बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 378(1)(a) के तहत किसी आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ सेशंस कोर्ट में दायर अपील के लिए हाईकोर्ट की अनुमति लेना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 378 में संशोधन से केवल अपील का मंच बदला है, अपील करने का मूल अधिकार प्रभावित नहीं हुआ है।

जस्टिस रणजीतसिंह राजा भोंसले तीन आरोपियों की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। याचिका में पुणे सेशंस कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें राज्य सरकार की ओर से बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील को खारिज करने की मांग अस्वीकार कर दी गई थी।

क्या था मामला?

शिकायत 2 अगस्त, 2005 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 353, 506(1) और 504 के साथ धारा 34 के तहत दर्ज की गई थी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, पुणे ने 22 अक्टूबर, 2008 को आरोपियों को बरी कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने सेशंस कोर्ट में अपील दायर की।

आरोपियों ने तर्क दिया कि घटना के समय धारा 353 IPC के तहत अपराध जमानती था, इसलिए अपील सेशंस कोर्ट के बजाय हाईकोर्ट में दायर की जानी चाहिए थी। उन्होंने यह भी दलील दी कि अपील की वैधता के लिए हाईकोर्ट की अनुमति आवश्यक थी।

संशोधन से केवल अपील का मंच बदला: हाईकोर्ट

राज्य सरकार ने दलील दी कि धारा 378 में संशोधन का उद्देश्य अपील दायर करने की प्रक्रिया और मंच में बदलाव करना था। कोर्ट ने भी कहा कि संशोधन के जरिए अपील के लिए दो अलग-अलग मंच उपलब्ध कराए गए, ताकि बरी किए जाने के खिलाफ सभी अपीलों का बोझ केवल हाईकोर्ट पर न पड़े।

जस्टिस भोंसले ने कहा कि अपील का मंच प्रक्रियात्मक कानून का विषय है और किसी पक्षकार को अपनी पसंद का मंच चुनने का निहित अधिकार नहीं है। संशोधन ने अपील के मूल अधिकार को समाप्त नहीं किया है और आरोपी सेशंस कोर्ट में अपने सभी कानूनी तर्क रख सकते हैं।

धारा 378(3) के तहत अनुमति की शर्त लागू नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 378(3) में हाईकोर्ट के समक्ष दायर अपीलों के लिए अनुमति की व्यवस्था है। चूंकि धारा 378(1)(a) के तहत अपील सेशंस कोर्ट में दायर की जाती है, इसलिए उसके लिए हाईकोर्ट की अनुमति आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने यह भी पाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने अपील दायर करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी किया था। ऐसे में सेशंस कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं था।

इसलिए हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों की रिट याचिका खारिज कर दी और अतिरिक्त सेशंस जज, पुणे से आपराधिक अपील का शीघ्र निपटारा करने का अनुरोध किया।

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