है, जिससे धर्म परिवर्तन और विवाह की वैधता संदिग्ध लगती है।

इसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण अदालत ने अंतरिम चरण में ही मामले को अंतिम रूप से तय मान लिया, जो गलत था। अदालत ने पाया कि महिला ने विवाह प्रमाणपत्र, दोनों पक्षों की तस्वीरें और हस्ताक्षर सहित दस्तावेज पेश किए। साथ ही बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में भी प्रतिवादी को पिता बताया गया।

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत दर्ज मामले में पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र में विवाह को लेकर कोई विवाद सामने नहीं आया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हनफी मुस्लिम कानून के तहत मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला का विवाह अनियमित माना जाता है, शून्य नहीं। ऐसा विवाह तब तक प्रभावी रहता है, जब तक सक्षम अदालत उसे निरस्त घोषित न कर दे।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल महिला द्वारा अपने पुराने हिंदू नाम का इस्तेमाल जारी रखना अंतरिम भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।

फैसले में कहा गया,

“पुनरीक्षण अदालत ने न्यायिक विवेक का सही इस्तेमाल नहीं किया और तकनीकी आधारों पर ऐसा आदेश पारित किया, जिससे महिलाओं और बच्चों के सामाजिक न्याय के उद्देश्य को ही नुकसान पहुंचता है।”

अंत में हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण अदालत का आदेश रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा दिया गया अंतरिम भरण-पोषण आदेश बहाल कर दिया। साथ ही प्रतिवादी को नियमित भुगतान जारी रखने और ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी करने का निर्देश दिया।

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