कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न मामले में विवाहित ननद और उसके पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करते हुए कहा कि एक ही शहर में अलग-अलग रहना घरेलू निकटता नहीं माना जा सकता।

जस्टिस उदय कुमार ने कहा कि वर्षों से अलग रह रहे रिश्तेदारों को सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर मामले में घसीटना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों को उत्पीड़न का हथियार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की,

“महानगर में भौगोलिक निकटता को घरेलू एकीकरण के बराबर नहीं माना जा सकता।”

मामला मोनिजा फारुकी और उनके पति शारिक हुसैन की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था। दोनों ने उस FIR को चुनौती दी थी, जो मोनिजा के भाई की पत्नी ने दहेज उत्पीड़न के आरोप में दर्ज कराई।

शिकायतकर्ता के अनुसार उसकी शादी अक्टूबर 2022 में हुई और दो महीने बाद ही पति के व्यवसाय के लिए तीन लाख रुपये की मांग को लेकर विवाद शुरू हो गया। वह अप्रैल 2023 में ससुराल छोड़कर चली गई और अक्टूबर 2023 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए, 406, 34 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत FIR दर्ज कराई।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे वर्ष 2014 से तांगरा इलाके में अलग रह रहे हैं, जो शिकायतकर्ता की शादी से करीब आठ वर्ष पहले की बात है। उनका कहना था कि वैवाहिक विवाद से उनका कोई संबंध नहीं है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह अस्पष्ट हैं।

अदालत ने पाया कि FIR और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में केवल इतना कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने पति को शिकायतकर्ता को प्रताड़ित करने के लिए उकसाया। लेकिन किसी घटना, तारीख या विशेष कृत्य का उल्लेख नहीं किया गया।

हाईकोर्ट ने प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य और गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अलग रहने वाले रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी है।

अदालत ने यह आरोप भी अविश्वसनीय माना कि याचिकाकर्ता लगभग हर दिन वैवाहिक घर जाकर हस्तक्षेप करते थे। अदालत ने कहा कि शारिक हुसैन निजी कंपनी में वरिष्ठ सहयोगी के पद पर कार्यरत हैं और उनका अपना पारिवारिक जीवन तथा दो छोटे बच्चे हैं।

अदालत ने कहा,

“हर दिन हस्तक्षेप करने का आरोप न केवल साक्ष्य के लिहाज से कमजोर है, बल्कि तार्किक रूप से भी असंभव प्रतीत होता है।”

धारा 406 के तहत स्त्रीधन से जुड़े आरोपों पर अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं बताया था कि उसके सारे आभूषण ससुर के पास रखे गए। याचिकाकर्ताओं के घर से कोई बरामदगी भी नहीं हुई।

अदालत ने कहा,

“जिस वस्तु का कभी कब्जा ही नहीं रहा, उसका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं और पति के बीच किसी प्रकार की साझा आपराधिक मंशा थी।

अदालत ने FIR दर्ज कराने में छह महीने की देरी पर भी सवाल उठाया और इसे आरोपियों का दायरा बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया कानूनी मंथन बताया।

हरियाणा राज्य बनाम भजनलाल और कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने ननद और उसके पति के खिलाफ आरोपपत्र और आपराधिक कार्यवाही रद्द की। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि पति और सास-ससुर के खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा और ट्रायल अदालत इस आदेश की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना सुनवाई करेगी।

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