कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के अलग रहने के बाद कुछ मौकों पर दोबारा साथ रहना अपने आप में वैवाहिक क्रूरता को माफ करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। खासकर तब जब बाद में संबंधित पक्ष का क्रूर व्यवहार फिर दोहराया गया हो।

जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने पति को मानसिक क्रूरता के आधार पर दी गई तलाक की डिक्री को बरकरार रखते हुए पत्नी की अपील खारिज की।

मामले में दोनों का विवाह वर्ष 2009 में हुआ था और वे करीब पांच वर्ष तक साथ रहे। दिसंबर 2014 से दोनों अलग रहने लगे। हालांकि, इसके बाद भी कुछ मौकों पर दोनों करीब सात-आठ दिनों तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहे।

पत्नी ने इसी तथ्य को आधार बनाते हुए दलील दी कि पति ने खुद स्वीकार किया कि अलग रहने के बाद भी वह कई बार वापस आई और दोनों ने साथ रहकर वैवाहिक जीवन बिताया। उनके अनुसार इससे यह साबित होता है कि पति ने वैवाहिक संबंध जारी रखने की इच्छा दिखाई और कथित क्रूरता को माफ किया।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि अलगाव के बाद कभी-कभार कुछ दिनों के लिए साथ रहने या शारीरिक संबंध बनाने को लंबे समय तक सामान्य वैवाहिक जीवन की बहाली नहीं माना जा सकता।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. एन.जी. दस्ताने बनाम श्रीमती एस. दस्ताने मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि वैवाहिक क्रूरता की माफी सशर्त होती है। इसके लिए केवल माफी ही नहीं, बल्कि दूसरे पक्ष को फिर से वैवाहिक स्थिति में स्वीकार करना भी आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा,

“कभी-कभार पति-पत्नी की तरह साथ रहना क्रूरता की माफी नहीं माना जा सकता। क्रूरता को माफ करना इस शर्त के अधीन होता है कि ऐसे या अन्य क्रूर कृत्य दोबारा नहीं किए जाएं।”

पीठ ने कहा कि अलगाव के बाद हुई कुछ घटनाओं को कई अलग-अलग परिस्थितियों से समझाया जा सकता है। इसलिए केवल शारीरिक संबंध या कुछ दिनों तक साथ रहने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पति ने पत्नी के व्यवहार को पूरी तरह माफ कर दिया और उसे फिर से वैवाहिक जीवन में स्वीकार कर लिया।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों के बीच दिसंबर 2014 से लगातार लंबा अलगाव रहा। यानी विवाह के बाद दोनों के बीच 11 वर्ष से अधिक समय तक वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से नहीं चल सका। अदालत की ओर से कराई गई सुलह की कोशिश भी सफल नहीं हुई।

पीठ ने इन परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि वैवाहिक संबंध इस हद तक टूट चुका है कि उसे बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए पीड़ा और क्रूरता को ही आगे बढ़ाएगा।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अलगाव के बाद कभी-कभार साथ रहने की घटनाओं से बाद में हुए क्रूर व्यवहार समाप्त नहीं हो जाते। परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए पत्नी का आचरण मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने कलकत्ता फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दी गई तलाक की डिक्री बरकरार रखी और पत्नी की अपील खारिज की।

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