कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में अभियोजन शिकायत दाखिल किए जाने के बाद भी प्रवर्तन निदेशालय (ED) आगे की जांच कर सकता है। इसके लिए ट्रायल कोर्ट की पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है, बशर्ते मुकदमा अभी शुरू न हुआ हो।

जस्टिस कृष्ण राव ने महेश कुमार केजरीवाल की ओर से दायर याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिका में केजरीवाल और उनकी पत्नी को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 50 के तहत प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने ईडी को आगे की जांच करने से रोकने की मांग की थी।

मामले की शुरुआत 2013 में CBI द्वारा दर्ज FIR से हुई। इसमें केजरीवाल, उनकी पत्नी और बेटे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 120बी, 420 और 471 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत कथित अपराधों के आरोप लगाए गए। CBI द्वारा आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद ED ने 2020 में इस मामले को मूल अपराध मानते हुए धन शोधन का मामला दर्ज किया।

बाद में ED ने विशेष अदालत के समक्ष अभियोजन शिकायत दाखिल की। कार्यवाही लंबित रहने के दौरान ED ने 27 अगस्त 2026 को केजरीवाल की पत्नी को और 2 सितंबर 2026 को केजरीवाल को धारा 50 के तहत नोटिस जारी किया। दोनों को पेश होकर दस्तावेज और साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए कहा गया।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अयान भट्टाचार्य ने दलील दी कि अभियोजन शिकायत दाखिल होने के बाद नोटिस जारी करना जांच को दोबारा शुरू करने के समान है। उनका कहना था कि मामला विशेष अदालत में लंबित होने के कारण आगे की जांच शुरू करने से पहले ED को ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेनी चाहिए थी।

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रमोद कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले और भूपेश कुमार बघेल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए आदेश पर भरोसा किया गया।

ED की ओर से वकील अरिजीत चक्रवर्ती ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि PMLA की धारा 44 में आगे की जांच के लिए अदालत से पूर्व अनुमति लेने की कोई शर्त नहीं है। उन्होंने धारा 71 का भी हवाला दिया जो इस कानून को अन्य कानूनों पर प्रभावी बनाती है।

ED ने कलकत्ता हाईकोर्ट के पहले के फैसले प्रवर्तन निदेशालय बनाम देबब्रत हलदर का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि आगे की जांच के लिए जांच एजेंसी को अदालत से अनुमति लेना जरूरी नहीं है।

हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193 के प्रावधान पर भी विचार किया। इसमें मुकदमे के दौरान आगे की जांच के लिए संबंधित अदालत की अनुमति की आवश्यकता बताई गई।

हालांकि जस्टिस कृष्ण राव ने कहा कि मौजूदा मामले में अभी आरोप तय नहीं हुए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय होने के बाद ही ट्रायल शुरू माना जाता है।

कोर्ट ने कहा,

“यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि ट्रायल आरोप तय होने के बाद शुरू होता है, उससे पहले नहीं।”

अदालत ने बताया कि विशेष अदालत ने 29 अगस्त 2026 को याचिकाकर्ता की आरोपमुक्ति की अर्जी खारिज की थी। इसके बाद मामला आरोप तय करने पर विचार के लिए सूचीबद्ध है। इसलिए मौजूदा मामले में ट्रायल अभी शुरू नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने PMLA की धारा 44(1) के स्पष्टीकरण (ii) पर भी विचार किया। इसमें यह प्रावधान है कि आगे की जांच के दौरान सामने आए अतिरिक्त साक्ष्यों के संबंध में बाद में दाखिल की गई शिकायत को उसी अपराध के संबंध में पहले दाखिल शिकायत का हिस्सा माना जाएगा।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आगे की जांच अधिकृत जांच एजेंसी की वैधानिक और जारी रहने वाली शक्ति है।

हाईकोर्ट ने भूपेश कुमार बघेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भी गौर किया, जिसमें ट्रायल के दौरान अतिरिक्त साक्ष्य रिकॉर्ड पर लाने के लिए अदालत की पूर्व अनुमति की आवश्यकता को स्वीकार किया गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले को प्रमोद कुमार के फैसले से अलग माना। कोर्ट ने कहा कि उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 173(8) की व्याख्या की थी, जबकि मौजूदा मामले में PMLA की धारा 44 की विशेष व्यवस्था लागू होती है।

अदालत ने देबब्रत हलदर मामले के पहले के फैसले पर भी गौर किया और कहा कि उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की थी।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि ED द्वारा याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी को जारी किए गए नोटिस के आधार पर आगे की जांच में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

“उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए इस अदालत को याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर प्रवर्तन निदेशालय द्वारा शुरू की गई आगे की जांच में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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