बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 25 के तहत अपने धर्म का पालन करने का अधिकार कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक व्यवस्था और आबादी के दूसरे वर्गों की ज़रूरतों के अधीन है, खासकर तब जब किसी खास तरीके से इस अधिकार का इस्तेमाल करने से उन पर बुरा असर पड़ता हो। कोर्ट ने कहा कि अपने धर्म का पालन करने का अधिकार एक बात है और उसे किसी खास तरीके से करना दूसरी बात।

जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस रजनीश आर. व्यास की डिवीज़न बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस के 1 अगस्त, 2026 के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई, जिसमें कांवड़ यात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने लगभग 3.5 किलोमीटर लंबे जुलूस की अनुमति मांगी थी, जिसके दौरान जलाभिषेक के लिए महादेव घाट से लाया गया पवित्र जल कांवड़ में ले जाया जाना था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बिना किसी नोटिस या सुनवाई के अनुमति देने से इनकार कर दिया गया और कहा कि हर धार्मिक समूह को किसी भी सड़क से धार्मिक जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार है। यह भी तर्क दिया गया कि दूसरे धार्मिक समूहों के पूजा स्थलों की मौजूदगी अनुमति न देने का आधार नहीं हो सकती। दूसरी ओर, राज्य ने कहा कि जुलूस निकालने की अनुमति पूरी तरह से अस्वीकार नहीं की गई, बल्कि केवल याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए खास रास्ते की अनुमति नहीं दी गई।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कांवड़ यात्रा निकालने की अनुमति से इनकार करने का तर्क गलतफहमी पर आधारित था। याचिकाकर्ता को जुलूस निकालने की अनुमति दी गई, लेकिन उसके सुझाए गए रास्ते पर नहीं, बल्कि पुलिस प्रशासन द्वारा सुझाए गए रास्ते पर। इसलिए यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें धर्म का पालन करने या उसके किसी खास हिस्से पर रोक लगाई गई हो।

कोर्ट ने उन विभिन्न कारणों से सहमति जताई, जैसे कि उसी रास्ते पर पहले हुई घटनाएं जिनसे कानून-व्यवस्था की समस्याएं पैदा हुईं, और कहा कि वैकल्पिक रास्ता सुझाने में पुलिस की ओर से कोई गलती नहीं थी।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कांवड़ यात्रा का हिस्सा रहा मंदिर एक निजी संपत्ति है। यह किसी ट्रस्ट या सरकार की संपत्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को उस मंदिर के मालिक से शिकायतें मिली थीं। याचिकाकर्ता किसी प्राइवेट व्यक्ति को कांवड़ यात्रा के लिए ऐसे प्राइवेट मंदिर में उसे शामिल करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

इस मामले के खास हालात में आर्टिकल 25 के तहत मिलने वाले अधिकार का दायरा स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:

“भारत के संविधान के आर्टिकल 25 के तहत अपने धर्म का पालन करने का अधिकार निश्चित रूप से कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक व्यवस्था और आबादी के दूसरे वर्गों की ज़रूरतों के बड़े हित के अधीन है, जिन पर बुरा असर पड़ सकता है, अगर किसी खास तरीके से इस अधिकार का इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया जाए और उसकी इजाज़त दी जाए।

कोर्ट ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति को किसी खास रास्ते से जुलूस निकालने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

“अगर हालात, भौतिक और भौगोलिक स्थितियों और दूसरे समुदायों के लोगों की राय का आकलन करने के बाद प्रतिवादियों ने यह फ़ैसला किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाए गए नए रास्ते से जुलूस निकालने की इजाज़त नहीं दी जा सकती तो याचिकाकर्ताओं को उस खास रास्ते से जुलूस निकालने का कोई अधिकार नहीं है।”

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को उसके सुझाए रास्ते से जुलूस निकालने की इजाज़त न देने और वैकल्पिक रास्ता सुझाने में कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी। इसलिए कोर्ट ने रिट अधिकार क्षेत्र में दखल देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज की।

Case Title: Deepak S/o Devidas Nechwani v. State of Maharashtra [Writ Petition No. 6151 of 2026]

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: