IBC मामलों में NCLT पर हाईकोर्ट समानांतर अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते: बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-01-07 09:42 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि दिवालियापन के मामलों में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा पारित आदेशों के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली अवमानना याचिकाएं सीधे हाईकोर्ट में दायर नहीं की जा सकतीं।

जस्टिस मिलिंद एन जाधव की सिंगल-जज बेंच ने कहा कि एक बार जब कानून द्वारा NCLT को अवमानना की शक्तियां दे दी जाती हैं तो हाईकोर्ट को समानांतर क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

एक बार जब ट्रिब्यूनल को ऐसा अवमानना क्षेत्राधिकार मिल जाता है तो इस कोर्ट को अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के तहत समानांतर अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसलिए यह स्पष्ट है कि सीधे हाईकोर्ट में अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करने से पार्टियों को उन मंचों को बायपास करने की अनुमति मिल जाएगी, जिन्हें कानूनों द्वारा स्पष्ट रूप से सशक्त बनाया गया।”

यह याचिका एस जी मित्तल एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड ने सतारा सहकारी बैंक लिमिटेड के खिलाफ दायर की थी। बैंक ने 11 जुलाई, 2025 को कंपनी को कैश क्रेडिट सुविधा दी थी। बाद में अगस्त, 2023 में बैंक ने डिफ़ॉल्ट का आरोप लगाते हुए NCLT की मुंबई बेंच में याचिका दायर की।

कार्यवाही के दौरान पार्टियों ने विवाद सुलझा लिया। उन्होंने अक्टूबर 2024 में 5.71 करोड़ रुपये के एकमुश्त निपटान के लिए सहमति शर्तों पर हस्ताक्षर किए।

NCLT ने सहमति शर्तों को रिकॉर्ड किया और 18 अप्रैल, 2024 को दिवालियापन का मामला बंद कर दिया।

एस जी मित्तल एंटरप्राइजेज ने कहा कि उसने पूरी निपटान राशि का भुगतान कर दिया है। उसने नो-ड्यूज सर्टिफिकेट मांगा।

उसने आरोप लगाया कि बैंक ने अभी भी 18.57 लाख रुपये की मांग की और क्रेडिट एजेंसियों को बकाया राशि की सूचना दी।

इसके बाद कंपनी ने NCLT के आदेश की अवमानना का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की भूमिका यदि कोई है तो वह केवल पर्यवेक्षण तक सीमित है।

कोर्ट ने कहा,

"अगर ज़रूरत हो तो कोई भी सुपरवाइजरी दखल सिर्फ़ भारत के संविधान के आर्टिकल 226 और 227 के तहत ही दिया जा सकता है। हालांकि ऐसा सुपरवाइजरी अधिकार अवमानना अधिकार से अलग है और अवमानना याचिका दायर करके इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसलिए इस मामले को देखते हुए मेरी राय है कि यह अवमानना याचिका शुरू में ही सुनवाई के लायक नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।"

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार सही फोरम में उपाय करने की आज़ादी दी।

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