चैरिटी कमिश्नर की शक्तियां निगरानी के लिए, नैतिक सुधार के लिए नहीं: बॉम्बे हाइकोर्ट
बॉम्बे हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स अधिनियम की धारा 41ए के तहत चैरिटी कमिश्नर की शक्तियां केवल ट्रस्ट के प्रशासन की निगरानी तक सीमित हैं। उनका उपयोग 'नैतिक सुधार' के लिए नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर हाइकोर्ट ने नासिक स्थित एक स्कूल को दो प्रमुख अखबारों में सार्वजनिक माफी प्रकाशित करने का निर्देश देने वाला आदेश रद्द कर दिया।
यह मामला उस शिकायत से जुड़ा था, जिसमें कुछ अभिभावकों ने आरोप लगाया कि स्कूल ने स्वयं को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध बताकर उन्हें गुमराह किया। इस शिकायत पर चैरिटी कमिश्नर, नासिक ने स्कूल को सार्वजनिक माफी जारी करने का आदेश दिया।
इस आदेश को चुनौती देते हुए स्कूल ने हाइकोर्ट का रुख किया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमित बोरकर ने कहा कि धारा 41ए का उद्देश्य सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति आय और वित्तीय प्रशासन की सुरक्षा और उचित प्रबंधन सुनिश्चित करना है। यह प्रावधान चैरिटी कमिश्नर को ट्रस्ट की संपत्ति के दुरुपयोग, क्षति, अवैध हस्तांतरण या आय के गलत उपयोग को रोकने के लिए निर्देश देने की शक्ति देता है।
जस्टिस बोरकर ने स्पष्ट किया कि “उचित प्रशासन” शब्द को असीमित या नैतिक अर्थों में नहीं पढ़ा जा सकता। इसका संबंध ट्रस्ट की संपत्ति, धन और उनसे जुड़ी वैधानिक जिम्मेदारियों के प्रबंधन से है, न कि ट्रस्ट द्वारा संचालित प्रत्येक गतिविधि या प्रबंधन के विरुद्ध उठाई गई हर शिकायत से। यदि 'उचित प्रशासन' को नैतिक सुधार के रूप में समझा जाए तो धारा 41ए एक खुला और असीमित अधिकार बन जाएगी, जिसे विधायिका ने जानबूझकर टाला है।
हाइकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में की गई शिकायत में न तो ट्रस्ट की संपत्ति के दुरुपयोग का आरोप था, न आय के गलत निवेश या अवैध हस्तांतरण का, और न ही लेखा-जोखा या वैधानिक दायित्वों के उल्लंघन की बात कही गई। शिकायत केवल इस कथित गलत प्रस्तुतीकरण से जुड़ी थी कि स्कूल CBSE से संबद्ध है और इससे स्टूडेंट्स व अभिभावकों पर पड़े प्रभाव से संबंधित हैं।
हाइकोर्ट ने माना कि भले ही ऐसी शिकायत गंभीर हो सकती है, लेकिन इसका ट्रस्ट की संपत्ति, आय या वित्तीय प्रशासन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। सार्वजनिक माफी जारी करने का निर्देश न तो ट्रस्ट की संपत्ति की रक्षा करता है, न आय के उपयोग को नियंत्रित करता है और न ही अधिनियम की धाराओं 35 से 36बी के तहत किसी वैधानिक अनुपालन को सुनिश्चित करता है। इसलिए यह निर्देश धारा 41ए के दायरे से बाहर है।
जस्टिस बोरकर ने दो टूक कहा कि धारा 41ए निगरानी की शक्ति है, नैतिक सुधार की नहीं। इसका उद्देश्य सार्वजनिक ट्रस्ट के वित्तीय और संपत्ति संबंधी पहलुओं की रक्षा करना है। इसके तहत दिया गया हर निर्देश ट्रस्ट की संपत्ति, आय या वैधानिक प्रशासन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा होना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि में हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि संबंधित ट्रस्ट वर्ष 1998 में पंजीकृत हुआ और उसके द्वारा संचालित स्कूल को वर्ष 2002 में एसएससी बोर्ड की मान्यता प्राप्त थी। बाद में अभिभावकों के अनुरोध पर CBSE से संबद्धता के लिए आवेदन किया गया, लेकिन निरीक्षण के बाद CBSE ने वर्ष 2009 में आवेदन और अपील दोनों को खारिज कर दिया।
इन तथ्यों के आधार पर बॉम्बे हाइकोर्ट ने 28 जून 2010 को चैरिटी कमिश्नर, नासिक द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया और कहा कि उक्त आदेश विधिक अधिकार क्षेत्र से परे था।