साहयोग पोर्टल और आईटी नियमों के 2025 संशोधन को लेकर बॉम्बे हाइकोर्ट में चुनौती

Update: 2026-02-06 07:44 GMT

प्रसिद्ध स्टैंड-अप कॉमेडियन और व्यंग्यकार कुणाल कामरा ने सोशल मीडिया कंटेंट को ब्लॉक करने से जुड़े साहयोग पोर्टल और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में किए गए 2025 के संशोधन को बॉम्बे हाइकोर्ट में चुनौती दी।

कामरा ने आईटी नियम 2021 के नियम 3(1)(d) में किए गए बदलाव को असंवैधानिक बताते हुए कहा है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालता है।

कामरा की याचिका में दलील दी गई कि साहयोग पोर्टल के ज़रिये कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने की जो व्यवस्था बनाई गई, वह IT Act की धारा 69A में तय कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार करती है।

याचिका के मुताबिक इस पोर्टल के तहत बिना यूज़र को पूर्व सूचना दिए सोशल मीडिया कंटेंट को ब्लॉक किया जा सकता है जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन है।

याचिका में यह भी कहा गया कि नियम 3(1)(d) और साहयोग पोर्टल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के विपरीत हैं। उस फैसले में ऑनलाइन कंटेंट पर रोक लगाने के लिए सख्त प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों पर ज़ोर दिया गया।

कामरा का कहना है कि सरकार ने अब एक समानांतर कंटेंट-ब्लॉकिंग व्यवस्था बना दी है जिसमें न तो पारदर्शिता है और न ही कानूनी संरक्षण।

कामरा ने यह भी तर्क दिया कि IT Act की धारा 79 केवल मध्यस्थों को छूट देने से जुड़ी है और उसी के आधार पर कंटेंट ब्लॉक करने की शक्ति नहीं दी जा सकती।

इसके अलावा, याचिका में कहा गया कि सूचना ब्लॉक करने की शक्ति केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसे राज्य सरकारों या विभागों को सौंपा नहीं जा सकता, क्योंकि यह संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुरूप नहीं है।

इसी मुद्दे पर बॉम्बे हाइकोर्ट में एक अलग याचिका सीनियर एडवोकेट हरेश जगतियानी ने भी दायर की, जिसमें साहयोग पोर्टल और संशोधित नियम 3(1)(d) को चुनौती दी गई।

उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट नवरोज़ सीरवई पैरवी कर रहे हैं।

कुणाल कामरा की ओर से वकील आरती राघवन पेश हो रही हैं। दोनों मामलों में अधिवक्ता मीनाज़ काकालिया रिकॉर्ड पर हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले कर्नाटक हाइकोर्ट ने 'एक्स कॉर्प' की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि साहयोग पोर्टल सेंसरशिप का साधन नहीं है बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के बीच सहयोग का माध्यम है।

हालांकि कामरा और जगतियानी की याचिकाओं में इस निष्कर्ष पर भी सवाल उठाए गए।

मामले का आज उल्लेख किया गया, जिस पर हाइकोर्ट की पीठ ने इसे 16 मार्च को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

यह मामला आने वाले समय में डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक अहम कानूनी बहस का रूप ले सकता है।

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